Latest Updates

सामनता पर मुखर हुआ समाज, छात्रों के सब्र का बाँध टूट रहा

मुद्दा : आरक्षण की गलत नीतियों से प्रभावित हो रहा सामान्य वर्ग के छात्रों का भविष्य
मांग : जिन राज्यों अथवा गाँवों में आरक्षण की जरुरत बस वही तक सिमित कीजिये आरक्षण
सुझाव : आरक्षण रिफार्म कीजिये, आरक्षण को आर्थिक स्थिति पर लागू कीजिये
लेखक : पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर

रांची में आंदोलनरत छात्रों की रिपोर्टिंग करने गए वरिष्ठ पत्रकार अमन चोपड़ा को हिरासत में लिए जाने और उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज होने के बाद आज की पत्रकारिता भी चर्चा में आ गई है। वरिष्ठ पत्रकार पंकज सीबी मिश्रा ने आज सोशल मीडिया पर लिखा कि मेरे लिए पत्रकार आज भी जनता और नेता का नौकर है। लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को अब तक आजादी नहीं मिली है। पत्रकारिता गुलामी की दौर में है और फर्जी सूचनाओं की जिम्मेदारी सोशल मिडिया इन्फ्लूएन्सर और यु ट्यूबर ने ले लिया है। आरक्षण रिफार्म मुद्दे पर सबके होंठ सील चुके है। टीना टाबी, रामदास अठावले, चंद्रशेखर रावन के बच्चों को आरक्षण क्यों दिया जा रहा ! ऐसे मुद्दों पर लोगो की चुप्पी बता रही कि अब सब्र का बाँध टूटने वाला है और आरक्षण के काले क़ानून को यूजीसी बिल के साथ दफ़न करने का समय आ गया है। सवर्ण यदि अब सड़को पर उतरते है तो यह भाजपा समेत उन सभी राजनीतिक पार्टियों के मुंह पर तमाचा होगा जो सवर्णो के हक हिस्सों को प्रसाद की तरह अमीर दलितों में बाँट रहें। यहाँ कोई इस देश में अपनी संख्याबल से ब्लैकमेल करता है, कोई हिंसा करने की अपनी क्षमता के कारण सरकार को चुप कराए बैठा है केवल सवर्ण ही समझदारी का ठेका लिए सत्तर साल से आरक्षण का पत्थर के नीचे दबा घुट रहा ! क्यों ? आप सोचिये जंतर मंतर में जो हुआ और रांची में जो हो रहा है, उसमें जमीन आसमान का अंतर है। पूरा देश स्पष्ट रूप से यह देख पा रहा है। न्यूज़ चैनलों की भूमिका थोड़ा बहुत पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकती हैं परंतु इन मामलों में ज्यादातर चीजें पर्दे पर स्पष्ट दिख रही हैं। सोशल मीडिया रूपी अत्यंत छोटे पर्दे पर भी लगातार जो खबरें आ रही हैं, उससे पूरा देश यह समझ पा रहा है कि जंतर मंतर पर जो कुछ भी हुआ और रांची में जो हो रहा है उसका फर्क बहुत मायने रखता है। हमारे देश और समाज के लिए तथा भारतीय संस्कृति के लिए भी विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र में स्वाभाविक है, होना चाहिए और वैसा प्रदर्शन हर्ष दुबे और मकराना दिखा रहें जो समाज हित में है। यदि कुछ मुद्दों पर जनता में और युवा वर्ग में असंतोष है, नाराजगी है तो उन्हें अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का पूरा हक है। परंतु अपनी बात पहुंचाने का तौर तरीका भी बहुत लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण होना चाहिए। भाषा की शालीनता और व्यवहार आपकी वास्तविक भावनाओं को भी प्रकट करता है। जंतर मंतर की भाषा कुछ और थी, रांची की भाषा कुछ और है… जिन्हें इसका अंतर देखने की भूख है वह टीवी पर और सोशल मीडिया पर इस अंतर को लगातार देख पा रहे हैं, महसूस कर रहे हैं , समझ रहे हैं और अपनी राय भी बना रहे हैं।
मैंने पहले भी लिखा था कि महानगरीय भाषा, संस्कृति काफी अलग है। आवश्यक नहीं कि छोटे शहरों के देश भर में फैले हुए युवा उससे पूरी तरह से प्रभावित हों। अगर प्रभावित हैं भी तो उनका परसेंटेज अत्यंत कम है, नगण्य है। रांची के युवाओं का विरोध प्रदर्शन का तौर तरीका इस बात को लगातार 15 दिन से पूरे देश को बता रहा है। रांची के छात्रों के विरोध का तौर तरीका भारत के आम जेनजी को समझ पाने में काफी मददगार हो रहा है। जंतर मंतर में जो हुआ वह सिर्फ महानगरीय भोंडा प्रदर्शन ही नहीं था बल्कि उसमें तमाम पूर्वाग्रह, दुराग्रही राजनीति और साजिशें भी शामिल थीं। कहा जा रहा है कि विदेशी ताकतें भी उसमें प्रभावशाली हस्तक्षेप कर रही थीं। पंजाब के पुलिस अफसर ने सार्वजनिक रूप से यह बात कही है कि किस तरह से वहां छात्रों के आंदोलन को प्रदूषित करने के लिए उसमें कैसी-कैसी साजिशें शामिल थीं। समाज से यही प्रेरणा लेनी चाहिए कि आधुनिक बनो, आगे बढ़ो, लेकिन अपनी जड़ों को कभी मत भूलो। लेकिन वर्तमान में सरकार को जो लोग सबसे अधिक ब्लैकमेल कर रहे हैं, वह है ड्रामा करने की क्षमता जिसमें चंद्रशेखर रावन, अभिजीत