
राजनीतिक सफरनामा : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
दुनिया में न्याय के मंदिर के रूप् मेें स्थापित न्यायालय न केवल कानून की रक्षा करते हैं, उनके पालन की जिम्मेदारी तय करते हैं बल्कि वे आम आदमी के लिए आषा के केन्द्र बिन्दु भी होते हैं । आम आदमी जब सरकारी व्यवस्थाओं से हार जाता है तब वह न्यायलय की दहलीज पर नया पाने की उम्मीद से उत्साह से भर जाता है । पर अब न्यायलय में ही यदि गाली-गलौज होने लगे, न्यायकर्ता को गालियां परोसी जाने लगें तो शर्मिंदगी तो होगी ही । विगत दिवस माननीय सर्वोच्च न्यायलय मेें अदालत की मर्यादा को चूर‘-चूर होते देखा गया । एक याचिकाकर्ता वकील ने सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीशों के सामने ही न केवल कागज फेंके, उन्हें आदेश देने का कुकृत्य किया बल्कि मुख्य न्यायाधश को गालियां भी दीं, उनके प्रति अभद्र भाषा का प्रयाग किया । जस्टिस के. वीत्र विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप अपनी दलीलें रख रहा था, उसकी याचिका पर सुनवाई होनी थी । वह जिस ढंग से अपनी बात न्यायाधीशों के समक्ष रख रहा था वह जिस डंग से अपनी बात रख रहा था वह भी मर्यादा के अनुरूप् नहीं थी पर बात रखते-रखते अचानक उसने हाथ मेें रखे कागजों को न्यायाधीशों की तरफ फेंकना शुरू कर दिया इतना ही नहीं वह न्यायाधीशों को निर्देंश देते भी सुना गया तब ही अचानक उसके सुर बदले और वह मुख्य न्यायाधीश के प्रति अअभद्र भाषा का उपयोग करने गला । हालंाकि उसे तत्काल पकड़ लिया गया और उसे कोर्ट रूम से बाहर ले जाया गया । पर इस घटना ने न्षायालय की गरिमा को ठेस तो पहुंचाई ही । जो लोग भी कोर्ट रूम के अंदर दाखिल होते हैं, उन्हें न्यायालय की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ता है । पर इस व्यक्ति ने ऐसा नहीं किया । न्यायालय देश के लोकतंत्र मेें न्यान्य पाने की सबसे बड़ी उम्मीद के रूप् मेें देखा जाता है । सभी हतप्रभ थे और अकारण हुई इस घटना का चिंन्तन कर रहे थे । ऐसा भी नहीं है कि न्यायलय के अंदर ऐसी घटना पहलीबार घटित हुई हो । पूर्व में वर्ष 1999 मेें ऐसी घटना घटित हुई थी जिसने न्यायलय की गरिमा को तहस-नहस होते देखा था । उस समय मुख्य न्यायाधीश ए. एस. आनंद थे । सर्वोच्च न्यायालय मेें नियम है कि कोई भी मामले की सुनवाई सूचीबद्ध प्रकरणों के आधार पर ही होती है । पर एक एडवोकेट थे नंदकिशोर बलवानी, वे एक ऐसे प्रकरण को लेकर मुख्य न्यायाधीश की अदालत में पहुंच गए जो सूचीबद्ध था ही नहीं । मुख्य न्यायाधीश आनंद तीन सदस्यी पीठ के साथ बैठकर किसी और प्रकरण को सुन रहे थे तब ही बलवानी वहां पहुंच गए और पुलिस एजेन्सियों पर उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए नारेबाजी करने लगे । इसी बीच उन्होने तीन सदस्यी खंडपीठ की तरफ जूता फेंक दिया । सभी हतप्रभ थे । मुख्य न्यायाधीश ने इस घटना को गंभीर माना और कड़ा रूख् अख्तियार किया । एडवोकेट नंदलाल बलवानी को अदालत की घोर अवमानना का दोषी मानते हुए चार महिने की साधारण जेल और 2000 रूत्र का जुर्माना की सजा सुनाई । बार कौंसिल ने भी इस घटना को गंभीर मानते हुए उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की और उन पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया । एक ओर घटना 2025 मेें घटित हुई । 