पक्ष हो या विपक्ष, चुनाव आते ही दोनों जनता से कहते हैं – “व्यवस्था बदलो”। वही आम जनता, जो प्रतिनिधि चुनकर व्यवस्था चलाने के लिए भेजती है। जिसे अधिक लोग चुनकर भेजते हैं, उसी को सत्ता मिलती है।
हम हर पांच साल में एक सपना देखते हैं। “इस बार व्यवस्था बदल जाएगी”। नया नेता आएगा, नई सरकार बनेगी, सब ठीक हो जाएगा। पर चुनाव खत्म, वादे खत्म। फिर वही जाम, वही घूस, वही लाइन, वही निराशा।
अब प्रश्न उठता है – हर चुनाव के बाद यह स्थिति क्यों बनती है? दोष व्यवस्था का है या उस समाज का जिसने व्यवस्था को चुना?
गांव का प्रधान से लेकर देश का प्रधानमंत्री तक – सबको हम ही चुनते हैं। तो अगर विधानसभा और संसद में अपराधी, भ्रष्टाचारी और बेईमान ज्यादा पहुंच रहे हैं, तो इसका गणित सीधा है। समाज में ऐसे लोगों की मांग ज्यादा है।
हम कहते हैं “नेता खराब है”। पर नेता पैदा कहाँ होता है? इसी समाज की कोख से। जिस दिन समाज ईमानदार उम्मीदवार को नकार कर “बाहुबली” को जिताएगा, उस दिन व्यवस्था में बाहुबली ही आएंगे।
हर चुनाव के कुछ दिन बाद फिर आवाज उठती है – “यह व्यवस्था भ्रष्ट और नकारा है, इसे बदलो”। जोश में हटा भी दिया जाए, तो नई व्यवस्था के लिए लोग आएंगे कहाँ से? मंगल ग्रह से? ऐसा तो होने से रहा। फिर इसी समाज से आएंगे। उसी स्कूल से, उसी परिवार से, उसी मोहल्ले से।
जिस समाज ने कल रिश्वत देकर काम करवाया था, वही समाज कल फिर रिश्वतखोर को ही चुनेगा। क्योंकि उसकी सोच नहीं बदली। उसे “काम करवाने वाला” चाहिए, “सही बोलने वाला” नहीं। उसे “मुफ्त का सामान” चाहिए, “लंबी सोच” नहीं।
इसलिए कुर्सी बदलने से कुर्सी पर बैठने वाला नहीं बदलता। कपड़ा बदलने से इंसान नहीं बदलता।
आज हमारा सबसे बड़ा संकट भ्रष्टाचार नहीं है। सबसे बड़ा संकट है “चलने दो यार” वाली सोच।
हम सब नैतिकता के बड़े प्रवक्ता हैं। व्हाट्सएप पर स्टेटस लगाएंगे – “देश बदलो”। पर जमीनी हकीकत क्या है?
