मॉरीशस के वरिष्ठ साहित्यकार रामदेव धुरंधर से राजेन्द्र परदेसी की बातचीत ।
प्रश्न 1 – मित्र रामदेव धुरंधर जी, आपसे एक महत्वपूर्ण प्रश्न करता हूँ। हिन्दी जगत में एक धारणा बनी होती है आप भारत के नागरिक थे जो मॉरिशस में जा कर बस गए हैं। आप इस पर क्या कहेंगे?
उत्तर – आपका प्रश्न स्वयं मेरे लिए महत्वपूर्ण होने के साथ एक जरूरी प्रश्न है। इसी अनुपात से इसका उत्तर करना भी मेरी ओर से नितान्त जरूरी है। मेरी बात इस तरह से है इसका मैं हमेशा के लिए खुलासा कर देना चाहता हूँ। डा. गंगाप्रसाद विमल जी ने इस प्रसंग पर एक लेख लिखा था। उनके शब्द थे – पहले पहल धुरंधर जी की हिन्दी और अभिव्यक्ति देखने पर हम यही समझते थे कि वे भारतीय हैं। अब परदेसी जी, आप का प्रश्न कुछ ऐसा ही होने से मैं आपके लिए उत्तर में लिख रहा हूँ मेरा जन्म मॉरिशस में हुआ है।
पूरा विवरण देता हूँ।
रामदेव धुरंधर
जन्म — 11 – 06 – 1946
स्थान – कारोलीन बेल एर
मॉरिशस
मेरे परदादा उत्तर प्रदेश जिला गाजीपुर परगुना बलिया गंगौली से सन् 1858 में मजदूर के रूप में मॉरिशस आये थे। मैं मॉरिशस में चौथी पीढ़ी से हूँ। मेरा जन्म जिस गाँव और जमीन में हुआ था आज भी मैं वहीं रहता हूँ। बस मकान का चार पाँच बार नवीनीकरण हुआ है। इस जगह को छोड़ने की बाध्यता अनेक बार आई, लेकिन मेरे भीतर एक अमूर्त सा संकल्प निभता होगा रहना तो मुझे यहीं है। मैं यहीं से दूर – दूर जा कर पढ़ाई करता रहा। कालांतर में मैंने अपने बच्चों को यहीं से कहीं भी पढ़ने के लिए भेजा। मैंने अपने इस ग्रामीण मन की गोद में बैठ कर अपने जीवन की धूप – छाँव को जाना है और उसे जीने में कहीं असफल हुआ तो कहीं सफलता ने मेरे कदम चूमे हैं।
प्रश्न 2 — आपने लेखन कब प्रारम्भ किया, आपके प्रेरणा स्रोत क्या थे और आपकी प्रथम रचना कब और कहाँ प्रकाशित हुई ?
उत्तर – मेरे अपने ही देश की एक पत्रिका में मेरी पहली रचना छपी थी। इसके बाद मैंने भारत की ओर रुख किया था। मैं धर्मयुग पत्रिका की अच्छी जानकारी रखता था। अतः मैंने वहीं अपनी पहली कहानी भेजी थी। यह सन् 1973 की बात है। धर्मवीर भारती जी संपादक थे। कहानी का शीर्षक था प्रतिफल। कहानी स्वीकृत हुई थी। फोटो और परिचय मांगे जाने पर मैंने भेजा था। पत्र व्यवहार में बहुत दिन निकल गए थे। अब कंप्यूटर होने से काम जल्दी से पूरा हो जाता है, लेकिन उन दिनों समस्या बहुत विकट थी। फिर भी मैंने किसी तरह लेखन जारी रख लिया और भारत में मेरी रचनाओं के प्रकाशन की संभावना बनती गई। मैं आपको बता दूँ मैंने शुरु से कहानियाँ ही लिखीं और बाद में उपन्यास के लिए मैं प्रयत्नशील हुआ। मेरे लिए अच्छी बात हुई थी धर्मयुग की अपनी पहली कहानी से मैं थोड़ी चर्चा में आ गया था। भारत में कहानीकार के रूप में मेरी पहचान बनने में ऐसा भी हुआ था सन् 1975 में जब नागपुर में पहला विश्व सम्मेलन आयोजित हुआ था धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती जी की सिफारिश पर मुझे उस सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत सरकार की ओर से हवाई टिकट उपलब्ध करवाया गया था। वही अवसर हुआ मैंने मंच पर कालजयी शब्द साधिका महादेवी वर्मा जी को देखने के साथ उन्हें सुना भी था।
प्रश्न ३– आपकी लिखी रचनाओं की मुख्य प्रवृत्तियाँ क्या हैं, इस सन्दर्भ में कुछ विस्तार से बतायेंगे ?
