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राजनीतिक सफरनामा : मिलावटी सामग्री ने होश उड़ाए – कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

अब सारी मुहिम मिलवाटी सामग्री को जब्त कर लेने की है । त्यौहार आते ही खाद्य विभाग सक्रिय हो जाता है और खाद्य सामग्री बेचने वालों पर कार्यवाही करने लगता है, शेष दिनों के ऐसी कार्यवाही नहीं हो पाती । फोटो मेें देखा जा रहा है कि किस बेरहमी के साथ खाद्य सामग्री में मिलावट की जा रही है ‘‘अच्छा हम इतनी खतरनाक सामग्री खा रहे हैं’‘ एक स्वाभाविक प्रश्न सभी के दिमाग में घूमने लगता है । सही तो यह भी है कि त्यौहारों पर मिठाई, खोवा सहित कुछ अन्य सामग्री की मांग बढ़ जाती है तो थोक विक्रेता महिनों पहले ही खाद सामग्री बनानी शुरू कर देते हैं जाहिर है कि ऐसी खाद सामग्री शुुद्ध तो हो नहीं सकती, क्योंकि वह सामग्री ज्यादा दिनों तक खाने योग्य रह ही नहीं पाती । मिलावटी सामग्री महिनों तक सुरक्षित रह लेती है । मिलावट का ऐसा दौर जो इन दिनों टीव्ही या फोटो मेें देखने को मिला हैरान करने वाला लगा, लोग अपने सवाथ्र के लिए किसी भी तरह की बेईमानी करने से नहीं चूकेत भले ही दूसरे का जीवन दांव पर लग जाए । चारों ओर गंदगी, गंदे हाथ और पेर भी उनसे सामान बनाा जा रहा है फिर वह सामान भी मिलावट कर बनाया जा रहा है । जहां सामान बनता है वहां की गंगदी देखकर घिन आना तो स्वाभाविक है । एक सुन्दर से पैकेट मेें रख कर दी जाने वाली सामग्री कितनी गंदगी और मिलावट से युक्त है इसका आभास अब हुआ । इस बार कुछ ज्यादा ही छापा डालकर मिलावटी सामग्री को पकड़ा गया । लगभग हर राज्य मेें यह मुहिम चली और टनों सामग्री को नष्ट भी किया गया । बड़े शहरों मेें तो ऐसा हो भी गया पर छोटे शहरों के लोग अभी भी वह ही दूष्ति सामग्री खा रहे हैं । रक्षाबंधन का त्यौहार था तो जाहिर है कि मिष्ठान की बिक्री भरपूर होती है । हर एक परिवार को मिष्ठान चाहिए तो दुकानों से ही लेकर उपयोग किया जाता है वहीं दैनिक दिनचर्या मेें उपयोग आने वाली सामग्री मेें भी मिलावट की जा रही है, सरकार ने भले ही खुली सामग्री की बिक्री पर रोक लगाइ्र हो तो वे बंद पेकेट मेें मिलावटी सामान बेच रहे हैं और दाम भी मनमाने ढग से ले रहे हें । हर आदमी जागरूक नहीं होता वह सुन्दर पेकेट मेें छिपे सामना को लेकर आ जाता हे और खाता भी है । फूड प्वाइजनिंग की घटनाएं क्यों होती हैं यह भी समझ मेें आ गया । यह तो ठीक है एक स्कूल के मध्यान्ह भोजन मेें नमक की जगह डिटरजेर्न्ट मिलाकर बच्चों को दे दिया गया । खाना बनाने वाला नमक और डिटरजेन्ट मेें फर्क नहीं कर पाया यह तो विडम्बना की ही बात है । एक स्कूल मेें मध्यान्ह भोजन के नमक के डिब्बे में मरी हुई छिपकली मिली वो भी तब जब नमक खत्म होने जा रहा था । फूड प्वाइजनिंग की ऐसी घटनाएं बयां करती हैं कि खाद सामग्री बनाने वाले लापरवाही करते हैं । इन पर कठोर काय्रवाही तो होना ही चाहिए । अपने स्वार्थ के लिए लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता । खाद सामग्री का स्वच्छ रहना जरूरी है । खाद्य विभाग की ऐसी कार्यवाही तो सराहनीय है पर ऐसी कार्यवाही तो प्रतिदिन होते रहना चाहिए । कितने लोग भोजनालयों मेें, ढाबों में भोजन करते हैं उनके स्वस्थ्य के साथ भी तो खिलवाड़ हो ही रहा है । नमाीगिरामी होटलों मेें गंदगी पाई गई वहीं ढाबा मेेें तो गंदगी रहती ही है । मिलावट के खिलाफ पूरे देश में चल रहा यह अभियान सराहनीय है । उत्तरप्रदेश मेें विधानसभा के चुनाव भले ही दूर हों पर वहां चुनावी