एक दीप मेरा, राष्ट के नाम
कुशलेन्द्र श्रीवास्तव एक एक कर के बीत गया एक और साल और फिर आ गई दीपावली । जगमग रोशनी से जगमग होने लगे हें घर आंगन । आंगन तो अब रहे नहीं, कांक्रीट के जगल हमने पैदा कर दिए हैं । माटी के आंगन में माटी के दिए की मध्यम रोशनी कभी करती थी…