उत्तर – जी हाँ। मैं विस्तार से बताने की कोशिश करता हूँ। मैं कथ्य के अनुरूप अपनी रचनाओं का निर्धारण करता हूँ। मुझे कहानी लिखना जरूरी लगा तो मैंने कथ्य के संदर्भ में विचार मंथन शुरु किया। शुरु — शुरु में कहानी के अनुरूप मुझे शब्दों की कमी तो बहुत पड़ती थी। मैं आपको बता दूँ मॉरिशस में हिन्दी बोलचाल की भाषा नहीं है और न ही लिखित रूप यह ज्यादा धारदार है। मेरी अपनी बात है मेरी मातृभाषा भोजपुरी है। पर मैंने हिन्दी की पढ़ाई दमदार रूप से की और लिखा तो इसी भाषा में। पर ऐसा भी है हिन्दी में लेखन करने के लिए शुरुआती दिनों में मेरे लिए भयानक रुकावट इस तरह से रही थी खेत, मजदूर वगैरह का वर्णन करना पड़ता था तो मैं बहुत हद तक ठिठक जाता था। बात यह थी मेरी आवश्यकता के अनुसार मेरे देश में हिन्दी के शब्द प्रचलन में होते नहीं थे। यहाँ कृओल एक भाषा है जिससे पूरे देश का काम निकलता है। कुदाल, खुरपी, उर्वरक, गन्ने की रोपाई खेतों वाले ये सारे शब्द यहाँ अपरिचित होते हैं। घर की ही बात लें पलंग, कुरसी, मेज, चम्मच, आलू, छुरी ये सारे शब्द यहाँ कृओल से हैं। मैं स्वयं कृओल शब्द बोलने वालों के बीच रहते यही बोलने की आदत रखता हूँ। एक वाक्य देखिये खेत में ‘पीमा’ बा। इसमें पीमा शब्द आ गया है। भोजपुरी का वाक्य होने से भारत में अनुमान से पकड़ लिया जाएगा पीमा शब्द से मैं कुछ कहा जा रहा है। पर मुझे हिन्दी में स्पष्ट रूप से लिखना तो पड़ेगा ताकि उसका अर्थ यथावत पैठ पाए। पीमा मिर्च को कहा जाता है। मेरा लिखा विशेष कर भारत में पढ़ा जाए तो वहाँ के पाठक जरूर मेरे ध्यान में रहे। मैंने सात खंडीय पथरीला सोना उपन्यास लिखा है। इसमें लगभग छह सौ पात्र हैं। मेरे इस खंडीय उपन्यास में यहाँ के तमाम समुदायों के लोग गुंफित हैं। यह ऐसा है भाषा के मामले में मुझे मानो युद्ध लड़ना पड़ा है। यहाँ जो हिन्दी भाषी न हो उसे हिन्दी में ढाल कर लिखना तो बहुत ही कठिन रहा, लेकिन मेरे अपने साहित्यिक जीवट से यह संभव हो पाया है। दूसरे शब्दों में जैसे भी, मैं अपने लेखन से संतुष्ट हूँ। अब तो मेरी सभी पुस्तकों पर आधारित मेरी रचनावली छप चुकी है। रामदेव धुरंधर रचनावली बारह खंडों में है। मानता हूँ यदि मैंने अपने देश में हिन्दी के लेखक के रूप में अपने को तपाया है तो इसका श्रेय सही मायने में मुझे लौटा है।
प्रश्न ४- आपके लेखन के कौन -- कौन से मोड़ हैं?