बिसात बिछने लगी है । चुनाव में हर पार्टी को जीत चाहिए और जीत तब ही मिलगी जब वे आम मतदाता को रिक्षा पायेगें पर अब रिझाने का तरीका बदल गया है अब एक दूसरे पर आरोप लगाकर अपने आपको श्रेष्ठ घोषित करने का चलन दिखाई देने लगा है । उत्तर प्रदेश मेें चुनाव होने हैं तो वहां घटित होने वाली छोटी सी घटना भी मुख्य हैडिंग बन जाती है । उत्तरप्रदेश मेें प्रतिदिन मुख्य हैडिंग बन रही है । उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की अयोध्या मेें हुई मछली पार्टी चर्चाओं में आ गई । वहां के मुखमंत्री ने अपने भाषणों में आरेप लगाया, वो इसलिए कि एक तो पवित्र सावन का महिना चल रहा है दूसरे अयोध्या पवित्र नगरी है तो चर्चा तो होनी ही थी । कांग्रस अध्यक्ष अजय राय ने भी उन्हें चुनोती दे दी ं कुछ वर्ष पहले सावन के महिना मेें बिहार मेें भी ऐसी ही मछली पार्टी हुई जेडीयू के नेता ने की थी वो भी सावन के ही महिने मेें । पर अभी चुनाव उत्तर प्रदेश मेें होना है तो चर्चा वहां की ही होगी । निष्द पार्टी से जुड़े नेता इसमेें कुद गलत नहीं मान रहे हैं उनकी समाज मेें मछली खाने का प्रचलन है । समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का एक उायलाग ‘‘हमने चवन्नी से रूपैया बनाया’’ भी चर्चाओं मेें रहा । अखिलेश यादव ने भले ही किसी का नाम न लिया हो पर सभी समझ गए कि ईशारा कहां किया गया है । तो फिर इसे जाट सम्मान से जोड़ दिया गया । राजनीति मेें आरोप-प्रत्यारोप तो होते ही रहते हैं, हर एक मुद्दा कुछ दिनों तक सुर्खियों मेें बना रहता है फिर दूसरा मुद्दा सामने आते ही वह गुम जाता है । वैसे भी जहां चुनाव होने वाले होते हैं वहां ऐसे आरोपों की बाढ़ आ जाती है । अब चुनाव मेें विकास की बातेें नहीं होती आरोपों की बातें होती है । एक दूसरे को बुरा घाषित करेगा तो दूसरा पहले वाले को । आम जनता दोनों की बातें वेसे ही सुनती रहती हैे जेसे वह चुटकुले सुनती है । उत्तरप्रदेश मेें चुनावी गर्मी ऐसे ही परवान चढ़ेगी । अभी तो बहुत सारे आरोप लगने है, आपने कुछ बोला नहीं कि उसका कुछ न कुछ उल्टा सीधा मतलब निकाल कर प्रस्तारित किया ही जाएगा । सभी नेता ऐसा करते हैं, आरोपों की अंत्याक्षरी खेली जाती है । इसके चक्कर मेें मूल बातें गुम हो जाती हैं । बारिश का मौसम हो और बाढ़ न आए ऐसा होता ही नहीं है । भारत के कई राज्यों मेें बाढ़ का प्रकोप चल रहा है । बाढ़ का मतलब है बरबादी । जन हानि भी होती है और धन हानि भी । फसेलें बरबाद हो जाती हैं, मकान ढह जाते हैं और जीवन बरबाद हो जाता है । इस बार भी ऐसा ही हुआ कइ्र राज्यों मेें इस बाढ़ ने वहां के निवासियों को बरबाद कर दिया है । भूस्खलन भी अब बड़ी समस्या के रूप् मेें सामने आने लगा है । कच्चे पहाड़ खासकर माटी के पहाड़ ढह रहे हैं और गांव के गांव को अपनी चपेट मेें ले रहे हें । बादलों को फटना, पहाड़ों की दरकना आम जन के लिए मुसीबत ही बन रहा है । पर इस पर कोई कुछ कर भी नहीं सकता । सरकार राहत देती है और एनडीआरएफ जीवन बचाने का काम करती है । गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान कुछ ज्यादा ही प्रभावित हुए इस बार, बाकी हिमाचल, प्रदेश उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर भी प्रभावित राज्यों में शामिल है । सरकार मदद कर रही है पर जो प्रभावित हुए वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं । जेनजी के जंतर7मंतर पर हुए आन्दोलन के बाद युवाओं के आन्दोलनों का सिलसिला बढ़ गया है । रांची से लेकर पटना तक युवा आन्दालित हैं वहीं