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व्यंग्य -बर्थ-डे अनारकली का : – राजेन्द्र परदेसी

सुबह आफिस जाने लगा तो श्रीमती जी ने कहा, अजी सुनते हो! आज जरा जल्दी लौट आना। शर्मा जी के यहाँ शाम को चलना है, उनकी अनारकली का बर्थ डे है। उनकी मिसेज कल ही कह गयी थी कि आप दोनों जने जरूर आइयेगा।
यह तो जानता था कि शर्मा जी मुहल्ले के बडे़ आदमी है। किसी कम्पनी मे ऊँचे पद पर है। घर मे सारी भौतिक सुविधाओं के साथ सवारी के लिए एक कार भी रख छोडी है, जिसका उपयोग वह तो कम उनकी श्रीमती जी ज्यादा करती है। मुहल्ले वालों पर रोब ग़ालिब करने के लिए वह पास पड़ोस की महिलाआंे को भी कभी-कभार बाजार जाते समय कार मंे बिठा लेती है। इन महिलाओं से काम तो नौकरानियो का ही लेती है, लेकिन बहन जी बहन जी भी करती रहती है। काम भी निकल जाये और बुरा भी न माने।
दो चार बार मेरी श्रीमती जी को भी कार मे घुमा क्या दिया, वह भी उनकी भक्त हो गयी है। जब देखो उनकी प्रशंसा के पुल बांधती रहती है।
शर्मा जी जब कार लेकर ले आये तो श्रीमती जी ने ही पहले पहल इसकी जानकारी मुझे दी थी। लेकिन उनके यहाँ अनारकली कब आयी, इसकी सूचना आजतक मुझे नहीं मिली थी। आज पहले-पहल उसके बारे मे सुन रहा हूँ।
शर्मा जी बड़े आदमी ठहरे। बड़े आदमियों की बड़ी बाते होती है। इस कारण अधिक कुछ नहीं पूछा। श्रीमती जी को भी अब कुछ नहीं कहना है यही सोचकर अपनी साइकिल आगे बढ़ाई ही थी कि पुनः उनकी आवाज सुनाई पड़ी, अजी भूलना मत, जल्दी ही लौटना आफिस से….और सुनो, उसको देने के लिए कोई चीज जरूर ले लेना, यह निर्देश देकर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया।
बन्दा भी साइकिल पर सवार होकर पैडल मारते हुए आगे बढने लगा, यह सोचते हुए कि बेतन तो सरकार देती है, लेकिन आने जाने के समय का निर्धारण खुद श्रीमती जी करती है, शायद सोचती है, आफिस न हुआ खाला जी का घर है। जब मन आया गये, जब न आया नहीं गये।
मेरे साहब मुझ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहते है। शादी शुदा है, इस कारण पति की पीडा को समझते है। तभी तो जब हाफटाइम की छुट्टी मांगी तो पहले मेरे मासूम चेहरे को देखा, फिर मुस्कुराकर अपनी स्वीकृति दे दी।
जल्दी घर लौटने की समस्या तो हल हो गयी, लेकिन सबसे बड़ी समस्या जो थी वह थी अनारकली के लिए प्रेजेन्टेशन। मेरे जैसे मंदबुद्धि वाले की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लूँ।
विधार्थी जीवन मे जब प्रयागराज में पढता था तो ‘मुगले आज़म’ की अनारकली को फिल्म में देखा था। लेकिन मुहल्ले के शर्मा जी की अनारकली को मैंने कभी नही देखा। फिर बिना देखे-समझे कैसे क्या लूँ?