दीपके और पप्पू यादव मुख्य है। हर छोटे बड़े निर्णय पर एक नया ड्रामा शुरू हो जाता है। हर बात को एक नए संकट, नई विपदा, नए विक्टिमहुड में बदल कर ऐसा माहौल बना देते हैं कि लगता है कितने बड़े कष्ट में हैं। साँस उखड़ रही है, आँखों के आगे अंधेरा छा रहा है, हाथ पैर में शक्ति नहीं बची, दांत लग गया है। जैसा एक जनरल मेडिकल वार्ड में कभी कभी एंग्जाइटी और फंक्शनल न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर से ग्रस्त मिडिल एज गर्ल्स करती है। इतिहास में पत्रकार और आरक्षण के विरोध में आवाज़ को कुचलने का यह विवाद तब शुरू हुआ था जब 1987 में स्वीडिश रेडियो की रिपोर्ट से बोफोर्स तोप सौदे में कथित दलाली/कमीशन का मामला सामने आया। राजीव गांधी सरकार ने आरोपों को खारिज किया, तो राम जेठमलानी ने स्वीडन जाकर स्वयं मामले की पड़ताल की और फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से सार्वजनिक रूप से लगातार सवाल पूछने का अभियान शुरू किया। जब जेठमलानी लगातार सवाल पूछते रहे और राजीव गांधी से जवाब की मांग करते रहे, तब राजीव गांधी की ओर से वह मशहूर टिप्पणी आई थी कि हर भौंकने वाले कुत्ते को जवाब देने की जरूरत नहीं है। यह टिप्पणी 17 जून 1987 को अखबारों की सुर्खियों में आई थी। लेकिन जेठमलानी ने इसे अपने खिलाफ अपमान के रूप में लेने के बजाय उलटा इसे अपनी मुहिम का हथियार बना लिया। उनका जवाब था कि वे कोई साधारण डॉग नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रहरी/निगरानी करने वाले कुत्ते हैं। उनका तर्क था कि वाच डॉग का काम ही लगातार भौंककर खतरे के प्रति लोगों को सचेत करना है। इसीलिए बाद में यह प्रसंग इस रूप में प्रसिद्ध हुआ कि राजीव गांधी ने जेठमलानी को बार्किंग मैन कहा गया। राम जेठमलानी ने करीब 40 दिन तक लगातार रोज 10 सवाल राजीव गांधी से पूछे यह सभी बोफोर्स तोप के सौदे से संबंधित थे। उन सवालों का राजनीतिक असर भी जबरदस्त हुआ था। उन सवालों का जनता की राय पर भी बहुत प्रभाव पड़ा। राजीव गांधी और उनकी सरकार ने सवालों का जवाब नहीं दिया। लेकिन राजीव गांधी के मित्र अमिताभ बच्चन जो उस समय इलाहाबाद से कांग्रेस के सांसद थे, वह आरोपों की इस आंधी को झेल नहीं पाए… कांग्रेस यदि सवालों का कुछ जवाब देती , स्टैंड लेती तब शायद अमिताभ बच्चन भी उन जवाबों की आड़ में अपने मित्र राजीव गांधी के साथ खड़े होते । परंतु राजीव गांधी और कांग्रेस की चुप्पी के कारण अमिताभ बच्चन खुद को अकेला और बहुत ज्यादा घिरा हुआ पाए। इसके कारण इलाहाबाद संसदीय सीट से इस्तीफा देकर उन्होंने राजनीति को अंतिम प्रणाम कह दिया… जिससे जनता ने अपने निष्कर्ष निकाले और इसका 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस की हार पर सीधा असर पड़ा। अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद की संसदीय सीट से जब इस्तीफा दे दिया तो जून 1988 में इलाहाबाद में उपचुनाव हुआ। यह उपचुनाव देशभर की मीडिया में लगातार चर्चा का विषय बना रहा। तमाम अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी इसका कवरेज करने पहुंचे थे इलाहाबाद उस उपचुनाव में चुनाव प्रचार के दौरान छोटे लोहिया कहे जाने वाले वरिष्ठ समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र ने कई सभाओं में सांकेतिक रूप में कुछ ऐसा भाषण दिया जो बहुत ही प्रभावशाली साबित हुआ। अपने भाषण में वह कहते थे कि “बचपन में हम लोग जब कुत्ते का पिल्ला पालने के लिए उसका चयन करते थे तब कई पिल्लों को कान पकड़कर ऊपर उठाते थे, जो पिल्ला बिल्कुल चुप्पी साधे रहता था उसके बारे में यह मान्यता आम थी कि यह चोर है, चोरों का साथ देने वाला है और जो पिल्ला कान पकड़कर उठाने में चिल्लाता था, आवाज करता था, उसके बारे में कहा जाता था कि यह चोर नहीं है बल्कि शाह है, और इसे पालना ही समझदारी होगी। और बाद में जनता ने इलाहाबाद में जो फैसला सुनाया उससे जो कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना वह माहौल देश भर में फैलता गया और साल भर बाद ही कांग्रेस की सरकार धराशाई होकर 1989 के चुनाव में मुंह के बल गिर पड़ी। सत्ता से सवाल पूछने में जो डरते है वो डरते होंगे मैंने सीधा जवाब पूछा है की बताइये कब पत्रकारिता को आजादी मिलेगी ! कब सवर्ण समाज के गरीब बच्चो को समानता का हक मिलेगा ! बताइये कब तक हम सवर्ण किसी राजनीतिक दल के गुलाम रहेंगे !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *