पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

संसद में आरक्षण लेकर करोड़पति बने नेता आरक्षण छोड़ना नहीं चाहते और अब जब इस बेतरतीब आरक्षण की समीक्षा पर चर्चा शुरू है तो आरक्षण की समीक्षा रोकने को लेकर उलूल जुलुल बयानबाजी कर रहें। कभी खड़गे का उदाहरण देकर तो कभी मांझी का उदाहरण देकर चिराग पासवान जैसे जातिवादी नेता अब बेनक़ाब हो रहें। सवर्णों ने जब से सुना है कि बेरोजगारी दर इसी सुरसा आरक्षण के कारण उनमें सबसे अधिक है तबसे सवर्ण उग्र हो कर आरक्षण समीक्षा कि मांग उठा रहे। और विपक्षियों की दुष्टता देखिए, सब शांत है जबकि सवर्ण सड़को पर है। भाजपा मजबूर है क्यूंकि वह इस आरक्षण के मुद्दे पर खुलकर सवर्णो के साथ आ नहीं सकती। सवर्ण भाजपा के सवर्ण नेताओं से बेहद नाराज है और अब उनका वर्चस्व सवर्ण वोटरों की दया पर निर्भर है। जबसे सवर्णो ने जाना की उनका वोट शेयर 40% है तबसे सवर्णों का पारा हाई हाई और विपक्ष को सांप सूंघ गया है। आरक्षण के समीक्षा और एससीएसटी क़ानून खत्म करने की मांग को लेकर अब मामला स्पष्ट है कि यदि ये दोनों मुद्दे हल नहीं हुए तो सभी राजनीतिक दल फसेंगे। एक व्यंग्य ऐसा भी इसी मुद्दे पर वायरल है कि ज़ब स्वर्गाधिपति देवराज इन्द्र को देवर्षि नारद ने बताया कि किस प्रकार मोदी जी द्वारा भव्य भारतवर्ष की पुण्य भूमि पर बिना थके- बिना रुके- बिना कभी कोई छुट्टी लिए ही एक के बाद एक ताबड़तोड़ विकास कार्य किये जा रहे हैं, तो विकास कार्यों की कीर्ति सुन शचीपति वज्रपाणि इंद्र ने जलदेवता वरुण को कहा कि वे स्वयं भारत जाकर विकास कार्यों का जलाभिषेक कर मोदी जी को सम्मानित करें। इंद्र का आदेश मिलते ही जल देवता भारत पहुंच गये और मोदी जी द्वारा नवनिर्मित संसद भवन सहित कई नवनिर्मित पुलों, राजमार्गों का जलाभिषेक कर आये लेकिन बहुत ही शर्म की बात है कि होल स्क्वायर किस्म के लोग मोदी जी के करकमलों द्वारा उद्घाटित नये संसद भवन सहित अन्य भव्य निर्माण कार्यों के जलाभिषेक के वीडियो यह कह कर शेयर कर रहे हैं कि यहां तो बाढ़ आई है। ऐसी ही बाढ़ सवर्ण आंदोलन के रूप में आई जिसने कॉकरोच आंदोलन को खत्म सा कर दिया। 7 अगस्त,1990 को संसद में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर सरकारी सेवाओं में 27% आरक्षण देने की घोषणा की थी जो एक प्रकार की खैरात थी । मंडल कमीशन यानी पिछड़ा वर्ग आयोग की ज्यादातर सिफारिशें अभी भी धूल फांक रही हैं क्यूंकि नेताओं को भी पता है कि दलित वंचितों का सबसे अधिक शोषण उन्ही के समाज के नेताओं ने किया है ब्राह्मण वर्ग तो बस बदनाम किया जाता है जबकि ब्राह्मण सहृदयी होते है ।
कुतर्क ऐसा कि आरक्षण इसलिए दिया जा रहा कि दलितों का इतिहास में ब्राह्मण वर्ग द्वारा शोषण हुआ है जबकि इतिहास यह चीख – चीख कहता है कि ब्राह्मण कभी शासक रहा ही नहीं जो शोषण कर सके, इस पर चर्चा करने को कोई तैयार नहीं है कि समाज के वंचित तबके का शोषण सवर्णों ने किया है यह झूठ दलितों के समाज के नेताओं ने राजनीति करने के लिए फैलाई क्यूंकि इस झूठ का कोई प्रमाण नहीं। बस एक रटा रटाया झूठ जिसकी शुरुआत छुआछुत के मनगढंत कहानियों से है तो यह क्यों नहीं बताते की यह छुआछुत तुम्हारी मांसाहारी प्रवृत्ति के कारण है। तुम मांस मदिरा करते हो इसलिए यह छुआछुत रही है। तुम्हारे उत्थान के लिए की गई संस्तुतियां अब तक लागू क्यों नहीं कराई जा सकीं यह सोचो ! कारण तुम्हारे पिछड़े समाज के ही नेता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी खुद आरक्षण का लाभ ले रहें। कमीशन ने ‘पूरी योजना’ लागू करने के 20 साल बाद इसकी समीक्षा करने की भी सिफारिश की थी आरक्षण की समीक्षा करने की बात तो अक्सर कोई न कोई छेड़ देता है पर ये दलित नेता मलाई खाने के चक्कर में समीक्षा होने ही नहीं देंगे। मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट के अध्याय 13 में कुल 40 प्वाइंट में सिफारिशें की हैं। पहले प्वाइंट में ही कहा गया है कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ापन