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अनैतिक आंदोलन से अनैतिक व्यवस्था बदलने की तैयारी 

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

सीजेपी के आंदोलन के बाद एक और आंदोलन की सुगबुगाहट है और वह है वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के विरोध का। हालांकी इस पर लोगो के अलग – अलग मत है पर एक चीज जो सोचे जाने योग्य है वह है शिक्षा व्यवस्था में उदारीकरण और समानता जहाँ गरीब सवर्ण बच्चों के साथ अब सरकारी भेदभाव हो रहा। अगर आप पिछले सत्तर साल से आरक्षण देकर दलितों वंचितों की स्थिति नही सुधार पाए हैं तो फिर कमी इस आरक्षण के उपायों और इसके लागू रहने में हैं इसलिए अब इसे ख़त्म करके केवल गरीबो का चिन्हिकरण हो और उन्हें आरक्षण के लाभो का भागीदार बनाया जाए। एक परिचर्चा में एक वक्ता ने आरक्षण के दुरूपयोग पर आईएएस टीना टाबी का उदाहरण पेश कर कहा कि टीना डाबी दलित वर्ग से आईएएस अधिकारी हैं, उनके घर में दो अन्य आईएएस अधिकारी हैं जबकि उनके नाना भी प्रशासनिक सेवा में रहें हैं और अब उनके बच्चों को भी दलित आरक्षण मिल रहा तो क्या आरक्षण का लाभ नियमानुसार हैं या इसे आगे लागू रखने का औचित्य बनेगा ! कुछ दलित वर्ग के लोग कुछ एक जगहों का उदाहरण देकर आरक्षण को डिफेंड कर रहें तो ऐसे स्थानों को चिन्हित कर केवल स्थानीय स्तर पर आरक्षण लागू कर दीजिये, उत्थान हो जाए तो आरक्षण स्वतः समाप्त माना जाए। कुछ लोग मंदिरो में भेदभाव को आरक्षण से जोड़ रहें तो भगवान सबके हैं और पुजारी केवल एक जाति का होता था पहले किन्तु आज जो पूजा पाठ कर रहा वही पुजारी। तो ऐसी दलिले केवल समाज में भ्रम फैलाने और समाज के हिंदुत्व से दूर धकेलने का प्रयास मात्र हैं।आज का सामान्य वर्ग का युवा पूछ रहा है कि उसका अपराध क्या है? उसने किसके साथ अत्याचार किया? यदि किसी व्यक्ति या समूह ने इतिहास में अन्याय किया था तो उसका दायित्व उसी पर होना चाहिए, लेकिन आज जन्म लेने वाले एक छात्र के अवसर केवल उसकी जाति के आधार पर कम क्यों हों? क्या समान अवसर का सिद्धांत केवल किताबों में रहने के लिए है? यदि उद्देश्य वंचित समाज को आगे लाना है तो सरकार देश के हर गरीब बच्चे को, चाहे वह किसी भी जाति का हो—विश्वस्तरीय शिक्षा, मुफ्त कोचिंग, छात्रवृत्ति, हॉस्टल और संसाधन उपलब्ध कराए। शुरुआत की रेखा सबके लिए मजबूत बनाई जाए, लेकिन अंतिम प्रतियोगिता का मैदान समान क्यों नहीं हो सकता? डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, न्यायाधीश और प्रशासनिक अधिकारी बनने का मापदंड योग्यता और क्षमता होनी चाहिए या जन्म? यह प्रश्न पूछना किसी समाज का अपमान नहीं बल्कि सार्वजनिक नीति पर वैध चर्चा है। अक्सर कहा जाता है कि आरक्षण गरीबी हटाने की योजना नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का माध्यम है।