बिजली का बिल ज्यादा आया तो लाइनमैन को पांच सौ पकड़ा देंगे।
बेटे का नंबर कम आया तो प्रिंसिपल से “सिफारिश” करवाएंगे।
सड़क पर कोई नियम तोड़े तो वीडियो बनाकर “ये देखो देश” लिख देंगे, पर खुद हेलमेट नहीं पहनेंगे।
यही समझौतावादी मानसिकता लेकर हमारा समाज जी रहा है। अंदर से हम नैतिक रूप से कमजोर हैं। इसलिए बाहर से आवाज नहीं उठाते। डरते हैं। “मामला बढ़ जाएगा”, “दुश्मनी हो जाएगी”, “मेरा क्या जाएगा”।
आज हमें समाचार में भी मसाला चाहिए। हमें सनसनी चाहिए। हमें नेगेटिव चाहिए।
आई.आई.टी. में सफल छात्र की खबर आखिरी पन्ने के कोने में और चोर की खबर पहले पन्ने पर फोटो सहित।
पॉजिटिव खबर पर दस लाइक, नेगेटिव खबर पर हजार शेयर।
इसलिए मीडिया भी वही परोसेगा जो बिकता है। और हम वही खरीदेंगे जो हमें पसंद है।
जब तक समाज का गणित नहीं बदलेगा, तब तक समाचार का गणित भी नहीं बदल सकता।
इतिहास गवाह है। कोई भी बड़ा बदलाव ऊपर से नहीं आया। वह नीचे से आया है।
इसीलिए परिवर्तन का क्रम हमारा होना चाहिए:
हमें बच्चे को पहले सिखाना होगा कि मेहनत से ही सफलता मिलती है। नकल या पेपर लीक करके नहीं, क्योंकि “झूठ बोलकर जीता हुआ इनाम, हार से भी बदतर है”।
आज मोहल्ले में अगर कोई कचरा फेंक रहा है, कोई लड़की से बदतमीजी कर रहा है तो अधिकांश “इससे हमारा क्या मतलब” कहकर मुंह मोड़ लेते हैं। भीड़ बनकर विरोध का साहस भी नहीं जुटाते। पर व्यवस्था को कोसने के लिए हर पल तैयार मिलते हैं।
वोट देते समय हम जाति देखते हैं। “हमारे कितना काम आएगा” यह गणित देखते हैं। पर यह नहीं देखते कि इसका चाल-चलन कैसा है। गुंडा-बदमाश चलेगा अगर वह हमारा हित साधने में मददगार है। नैतिकतावादी नहीं चलेगा, क्योंकि वह हमारे गलत काम में बचाव की जगह कानून की शरण में जाने की सलाह देगा।
आज एक फैशन बन गया है कि हर कोई कहता है – “व्यवस्था आम आदमी को डराती है”। सच यह है कि हम खुद डरते हैं।
टीचर गलत नंबर दे तो माँ-बाप प्रिंसिपल के पास नहीं जाते।
पुलिस रिश्वत मांगे तो हम दे देते हैं, शिकायत नहीं करते।
ऑफिस में घोटाला हो तो व्हिसल नहीं बजाते। “मेरा ट्रांसफर हो जाएगा”।
यह डर ही व्यवस्था को सबसे बड़ी ताकत देता है। जिस दिन आम आदमी ने कहा “मैं डरूंगा नहीं”, उस दिन आधी लड़ाई वहीं जीत ली जाएगी। साहस संक्रामक होता है। एक खड़ा होता है, तो दस खड़े होते हैं।
देश की तरक्की जी डी पी से नहीं नापी जाती। वह “नैतिक पूंजी” से नापी जाती है।
जापान में भूकंप आता है, लोग लाइन में लगकर राशन लेते हैं। लूट नहीं होती।
स्विट्जरलैंड में कोई पर्स गिरा दे तो 24 घंटे में वापस आ जाता है।
वहाँ कानून ज्यादा कड़े नहीं हैं। वहाँ लोग ज्यादा ईमानदार हैं। हमें भी नैतिक पूंजी बनानी होगी। एक-एक व्यक्ति को बैंक बनना होगा।
इसलिए सबसे पहले “व्यवस्था परिवर्तन” का नारा लगाने से पहले हमें “आत्म-परिवर्तन” का संकल्प लेना जरूरी है।
जिसे गलत करना है कर ले, जिसे छिपाना है छिपा ले। पर कल व्यवस्था बनाने के बाद फिर मत कहना कि “व्यवस्था बदलनी है”। क्योंकि व्यवस्था तुमने ही बनाई है।
सवाल केवल यह नहीं कि “व्यवस्था क्या कर रही है”।
सवाल यह भी है कि “मैं क्या कर रहा हूँ”।
जिस दिन इसका जवाब मिलने लगेगा, उस दिन व्यवस्था अपने आप सुधर जाएगी। क्योंकि तब व्यवस्था चलाने वाले भी हम जैसे ही होंगे।