और गरीबी, जाति आधारित बाधाओं की वजह से है यह बाधाएं दलित और पिछड़े समाज ने खुद बनाई है और यह सामाजिक ढांचे से जुड़ी हुई हैं। इन्हें खत्म करने के लिए ढांचागत बदलाव की जरूरत होगी। देश के शासक वर्ग के लिए ओबीसी की समस्याओं की अनुभूति में बदलाव कम महत्वपूर्ण नहीं होगा। इस ढांचागत बदलाव के लिए कमीशन ने नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में आरक्षण न देने की सिफारिश की उन्होंने केवल आर्थिक आधार को ही लागू करने की सहमति जताई थी। सिफारिश में आयोग ने आरक्षण लागू करने की खराब गुणवत्ता, ओबीसी की स्थिति में कुछ नौकरियों के चलते बदलाव न होने, मेधावी अभ्यर्थियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ने जैसे तमाम तर्कों पर सहमति जताई थी। सवर्ण गरीबों के लिए आरक्षण लागू किए जाने के विरोध को लेकर भी आयोग सतर्क था। अभी जिन तर्कों के साथ आर्थिक आधार पर आरक्षण का विरोध किया जाता है, वही सब तर्क शुरुआत से रहे हैं। इन तर्कों पर अपनी सिफारिशों में आयोग ने कहा, ‘निश्चित रूप से यह सही है कि आर्थिक आधार के लिए आरक्षण से तमाम अन्य लोगों का कलेजा दुखेगा लेकिन क्या इस तकलीफ के कारण हम सामाजिक सुधार के नैतिक दायित्व को छोड़ सकते हैं ? जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा था, तब भी तमाम लोग ऐसे थे, जिनका दिल दुखा था। मौजूदा समय में एक बड़ा तर्क यह भी दिया जाता है कि कुछ जातियां आरक्षण का पूरा लाभ ले रही हैं. शेष पिछड़ा वर्ग वंचित रह जा रहा है। इस तर्क का जवाब भी मंडल कमीशन ने देते हुए अपनी सिफारिशों में लिखा है, ‘इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि आरक्षण व कल्याणकारी कदमों का ज्यादा लाभ उन लोगों को होगा, जो पिछड़े समाज में ज्यादा आगे हैं। फिर समीक्षा क्यों नहीं ! ऐसी जातियों को आरक्षण से बाहर करो। लेकिन क्या यह सार्वभौमिक सत्य नहीं है कि तुम्हे सवर्णों का शोषण करना है संविधान के नाम पर ? सभी सुधारवादी उपचार पदानुक्रम में धीरे धीरे होते हैं, सामाजिक सुधार में कोई अचानक उभार (क्वांटम जंप) नहीं होता। कमोबेश मानव स्वभाव रहा है कि वर्ग विहीन समाज में भी आखिरकार एक ‘नया वर्ग’ उभरकर सामने आता है। आरक्षण का मूल लाभ यह नहीं है कि सवर्णों कि प्रतिभा दबाकर समतावादी समाज उभरकर सामने आए, जबकि पूरा भारतीय समाज असमानताओं से भरा पड़ा है। लेकिन आरक्षण से निश्चित रूप से ऊंची जातियों कि प्रतिभाओ को खत्म करने और सरकारी सेवाओं में दलित पिछड़ो के कब्जा करने का कुत्सित छल है जो संविधान में पोषित होता रहा है। मोटे तौर पर गरीब सवर्ण देश के शासन प्रशासन में थोड़ी हिस्सेदारी प्राप्त कर सकें यही रोकना आरक्षण का मूल उद्देश्य है। इस समय यह बात अक्सर उठती है कि आरक्षण लागू होने पर भी दलित और पिछड़े वर्ग को क्या लाभ हुआ या नहीं ! अब तो दलित और पिछड़े वर्ग से जुड़े लोग भी कहने लगे हैं कि आरक्षण का पूरा लाभ चिराग पासवान, अठावले खड़गे जैसे उच्च दलित उठा रहें जबकि निम्न दलित अब भी वही खड़ा है अंतिम पायदान पर जहां पिछले सत्तर साल से उसे कोई लाभ नहीं है। भारत में सरकारी नौकरी को हमेशा से प्रतिष्ठा और ताकत का पैमाना माना जाता रहा है। सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रतिनिधित्व बढ़ाकर हम उन्हें देश के प्रशासन में हिस्सेदारी की तत्काल अनुभूति देंगे लेकिन यह सिस्टम को कमजोर करेगा क्यूंकि अयोग्य चुनें जायेंगे। जब एक दलित और पिछड़े वर्ग का कम अंक वाला अभ्यर्थी कलेक्टर या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक होता है तो उसके पद से भौतिक लाभ उसके परिवार के सदस्यों तक सीमित होता है ज्ञान अल्प होता है और समाज में विकृती फैलती है। रोकना होगा यह आरक्षण सिस्टम जिसका लाभ केवल नेता और अधिकारी उठा रहें। गरीबों तक पहुंचाने के लिए आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करना होगा नहीं तो देश गृहयुद्ध और जनसंख्या विस्फोट की ओर बढ़ेगा।