उत्तर – आपका प्रश्न बहुत ही सटीक है। मुझे लगता है पूछा ही इस तरह से गया है कि मैं अपने लेखन के मामले में दिल खोल कर बात कर सकूँ। सब से पहले आप को बता दूँ मैंने अब तक गद्य में लेखन किया है। बोलचाल की भाषा तो गद्य ही है। मेरी अपनी धारणा है लोग जिस तरह बोलते हैं या मैं जिस तरह से बोलता हूँ मेरे साहित्य को यही होना है। आपके प्रश्न के अनुरूप मेरा उत्तर कुछ इस तरह से हाजिर है मैंने कहानी से लेखन की शुरुआत की थी तो बहुत से वर्ष कहानी लेखन में ही अपने को समर्पित करता रहा। धर्मयुग, आजकल, सारिका, निहारिका इस तरह और भी पत्रिकाएँ रहीं जहाँ मेरी कहानियाँ स्वीकृत होने पर प्रकाशित भी हुईं। पर पुस्तकाकार में छपने को सब से पहले मेरे उपन्यास छपे। राजकमल प्रकाशन ने सन् 1977 में मेरा पहला उपन्यास ‘छोटी मछली बड़ी मछली’ प्रकाशित किया था। प्रभात प्रकाशन, नेशनल पब्लिशिंग हाईस, पूर्वोदय प्रकाशन, सामयिक प्रकाशन, सर्वभाषा प्रकाशन इस तरह से और भी प्रकाशक मेरे उपन्यास प्रकाशित करते गए। मेरा पहला कहानी संग्रह सन् 1975 में प्रकाशित हुआ। बिड़ला फाउंडेशन की ओर से प्राप्त राशि से यह कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ था। कहानी संग्रह का शीर्षक था विष मंथन। इसके बाद मेरी मेरे कहानी संग्रह प्रकाशित होने का एक तरह से सिला बन गया।
प्रश्न ५– साहित्य की किसी एक विधा से न जुड़कर आप अनेक विधाओं से जुड़े हैं ऐसा आपके लिए कैसे सम्भव हो पाया है कि आप सभी विधाओं के साथ अपेक्षित न्याय कर रहे हैं।
उत्तर – इस प्रश्न के लिए मैं आपको तहे दिल से धन्यवाद देता हूँ। यह प्रश्न मुझे अपने अब तक के अपने लिखित और प्रकाशित कृतियों से जोड़ने का काम कर रहा है। मैंने जिक्र किया सात खंडों में मेरा पथरीला सोना उपन्यास प्रकाशित हो चुका है। यह उपन्यास यहाँ के जन जीवन और खेतों से संबंधित कथ्य पर आधारित है। इस सात खंडीय उपन्यास को ध्यान में रखते हुए मुझे इफको की ओर से दिल्ली में सम्मानित किया गया। इस सम्मान में ग्यारह लाख रुपए संलग्न थे। मित्र राजेन्द्र परदेशी जी, इतना बड़ा पुरस्कार और सात खंडों का ऐसा उपन्यास मेरे जीवन में बहुत बड़ा मायने रखता है। मैंने इस खंडीय उपन्यास के लेखन के लिए लंबी तैयारी की थी। पच्चीस साल की गिनती मैं रखता हूँ। मैंने जब यह लिखना शुरु किया था तो यह अबाधित रूप से चलता रहा था। इसने मुझे परेशान भी बहुत किया था। पर यह लेखन की परेशानी थी जिसे मैंने हँसते – हँसते स्वीकार किया हो। मैंने और भी जितने उपन्यास लिखे वे प्रकाशित होते चल रहे हैं। ढलते सूरज की रोशनी मेरा यह उपन्यास सामयिक प्रकाशन की ओर से प्रकाशित हुआ है। यह खूब चर्चा में रहा है। मेरी अनेक कहानियाँ भारत के विश्व विद्यालयों की पाठ्य पुस्तकों में संलग्न हैं। यह बात भी कर लूँ पाँच लोगों ने अब तक मेरी कृतियों पर आधारित शोध लिख कर पी. एछ. डी. की डिग्री हासिल कर ली है।
उपन्यास और कहानी की ही तरह मैं लघुकथा लिखना बहुत पसंद करता हूँ। मैंने अब तक लगभग चार हजार लघुकथाएँ लिखी हैं। दो हजार के करीब मेरी लघुकथाएँ मेरे लघुकथा संग्रहों में प्रकाशित हो चुकी हैं। मैंने फेसबुक में अब तक सौ से ज्यादा लघुकथाएँ पोस्ट की हैं। मेरी लघुकथाओं की अच्छी सराहना होती रहती है और उसी अनुपात से लघुकथा में और आगे जाने का मेरा संबल पुष्ट होता रहा है। डाक्टर जयप्रकाश कर्दम, डा. हरीश नवल और इस तरह से और लोग भी हुए जिन्होंने फेसबुक में मेरे लिए लघुकथा सम्राट लिखा।
मेरा ध्यान व्यंग्य लेखन पर भी बराबर रूप से जाता रहा है। मेरे पाँच व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ व्यंग्य रचनाएँ अभी घर पर ही हैं जिनके प्रकाशन के लिए मैं उपाय में लगा हुआ हूँ। मैं जानता हूँ प्रकाशक के यहाँ भेजने पर वे प्रकाशित करने के लिए हामी अवश्य भरेंगे। इतना विश्वास तो मैंने कमा ही रखा है। निश्चित ही मेरी कामना रहेगी मेरा यह विश्वास और परवान चढ़े। अब मेरा काम तो यही बचा हुआ है लेखन में ही रमा कहूँ। अस्सी पार का आदमी हो चुका हूँ। साठ की उम्र में महात्मा गांधी संस्थान के प्रकाशन विभाग के संपादक की नौकरी से रिटायर हुए आज बीस साल बीत चुके हैं। मुझे लगता है मेरी आकाँक्षा इसी बात के लिए शेष है लेखन में अब भी अपने को तपाता रहूँ। मैंने लिखने का कुछ ज्ञान स्वयं अर्जित किया हो और बाकी ईश्वर ने अपनी ओर से माना हो बालक लिखना चाहता है तो उसे संबल से पुष्ट कर ही दिया जाए। अपने लेखन की और थोड़ी चर्चा कर दूँ। मैंने हिन्दी में दो विधाएँ ईजाद की हैं। वे हैं गद्य क्षणिका और गद्य – भँवर। गूगल ने इसके लिए लिखित हामी जाहिर की है। अपनी गद्य — भँवर विधा के लिए गूगल से मुझे लिखित रूप में जो मिला वह यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ।
गूगल से उद्धृत
गद्य – भँवर { विशेष कर मॉरीशस के प्रसिद्ध साहित्यकार रामदेव धुरंधर द्वारा शुरु किया गया एक अभिनव साहित्यिक प्रयोग } एक विशिष्ट गद्यात्मक लेखन शैली या गद्य लघु — विधा है, जिसमें लगभग 150 शब्दों की एक निश्चित सीमा के भीतर किसी विचार, सामाजिक विसंगति या जीवन के यथार्थ को चक्रवात या भँवर की तरह गहराई से प्रस्तुत किया जाता है।
*
मेरी कहानियों के बारे में गूगल से ही उद्धृत —
रामदेव धुरंधर की हर कहानी का अस्तित्व एक दूसरी से पृथक् है। कहानियाँ लेखक के अपने मॉरीशस के जनजीवन को रेखांकित करती हैं, साथ ही अपने देश की सीमा तोड़ने में सक्षम हैं। इस दृष्टि से इनमें हम विश्व मानव को समाहित पाते हैं। भाषा, शैली और अभिव्यक्ति में सिद्धहस्तता रखनेवाले रामदेव धुरंधर की कहानियों का भारत में स्वागत करने से यह परिभाषा स्वतः निर्धारित हो जाती है भारत की हिंदी के वटवृक्ष की एक टहनी, जो मॉरीशस की जमीन पर झंडे के समान फहर रही है, हम उसी का अभिनंदन कर रहे हैं।
प्रश्न ६- आजकल लेखन में स्त्री विमर्श की बड़ी चर्चा है, क्या साहित्य के सृजन के लिए ऐसे विमर्श की अनिवार्यता प्रासंगिक है ?
उत्तर – अवश्य अनिवार्यता प्रासंगिक है। बल्कि इस प्रासंगिकता का अपना मूल्यवान अर्थ रहा है। सीता, अनुसूया, सावित्री इन सारे चरित्रों से प्रकट तो यही होता है प्राचीन कवियों ने इनके संघर्षमयी जीवन को आधार बना कर इस तरह से उदाहरण सामने रखा है इनसे आने वाली पीढ़ियाँ जितना ज्ञान हासिल करना चाहे मानो महासागर भरा पड़ा है बाकी तुम्हारी सामर्थ्य पर निर्भर करेगा तुम कितना अर्जित कर सकते हो।
हमारे वर्तमान में चाहे वह भारत हो, मॉरिशस हो या दुनिया का कोई भी देश हो पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टि से स्त्री का हर क्षेत्र में उपस्थिति अनिवार्य है। जिस तरह घर चलने में स्त्री के बिना विषम कमी रह जाए उसी तरह प्रगति और उन्नति की जहाँ भी संभावनाओं के अंबार लगे हों वहाँ स्त्री का समीकरण हर कोण से अनिवार्य होगा। पता नहीं भारत में स्त्री विमर्ष को किस तरह परिभाषित किया जाता हो। इस परिप्रेक्ष्य में मैं अपने देश की बात बेबाकी से कर सकता हूँ। हमारे यहाँ स्त्री के मामले में परंपरागत रूढ़ियों का खंडन हो चुका है। अब मेरे देश में बेटियों को पढ़ाओ जैसा नारा लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यहाँ लड़कियाँ स्वतः पढ़ रही हैं और बड़े – बड़े ओहदों पर अपनी प्रभुता दर्ज कर रही हैं। परंतु हाँ, इस दिशा में और काम होना अभी बाकी तो है। हम आशावान हैं, शेष काम भी पूरे होंगे।
प्रश्न 7 — आपके लेखन का जो मूल्यांकन हुआ है ,या हो रहा है, उससे आप कहाँ तक संतुष्ट है ?