मेरी समझ ने जब समझने से इंकार कर दिया तो, हार कर मुगले आज़म मे देखे अनारकली को ही प्रतीक मानकर प्रजेंटेशन लेने चल दिया।
शर्मा जी की अनारकली को भी पैदा होना था तो महीने के आखिर में ही पैदा हुई। महीने के पहले हफ्ते मे पैदा होती तो कुछ और ही रंग होता। बर्थ डे भी तो महीने के पहले हफ्ते मे पड़ा करता। अंत में तो घर का खर्च चलाना ही मुश्किल हो जाता है। ऐसे मे कोई अच्छा गिफ्ट कहाँ से लिया जाये? वह भी अनारकली के लिए।
उधार देने वालों में ले-देकर एक चरणदास ही ऐसा है, जिससे कुछ न कुछ मिल जाता है। बाकी तो सब ऐसे हैं कि उनके सामने मुँह खोलने का दिल ही नहीं करता। इस बार भी बेचारे ने ज़बान खाली जाने नहीं दिया। उधार में एक साड़ी दे दी, इस शर्त पर कि पहली को तनख्वाह मिलते ही घर जाने से पहले साडी का पैसा इधर से देते जायेंगे। मुझे ज़रूरत थी तो उस समय उसकी शर्त स्वीकार कर ली। सोचा, चरणदास अपनी दुकान देखेगा कि पहली तारीख को मेरा पीछा करेगा। कोई जरूरी है कि उसकी दुकान वाली सडक से ही होकर आफिस जाया करे। बगल वाली गली से तो और भी नजदीक पडता है। इतर से बस एक लाभ है कि साइकिल से उतरना नही पडता, गली वाले रास्ते मे नाला पडने के कारण दो जगह उतर कर हाथ में साइकिल उठाकर कर नाली पार करना पडता है। वह रास्ता उतना अच्छा नहीं है।
करूँ भी तो क्या करूँ? इसके अलावा और कोई चारा भी तो नहीं। पहली तारीख को चरणदास को ही पांच सौ दे दूंगा तो महीने का शेष खर्चा कैसे चलेगा। वैसे भी साडी इतनी महंगी न लेता तो लोग क्या कहते? दो महीने बाद तो गुड़िया की शादी है।आज उन्हे पांच सौ की साड़ी दूंगा तो उसकी शादी मे कम से कम हजार की देगे ही, साड़ी लेकर घर पहुँचा तो मन ही मन खुश था। श्रीमती जी हर बार मुझे कोसती थी कि मुझे बाजार करना नहीं आता। इस बार तो मेरी प्रशंसा जरूर करेगी।
साइकिल की आवाज से ही उनको पता लग गया कि मैं आ गया हूँ। तुरन्त दरवाजा खोलकर पूछा, क्या लाये हो?
खुशी से उनकी ओर पैकेट बढ़ाते हुए कहा, देख लो, फिर मत कहना कि मुझे खरीदारी करनी नहीं आती।
पैकेट खोलकर साड़ी देखते ही श्रीमती जी मेरे ऊपर ऐसे बरस पड़ी, जैसे अचानक बिना बादल के बरसात के साथ ओले गिरने लगे हो। मैं अपनी गलती महसूस करने लगा कि बडे लोगो के यहाँ तो पांच सौ की साड़ियां नौकरानियाँ पहनती होगी, फिर यह साड़ी शर्मा जी की अनारकली क्या पहनेगी? अपनी भूल पर पश्चाताप कर ही रहा था कि श्रीमती जी गरजती हुई बोली-कुतिया के लिए यही लाना था?
पहले तो मेरा माथा ठनका, शायद श्रीमती जी को शर्मा जी की अनारकली से ईष्र्या हो रही है। इसी कारण उसे मानव जाति से हटाकर पशु की श्रेणी मे रख रही है। गुस्सा जब कुछ कम हुआ तो उन्होंने स्वयं ही सब स्पष्ट किया, तब कही जाकर समझ में आया कि शर्मा जी की बिलायती कुतिया का देशी नाम अनारकली है। आज वह दो साल की हो जायेगी, उसी के उपलक्ष्य में बर्थ-डे मनाया जा रहा है।
साड़ी तो आ ही गयी थी, सोचा श्रीमती जी की सभी साड़ियां पुरानी हो गयी है। इसका रोना भी रो रही थी। मौका अच्छा है, क्यों न उनकी ही मक्खनबाजी ही कर डालू। तुरन्त बोला-अच्छा ही हुआ, इसी बहाने तुम्हारे लिए एक साडी आ गयी। अब जल्दी पहन कर तैयार हो जाओ। शाम के शो में पिक्चर देखने चलेंगे। रही बात शर्मा जी के यहाँ जाने की तो उसके लिए कोई बहाना बना देना। उसमें तो तुम माहिर हो ही।
मेरी मक्खनबाजी सफल रही। तभी तो वे जाते-जाते मुस्करा कर मीठी फटकार देती गयी- अजी हटो, तुम बड़े ओ हो।
-राजेन्द्र परदेसी

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