          आरक्षण के दंश से देश के सामान्य वर्ग के करोड़ों लोग पीड़ित है। निश्चित रूप से यह व्यवस्था एक बहुत बड़े वर्ग के साथ संवैधानिक दुराचार है, लेकिन हमे जरा ठहर कर सोचना होगा। सैकड़ो सांसद हजारों विधायक लाखों लाख अधिकारी करोड़ो कर्मचारी लगभग सभी के पास पक्के मकान गाड़ी मोटर यहाँ तक कि जमीने भी उपलब्ध उसके बाद भी सारी सरकारी सुविधाएं बिना पढ़े लिखे नौकरी रोजगार आवास हर जगह आरक्षण का लाभ लगभग 75 सालों तक रहा ये सिलसिला उसके बाद भी कमजोर पिछड़ा दलित की परिभाषा वही है तो फिर आगे भी ऐसा ही रहेगा इसलिए आरक्षण को खत्म करना ही चाहिए। क्या किसी भी दल ने कोई ऐसा संकेत दिया है कि वह आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को लेकर पुनर्विचार करने को इच्छुक है ? क्या किसी भी दल के किसी भी नेता ने कभी सार्वजनिक रूप से आरक्षण के विरोध में कोई वक्तव्य दिया है ? सीजेपी  ने आंदोलन किया तो देर सबेर सभी भाजपा विरोधी दल उसे समर्थन देने पहुँच गए। यदि आरक्षण विरोधी आंदोलन हो तो किसी को लगता है कि कहीं से भी राजनैतिक समर्थन प्राप्त होगा ? उल्टे सारा वर्तमान विपक्ष आरक्षण को लेकर भाजपा से भी अधिक दुराग्रही है। सारे दलों को पता है कि यदि आरक्षण का विरोध किया तो उनका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। यह तथ्य शीशे की तरह साफ है कि सरकार आरक्षण समाप्त नहीं कर सकती। हम चाहे लाख सर पटक लें। आरक्षण पर आंदोलन किया जा सकता है। यह सबका अधिकार है। पर इस समय ऐसे किसी आंदोलन का एक ही परिणाम होगा कि भाजपा का वोट कम होगा, सीटें कम होंगी। हो सकता है कि अगले चुनाव में सरकार और कमजोर हो जाय या फिर पराजित हो जाय। लेकिन आरक्षण फिर भी खत्म नहीं होगा। किसे लगता है कि केंद्र में कांग्रेस आयेगी तो आरक्षण समाप्त हो जायेगा ? किसे लगता है कि अखिलेश आयेंगे तो उत्तर प्रदेश में आरक्षण समाप्त हो जायेगा ? आरक्षण हटे या न हटे, इसपर चर्चा से क्यों भाग रहे ? कोई कह रहा कि लिखकर रख लो नहीं हटेगा, कोई गृहयुद्ध की धमकी दे रहा, कोई वही घिसी-पिटी 5000 साल पानी न पीने देने वाली कहानी लेकर आ रहा, कोई ललकार रहा कि सड़क पर उतरकर दिखाओ, कोई रीच के लिए लिख रहा कि कुछ नहीं होगा तो कोई सचमुच निराश है कि किसी राजनीतिक दल का समर्थन इस आंदोलन को नहीं मिलेगा। लेकिन, मेरा प्रश्न केवल इतना है कि आओ चर्चा तो करो। बहस करो। साबित करो कि क्या जायज है या क्या नहीं। चर्चा से क्यों भागना, अगर तथ्य व तर्क हैं तुम्हारे तरकस में तो ? चर्चा हो जाए, भारत शास्त्रार्थ की भूमि रही है। सीधा फ़ैसला मत सुनाओ न, इसके पीछे तर्क दो। 4 फैक्ट्स बताओ। फ़िलहाल तो एटीट्यूड ऐसा है कि ग़लत है फिर भी जारी रहेगा, सवर्णों हटाकर दिखा दो दम है तो। उल्टे ये लोग कुछ और ऐसी नयी व्यवस्था करके जायेंगे जिससे हमारी रही सही शक्ति भी समाप्त हो जायेगी। हो सकता है कि लोकतंत्र ही समाप्त हो जाए। हो सकता है कि हमारे रहे सहे अधिकार भी समाप्त हो जाएं। उनके स्टेटमेंट्स और संकेत तो ऐसे ही लग रहे हैं।  इसलिए यह समय ठण्डा होकर सोचने का है कि हमारे लिए क्या उचित है और क्या अनुचित? लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहाँ कोई भी नीति, कोई भी व्यवस्था और कोई भी कानून स्थायी रूप से समीक्षा से ऊपर नहीं हो सकता। संविधान भी संशोधित हो सकता है, सरकारें बदल सकती हैं, नीतियाँ बदल सकती हैं, तो फिर आरक्षण पर चर्चा क्यों नहीं हो सकती  ? आज देश में हर विषय पर बहस होती है—कृषि कानूनों पर हुई, नागरिकता कानून पर हुई, शिक्षा नीति पर हुई, पेपर लीक  पर हुई, यूजीसी नियमों  पर हुई—लेकिन जैसे ही आरक्षण की समीक्षा की बात होती है, कुछ लोग बहस करने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। आखिर क्यों? क्या लोकतंत्र में किसी नीति पर प्रश्न उठाना अपराध है? क्या 75 वर्षों तक लागू रही किसी व्यवस्था के परिणामों का मूल्यांकन करना गलत है? अगर कोई व्यवस्था पूरी तरह न्यायसंगत और प्रभावी है तो उसे खुली बहस से डरना नहीं चाहिए, बल्कि बहस उसके पक्ष को और मजबूत ही करेगी।  यदि ऐसा है तो यह भी पूछा जा सकता है कि क्या समय-समय पर आँकड़ों के आधार पर यह नहीं देखा जाना चाहिए कि किन वर्गों तक इसका लाभ पहुँचा, किन तक नहीं पहुँचा और क्या व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है? एक ही जाति एक राज्य में पिछड़ी और दूसरे राज्य में सामान्य कैसे हो जाती है? यदि सामाजिक पिछड़ापन वास्तविक मानदंड है तो उसके मूल्यांकन की प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध क्यों न हो? आज सामान्य वर्ग में भी लाखों किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार, पुजारी, निम्न-मध्यम वर्ग के कर्मचारी और बेरोज़गार युवा हैं, जो सीमित संसाधनों के साथ अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। क्या उनकी आर्थिक कठिनाइयाँ कम वास्तविक हैं ? क्या उनके बच्चों के सपनों का मूल्य कम है? इसलिए यह बहस किसी गरीब, दलित, आदिवासी या पिछड़े समाज के खिलाफ नहीं है। यह बहस इस बात पर है कि क्या नीतियों की समय-समय पर निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए, क्या वास्तविक वंचितों तक लाभ पहुँच रहा है, क्या सभी गरीब छात्रों के लिए समान आवेदन शुल्क, बेहतर छात्रवृत्ति और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय सहमति बननी चाहिए। 

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