छोटे-छोटे बच्चे भी अपनी मांगां को लेकर आन्दालेन करने लगे हैं जिन्हें ‘‘जेनजी अल्फा’’ कहा जाने लगा है । उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार से लेकर मध्यप्रदेश मेें भी अल्फा जेनजी के आन्दोलन चर्चाओं मेें आ चुके हैं । अपनी छोटी सी समस्या को लेकर भी वे आगे बढ़ रहे हैं और अफसरों तक अपनी आवाज पहुचा रहे हैं । देखने मेें तो यह सही लगता हे पर अफसरशाही के लिए यह नया सरदर्द बन गया है । सत्तारूढ़ दल भी आशंकित है और युवाओं की बातें गंभीरता से सुनकर उनका हल निकालने के निर्देश दिए जा चुके हैं । आन्दोलन की जरा सी भी सुगबुगाहट भयभीत कर देती है । जेनजी के लिए नौकरी और शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण हैं और उनके आन्दोलन इसी को लेकर हो रहे हें । सभी जानते हें कि देश में नौकरियां उतनी हेैं ही नहीं जितने बेरोजगार हैं । हर हाथ को काम चाहिए पर वो हो नहीं पा रहा है । कहीं पपेरलीक का मामला सामने आ जाता है तो कहीं नौकरी चयन की प्रक्रिया आरोपों के घेरे में आ जाती है । झारखंड मेें नौकरी प्रक्रियापर आरोप लगे और बहुत दिनों के बाद वहां के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आन्दोलनकिारियों की मांग मानकर सभी नोकरियां रद्द कर दीं । जो नौकरी पर लग गए थे उनके सामने अंधकार छा गया । जैसे-तेसे तो उन्हें नौकरी मिली थी, सरकार के एक आदेश ने उन्हें कुर्सी से ही उतार दिया, अब वे आन्दोलन करने लगे । वहां दोनों ओर से आन्दोलन अब भी जारी है, वहीं पटना मेें भी युवा हुंकार भर रहे हैं । सरकार के लिए मुसीबत न करो तो और करो तो । जाहिर है कि सत्तारूढ पार्टियों के सामने यह एक नई मुसीबत बनकर उभर चुकी है । इससे प्राशासिनक व्यवस्था भी प्रभावित होगी पर सभी को अपनी मांगों को मनवाने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा । वेसे हो सकता है कि सरकारें वैकेन्सी निकालने मेें भय खाने लगें, हो सकता है कि वे परीक्षा मेें भय खाने लगें फिर..? बिहार के एक अधिकारी ने ‘‘हाथी चले बाजार तो कुत्ता भौंकें हजार’’ जैसी कहावत कह कर नई मुसीबत पैदा कर दी । यह तो अच्छा हुआ कि वहां के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने तत्काल उसको सस्पेंड करने का आदेश दे दिया, वरना यह भी आन्दोलन का बिन्दु बन जाता ।
युवाओं का जाग्रत होना तो अच्छी बात है पर इस जाग्रति मेें स्वहित नहीं बल्कि सर्वहित के भाव होने भी जरूरी हैं । कॉकरोच जनता पार्टी ने देश के विभिन्न स्कूलों की स्थिति जानने का आव्हान किया और उनकी पार्टी के कुछ लोग राजस्थान के एक स्कूल मेें पहुंच भी गए । पर उस गांव के लोगांे को यह अच्छा नहीं लगा तो उन्होने उनके साथ मारपीट कर दी । अच्छा तो यह भी नहीं था । एक बार यह घटना सुख्रियों में आई तो अन्य स्थानों पर भी घटित होने लगी । अच्छा संकेत तो यह भी नहीं है । बहुत सारे युवा राजनीति से भी जुड़े हैं और उनके लिए अपनी पार्टी को किरकिरी से बचाना भी आवश्यक है तो वे इसका समर्थन क्यों करेगें । बहरहाल यह तो तय हो गया है कि छोटे स्कूलों मेें पढ़नंे वाले छात्र हों या उच्चशिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र वे अपने भविष्य को बचाने के लिए आगे आने लगे हेैंं । वैसे युवाओं को भी संयम बरतना जरूरी है जिस ढंग की भाषा का प्रयोग जंतर-मंतर पर हुए आन्दोलन मेें किया गया वह नहीं होना चाहिए । हमारा समाज ऐसे वक्तव्यों का कभी समर्थन नहीं करता । एक बुराई सारे किए कराए पर पानी फेर देती है ।

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