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गर्मी

1

धरती सारी जल उठी, आसमान है मौन

रहबर भी भटका हुआ, राह दिखाए कौन

राह दिखाए कौन, पड़ा असमंजस भारी

होते सब हैरान, परेशां दुनिया सारी

देती सबको प्यार, हमारे दुर्गुण सहती

यही मातृ रूपेण, हमारी प्यारी धरती।

2

व्याकुल जन्तु जीव सभी, हलाकान दिन रैन

धूप चिलचिलाती बड़ी, करे बहुत बेचैन

करे बहुत बेचैन, पसीना झरता जाता

चलती लू भी तेज, कोई भी बच न पाता

बरस रही ज्यों आग, गगन है कितना आकुल

हालत है गम्भीर, जगत गर्मी से व्याकुल।

3

जल उठी चमड़ी तन की, धूप बहुत है तेज

थपेड़े गर्म हवा के, करते रहे सचेत

करते रहे सचेत, स्वार्थ त्यागो सब आओ

बचाना है अगर भूमि, तो जंगल भी बचाओ

गया हाथ से आज, न अवसर आयेगा कल

होगा बस पछताव, संसार जायेगा जल।

4

धरती पर आग बरसी, जग सारा है मौन

जीवन संकट में पड़ा, दोषी इसका कौन

दोषी इसका कौन, बढ़ा धरती का पारा

पर्यावरण दूषित, दूषित जगत है सारा

जरा संभल जा आज, सृष्टि सारी है कहती

बढ़ा विश्व का ताप, झुलस जायेगी धरती।

5

कोस दूर से ला रहे, जल का पड़ा अकाल

पीने को पानी नहीं, संकट है विकराल

संकट है विकराल, पड़ा सूखे से पाला

सूख गए सब स्रोत, कुआं क्या सरिता नाला

संकट है गंभीर, लगे जीव मजबूर से

जल परिणाम स्वरूप, ला रहे कोस दूर से।

6

दिन सारा जलता लगे, लगे सुलगती शाम

इस के सिवा कुछ रवि को, और नहीं है काम

और नहीं है काम, सुबह से लगा तपाने

गर्मी में औकात, सर्वस्व लगा दिखाने

न बिजली है न नीर, चढ़ रहा पारा हर दिन

प्राणी सब बेचैन, हैं कठिन गर्मी के दिन।

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