मन-मन्दिर में
तब बचपन में घर के आँगन में बने मन्दिर में, मन्दिर के सामने रखे तुलसी के बिरवे को जल चढ़ाते हुए तुम्हारा ख्याल आता था ‘ मोहन ‘ तुम्हारा हँसना मुरली बजाना यमुना-तट पर गोपियों को रिझाना रिसियाना, अकुलाना और बुलाना कितना मधुमय लगता था तुम्ही मेरे कृष्णा हो, राधेय हो ज्ञेय-अज्ञेय हो, तुम्हीं…