उत्तर – जितना हुआ है उसे मैं बहुत हद तक संतुष्ट हूँ। डाक्टर दीपक पांडेय और उनकी श्रीमती डाक्टर नूतन पांडेय दोनों ने संयुक्त प्रयास से एक कृति संपादित की है। उन्होंने शीर्षक रखा है रामदेव धुरंधर की रचनाधर्मिता। इस कृति में मेरी रचनाओं पर आधारित बाईस लोगों के आलेख हैं। संपादन में कुशलता इस रूप में दृष्टिगत होती है मैंने जिन — जिन विधाओं में लेखन किया है सब पर समान रूप से लोगों से लिखवाया गया है और लिखने वालों ने अपना समय मुझे समर्पित किया है। बल्कि इसमें उन लोगों का मेरे प्रति असीम प्रेम गुंफित है। कोई बिना औचित्य के किसी को कुछ नहीं देता। मेरे प्रति औचित्य का भाव दिखा कर इन लोगों ने मेरे प्रति निश्चित ही बहुत बड़ा उपकार किया है। इनका यह प्रेम मॉरिशस के लिए भी उतना है जितने मेरे प्रति है। अपने देश की जमीन से मैं इन्हें नमन करता हूँ। डा. दीपक और श्रीमती नूतन मेरी कृतज्ञता के तो और भी हकदार हैं। रामदेव धुरंधर की रचनाधर्मिता कृति की पहल इनकी थी जिसे इन्होंने सही मुकाम पर पहुँचाया है। डाक्टर दीपक ने मुझ पर आधारित और दो कृतियाँ लिखी हैं।
एक और कृति का मैं नाम ले रहा हूँ। वह कृति है रामदेव धुरंधर महाख्यान और सिहांवलोकन । इसके द्वय संपापक हैं – डाक्टर अमित कुमार गुप्ता और प्रोफेसर बलराम गुप्ता। इस कृति के लिए बीस तक लोगों ने लिखा है। अमित कुमार गुप्ता ने मेरी ही कृतियों पर आधारित पी. एछ. डी. का अपना शोध पूरा किया है। इसके अलावा मॉरिशस में बी. ए. और एम. ए, के पचास से भी अधिक विद्याथियों ने मेरी कृतियों पर आधारित शोध लिखे हैं। तो मित्र राजेन्द्र परदेशी जी, मैं समझता हूँ आपके प्रश्न के साक्ष्य में मुझे अपने बारे में इतना कुछ कहने का अवसर मिल गया। जहाँ तक संतोष की बात है उससे मैं अपने को भरा पूरा मानता हूँ। मैंने किसी से कहा नहीं मुझ पर लिखो। जिसने लिखा अपने दिल से। यह हिन्दी के प्रति उनका प्रेम होने के साथ समंदर पार के मुझ लेखक के प्रति प्रेम और साहित्यिक समझ का अवदान था जो इस रूप में मेरे हिस्से आ गया है।
प्रश्न 8 – इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?
उत्तर – इन दिनों में एक व्यंग्य उपन्यास लिखने में लगा हुआ हूँ। मैं नए सिरे से कुछ लिखना चाहता था तो मुझे व्यंग्य विशेष रूप से कारगर प्रतीत हुआ और मैं निर्विलंब इसी को थाम कर लिखना शुरु कर चुका हूँ। यह उपन्यास एक प्रयोग उपन्यास है। इसके लिए मेरी सोच बहुत हद तक आश्चर्य जनक है, लेकिन मेरा विश्वास है इसे मैं विश्वसनीय एवं हर कोण से सार्थक बना बनाऊँगा। मेरा विश्वास इस तरह से है यह उपन्यास इसी साल मैं पूरा कर दूँ और आगामी साल यह छप जाए।
रामदेव धुरंधर
मॉरिशस