6 अक्टेबर 2025 को तब भारत के मुख्य न्यायाधीश बी. आर गवई थे । उनकी अदालत चल रही थी, वे एक प्रकरण को सुन रहे थे तब ही एडवोकेट राकेश किशोर ने ‘‘सनातन का अपमान नहीं सहेगें’’ के नारे लगाने लगा और यकायक उसने मुख्य न्यायाधीश की तरफ जूता फेंकने की कोशिश की । उसे भी तत्काल पकड़ लिया गया पर इस घटना ने भी न्यायालय की गरिमा और सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिये । यह अलग बात है कि माननीय मुख्य न्यायाधीश ने इस घ्टना को ज्यादा महत्व नहीं दिया पर इस घ्टना ने कई प्रश्नचिन्ह तो खड़े कर ही दिए थे । अदालत ने कहा भी कि न्याययिक फैसलों की असहमति का मतलब अदालत की गरिमा को खंडित करना नहीं हो सकता । ये तीनों घटनायें सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को खंडित करी हुई दृष्टित होती है तो ऐसे में न्यायालय की गरिमा को बनाए रखने की जिम्मेदारी आम नागरिकों से लेकर, वहां वकालत कर रहे वकीलों की भी है । यूं भी न्यायलयों में जिस ढंग से प्रकरण बढ़ते जा रहे हैैं तब तो और भी महत्वपूर्ण है कि हम न्यायलयों की गरिमा को बनाए रखने की जिम्मेदारी लें । एक जिम्मेदारी अयोध्या के राम मंदिर के प्रति आम लोगों की आस्था को बनाए रखने की भी है । जिस तरह से वहां चंदा चोरी की घटना सामने आई उसने भी राम मंदिर ट्रस्ट को संदेह के घेरे में ले लिया है । भारत मेें मंदिर आस्था के केन्द्र होते हैं यहां आम आदमी श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुंचता है और भगवान के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है । यही करण है कि भारत के छोटे-बड़े मंदिरों मेें लोग श्राक्तिभाव से दान देते हैं और समय निकालकर भगवान जी के दर्शन करने भी जाते हैं । हर एक मंदिर का खर्चा ऐसे ही दानदाताओें के द्वारा दिए गए दान से ही चलता है । राम मंदिर के प्रति तो वेसे भी आम आदमी बड़ी श्रद्धा है । राम मंदिर के निर्माण से रामलाला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा तक आ अदमी मुक्त हस्त से दान देता रहा और फिर दान का यह सिलसिला चलता रहा । इसी दान पर कथित लोगों ने डाका डाला । लोगों ने तो यह मान कर दा दिया कि वे भगवान के प्रति समर्पण कर रहे हैं, वे लोग जिनके पास इसकी रक्षा की जिम्मेदारी थी, जिनके पास इसके रखरखाव की जिम्मेदारी थी वे इस दान से व्यापार कर रहे थे । वे श्रद्धालुओं के भरोसे को तोड़ रहे थे, वे आम आदमी की श्रद्धा का मजाक बना रहे थे । जब यह घटना सामने आई तो सभी अचंभित थे, वे मानो विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि ऐसा भी हो सकता है । एसआसइटी की जांच आगे बढ़ी और दान चोरी की लम्बी फेहरिसत बनती चली गई तो आम व्प्यक्ति केवल अचंभित ही बना रहा । भारत जैसे देश मेें ऐसा भी हो सकता है जहां कि संस्ृति, जहां के संस्कार जमीन मेें गिरे पैसे मिल जाने पर भसी उसे मंदिर मेें भेंट कर आते हैं वहां कोई ऐसे लोग भी हैं जो श्रद्धा से चढ़ए गए पैसों को हजम कर रहे हैं । कई नाक सामने आए और कई नाम लोगों ने अपने आप ही मान लिए । जो नाम सामने आए वे अरेस्ट हो गए पर वे नाम जिन्हें आम आदमी ने अपने मन मेें शंका के रूप् मेें जमा कर लिए हैं वे शेष बचे हैं । ‘‘समरथ को नहीं दोष गुसांई’’ तो क्या वे समथ लोग बेदाग हैं, आप उनको बेदाग मान लो पर आम आदमी उन्हें बेदाग मानने में हिचक रहा है । चोरी केवल वह ही नहीं होी जो दिखाई देती है, चोरी तो वह भी