ममता का साथ छोड़ते नेता
कुशलेन्द्र श्रीवास्तवओह ! टीएमसी ‘‘क्षणभंगुर जीवन’’ जैसी बरबाद हो गई । कोई भी क्षेत्रीय दल चुनाव हारने के उबाद भी इतने जल्दी खत्म नहीं होती । अप्रेल माह मेे जोर-जोर से चिघाड़ रहे टीएमसी के नेता, जिस भाजपा कों कोस रहे थे अब उनकी तारीफ करते हुए उनके पाले में बैठे दिखाई दे रहे हैं…
चुनौती है बढ़ता तापमान, बदलता वायुमंडलीय पैटर्न।
वैश्विक समुद्री बर्फ में खतरनाक गिरावट को रोकने के लिए जलवायु कार्यवाही निर्णायक होनी चाहिए। अनुकूली नीतियों और बेहतर ध्रुवीय निगरानी से जलवायु लचीलापन बढ़ेगा। एक टिकाऊ भविष्य उत्सर्जन को कम करने और ग्रह के नाज़ुक क्रायोस्फीयर की रक्षा करने के लिए सभी के दृढ़ संकल्प पर निर्भर करता है। कई समुदायों में जलवायु परिवर्तन…
अभिव्यक्ति और भावनाओं को तलाशने का शक्तिशाली माध्यम है ‘कला’
( विश्व कला दिवस पर विशेष) कला हमेशा से ही अभिव्यक्ति और भावनाओं को तलाशने का एक शक्तिशाली माध्यम रहा है।दुनियाभर में आज यानी 15 अप्रैल को वर्ल्ड आर्ट डे (विश्व कला दिवस) मनाया जा रहा है। कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए इस दिन को हर साल 15 अप्रैल को मनाया जाता…
महान लेखिका प्रतिमा वर्मा जी का निधन
बनारस की सुविख्यात लेखिका प्रतिमा वर्मा जी का 82 वर्ष की आयु मे साउथ अफ्रिका मे निधन,उनका जन्म स्वतन्त्रता सेनानी, पत्रकार एवम राजनय परिवार मे हुआ था lप्रतिमा जी की लिखीएक सुबह और, धूप धूप साया साया, बंधे पावों का सफर, उसका आकाश, गलियारे, इत्यादि पुस्तकें काफी प्रसिद्ध रहीं l इसके अतिरिक्त प्रतिमा जी की…
स्वतंत्रता दिवस धिक्कार कर कहता है
डॉक्टर सुधीर सिंह आजाद भारत में आर्थिक आजादी नहीं, किंतु आजादी का ढिंढोरा लोग पीटते हैं। स्वतंत्रता दिवस धिक्कार कर कहता है, भारत में गुलाम सा गरीब क्यों रहते हैं? भ्रष्टाचार ने छीना है वंचितों की आजादी, गरीब कोऔर ज्यादा गरीब बना दिया है। भ्रष्टाचारियों के रूतबा का कहना क्या? गोरखधंधेवाजों का सम्मान बढ़ गया…
बुजुर्ग की झोली में खुशियां भर दीजिए
बुजुर्ग की झोली में खुशियां भर दीजिए बुजुर्ग की यादाश्त कमजोर हो जाती है, बेचारे से अक्सर गलतियां हो जाती हैं. बेवजह उन्हें उलहना सुनना पड़ता है, जिल्लत की जिंदगी ढोनी पड़ जाती है. दिल की बात कहें तो वे किससे कहें? कोई भी हमदर्द उनकेआसपास नहीं है इसलिएअकेले में वे चुपके से रो लेते…
काल और उसके रहस्य : आशा सहाय
जब कब अब और तब जैसे शब्द निरर्थक हैं अगर इनके साथ काल नहीं जुड़ा हो।पूर्वोक्त शब्दों से हम काल को मापने का दम्भ भरते हैं। वस्तुतः भौतिक दृष्टि से इसे मापना अत्यंत कठिन है। यह अपनी व्यावहारिक सुविधा के लिए करना चाहते हैं ताकि दो घटनाओं के मध्य की स्थिति को हम मस्तिष्क मे…
फूहड़ कंटेंट, सोशल मीडिया और संस्कृति: जिम्मेदारी किसकी?
– डॉ. प्रियंका सौरभ डिजिटल युग ने हमारे समाज की संरचना, सोच और अभिव्यक्ति के तरीकों को गहराई से बदल दिया है। आज मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से कोई भी व्यक्ति कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है—जहां पहले मनोरंजन और…
राखी के दोहे
धागा यद्यपि सूत का,पर दृढ़ औ’ मजबूत । बहिन-सहोदर नेह का,बन जाता जो दूत ।। पर्वों का यह पर्व है,जिसमें रक्षा,नेह । अंतर्मन उल्लास में,होती पुलकित देह ।। धागा बस इक माध्यम,पलता है विश्वास । जिसमें रहती निष्कपट,मीठी-सी इक आस ।। बचपन की यादें लिये,बिखरे मंगल गान । सम्बंधों में है सजा,संस्कार का मान ।।…