होती है जो चोरों को चोरी कर लेने का संसाधन जुटाता है या आंख मूंदकर बैठ जाता है । जिन्होने चोरी की वे अंदर हो गए पर वे जो आंखें मूंदे बैठे रहे वे अब भी किसी को दिखाई नहीं दे रहे हैं या जांचकर्ता को उनके अदृश्य होने का भ्रम हो गया है । बहुत हल्ला मचा कि राम मंदिर ट्रट जिसके ऊपर मंदिर मेें आए दान की भी जिम्मेदारी होती है उसकी बड़ी बैठक होने जा रही है, सभसी को बड़ी उत्सुकता भी रही उन्हें लगा कि अब इसमेें कुछ बदलाव दिखाई देगा पर ‘‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’’ वाली कहावत सच दिखाई देने लगी । आम लोगों की भाषा मेें ‘‘लीपापोती’’ कर दी गई । जिन नामोें पर लोगों को उत्सुकता थी वे नाम साफ बचते दिखाई देने लगे और जो जेल मेें हैं उनके उपर ही सारा ठीकरा फोड़ दिया गया । बहुत सारे लोग इससे असहमत दिखाई दे रहे हैं पर बहुत सारे लोग इसके पक्ष मेें खड़े होकर वक्तव्य भी दे रहे हैं । विगत कुछ वर्षों से साधु, संत और गेरूआ वस्त्रधारियों का राजनीतिक प्रेम ज्यादा उमड़ता दिखाई देने लगा है कि किसी सफल राजनीतिज्ञों की भांति ऐसे-ऐसे वक्तव्य देते हैं जो साधु-संतों की परिभाषा से विपरीत होते हैं, यही कराण है कि अब समाज मेें इनके प्रति श्रद्धा का अभाव महसूस होने लगा है । जिनको केवल धर्म की बात करना चाहिए, जिनको आम आदमियों मेें धर्म के प्रति आस्था, नैतिकता और संस्कार-संस्कृति की उर्जा भरनी चाहिए वे आपस मेें संघर्ष करते दिखाई देने लगे हैं । दो गुट बन गए हैं, एक समर्थन करता है और दूसरा विरोध करता है, घटना कोई भी हो, समस्या कोई भी हो अमूमन ये दो गुट ही आमने-सामने दिखाई देते हैं । आमआदमी दिगभ्रमित है, वह न समझ आने वाले दौर से गुजर रहा है । राम मंदिर की दान मेें लगी सेंध का सीधा सा उत्तर तलाश रहा आम आदमी पर उत्तर नदारत है । राम मंदिर में दान चोरी का मामला सामने आया तो अन्य मंदिरों से भी ऐसी घटनाओं की जानकारियों सामने आने लगीं । कई मंदिरों मेें दान की चोरी हो रही है ऐसा महसूस होने लगा । बद्रीनाथधाम मेें तो एक अधिकारी का नोटों का बंडल ले जाते वीडियो सामने आया, राज्य सरकार ने आननफानन मेें काय्रवाही की और उसे अरेस्ट कर लिया पर बाकी मंदिरों मेें अभी इसकी जांच की बात ही सामने आ रही है । यह सिलसिला अभी और बढ़ेगा, क्योंकि भारत मेें तो हजारों मदिर हैं और उनमें करोड़ों रूप्या दान का आता है, अभी तक यह माना जाता था कि दान के पैसों की चोरी नहीं होती पर देश के सबसे चर्चिित राम मंदिर मेें जिस तरह से दान की चोरी हुई उसने हर एक मंदिर मेें दान को संदेह के घेरे में ला दिया है । कृष्णजन्मभूमि मेें भी ऐसा ही आरोप लगा और अन्य मंदिरों मेें भी शंकाओं ने जनम ले लिया । एक और प्रश्न सामने आ रहा है कि क्या वाकई मंदिरों को साधु-संतों की जिम्मेदारी पर छोड़ देना चाहिए ? इस प्रश्न का भी उत्तर आना जरूरी है । राम मंदिर की घटना ने आम श्रद्धालुओं की भावना को आहत किया है इसका ही परिणाम है कि अयोध्या जाने वाले भक्तों की संख्या मेें कमी आई है ऐसा कुछ लोग बोल रहे हैं यदि यह सच है तो यह बहुत बड़ा आघात है । अब इस आघात से बाहर निकालने की जिम्मेदारी राम मंदिर के कर्ताधर्ताओं की है । ‘‘जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहियो रे’’ की सोच से आगे निकल कर मंदिरों के प्रति आम व्यक्तियों की श्रद्धा और भक्ति को वापिस करना आवश्यक है ।
