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1991 के आर्थिक संकट में एस. वेंकिटारमनन की निर्णायक भूमिका

आज गवर्नर फ़िल्म देखकर 1990-91 में भारत के आर्थिक संकट की भयावह याद ताज़ा हो गई, जब भारत लगभग दिवालिया होने के कगार पर खड़ा था। आज भारत 693 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ विश्व के अग्रणी देशों की क़तार में खड़ा है। तब यह विश्वास करना कठिन था कि साढ़े तीन दशक पहले देश के पास वित्तीय दायित्वों को पूरा करने के लिए मात्र पन्द्रह दिनों का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था।
तत्कालीन आरबीआई गवर्नर एस. वेकिटारमनन (22/12/1990 से 21/12/1992) राजनीतिक अस्थिरता के उस दौर मे अपने समकालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा के सहयोग से आर्थिक संकट को फ़िलहाल टालने में सफल रहे और देश एक सुनिश्चित परिणाम, दिवालिया होने से बच गया।
1980 के दशक में अर्थव्यवस्था आयात पर निर्भर थी तथा प्रयासों के बाद भी निर्यात में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही थी। राजकोषीय घाटा बढ़ता गया और विदेशी ऋण पर निर्भरता बढ़ती जा रही थी।
1990 में इराक़ द्वारा कुवैत पर आक्रमण तथा बाद में अमेरिका द्वारा हस्तक्षेप से खाड़ी युद्ध भयंकर हो गया जिससे तेल की क़ीमतें आसमान छूने लगी। भारत अपनी ज़रूरतों का ८०% तेल आयात करता था फलतः उसका विदेशी मुद्रा भंडार तेज़ी से गिर कर १.२ अरब डालर के निचले स्तर पर आ गया था। यह राशि तीन सप्ताह के वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने में भी सक्षम नहीं थी और देश का दिवालिया होना बस समय की बात रह गई थी।
इस संकट का दूसरा कारक था—खाड़ी देशों से भारतीय नागरिकों द्वारा भेजे जाने वाले प्रेषण में अत्यधिक कमी। क्योंकि युद्ध के कारण भारतीय नागरिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत लौट रहे थे। इससे भारत का भुगतान संतुलन गंभीर स्थिति में पहुँच गया।
डांवाडोल आर्थिक स्थिति का कारण खाड़ी युद्ध के अतिरिक्त सोवियत संघ एवं उसके समर्थित संगठन देशों में बिखराव और कमजोर होना भी है। भारत के व्यापार में इस समूह का बड़ा योगदान था। इसके छिन्न-भिन्न होने से भारत का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ और व्यापार घाटा सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता चला गया।
इसका संयुक्त प्रभाव भारत के विदेशी मुद्रा रिजर्व पर पड़ा। वह तेज़ी से घटने लगा। तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य में केयरटेकर सरकार कोई बड़ा कदम उठाने में चाहते हुए भी खुद को असमर्थ पा रही थी।
यहीं से भारतीय रिजर्व बैंक के 18वें गवर्नर एस. वेंकिटारमनन की दृढ़ इच्छाशक्ति, मनोबल तथा देश को इस संकट से बाहर निकालने का जज़्बा सामने आया। इसके लिए वह राजनीतिक असमर्थता और सुधारात्मक कदमों में शिथिलता के सामने डट कर खड़े रहे। देश के हालात को सफलतापूर्वक सरकार के सामने रखा। प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर और वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा को हर संभव कदम उठाने के लिए आगे आना पड़ा और केन्द्रीय बैंक के गवर्नर का समर्थन करना पड़ा।
सबसे पहले उन्होंने आईएमएफ से लोन के लिए आवेदन किया। तत्कालीन परिस्थितियों में इसके मिलने की उम्मीद किसी को नहीं थी। कुछ शर्तों के साथ लोन मिलना तय हुआ। हालाँकि इसका पुरज़ोर विरोध देश में होने लगा।
इसके अतिरिक्त एस वेंकिटारमनन ने यूरोप दौरे पर जाकर जर्मनी, ब्रिटेन आदि देशों से बात कर द्विपक्षीय लोने के लिए राज़ी कर लिया। पर यह पर्याप्त नहीं था।
आने वाले दस दिन में स्थिति भयावह हो चली थी। चन्द्रशेखर सरकार गिर चुकी थी और कार्यवाहक सरकार के रूप में कार्यरत थी। रेटिंग एजेंसियों द्वारा देश की रेटिंग में गिरावट से आर्थिक स्थिति चरमरा चुकी थी। चुनाव बाद स्थायी सरकार के आने में अभी समय था।
अब देश की इज़्ज़त बचाने का एकमात्र तरीक़ा था “भारत में रिज़र्व गोल्ड को गिरवी रखना।” तभी आईएमएफ़ लोन देने क राज़ी था। पर यह देश की जनता कभी स्वीकार न करती। अन्ततः कोई और उपाय न होने से सरकार व रिजर्व बैंक इसके लिए तैयारी करने लगी।
भारत ने ज़ब्त किए गए बीस टन सोने को को यूनियन बैंक आफ़ स्विट्जरलैंड को भेजकर दो सौ मिलियन डॉलर की व्यवस्था की गई पर यह अपर्याप्त था। इसके बाद 46.91 टन सोना बैंक आफ़ इंग्लैंड को भेजकर चार सौ पाँच मिलियन का ऋण प्राप्त किया गया।
यह कार्य गोपनीय तरीक़े से अंजाम दिया गया। पर यह ख़बर लीक हो गई और राष्ट्रीय भावना आहत होने से जनता आक्रोशित हो गई क्योंकि वह सोने को राष्ट्रीय संपदा एवं स्वाभिमान का प्रतीक मानती थी। इसके लिए विरोध प्रदर्शन भी हुए। केयर टेकर सरकार और आरबीआई को जनता के विरोध व आलोचना का सामना करना पड़ा। इस कदम से भारत को तात्कालिक राहत मिल गई फिर उसने खुद को पुनः पुनर्जीवित किया। पर यह अस्थायी उपाय था।
जून 1991 मे नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार बनी जिसमें वित्तमंत्री का दायित्व महान अर्थशास्त्री एवं पूर्व में अनेक महत्वपूर्ण आर्थिक पदों पर कार्य कर चुके मनमोहन सिंह ने सँभाला।
नई सरकार ने इस संकट का अल्पकालिक समाधान ढूँढने के बजाय एस. वेकिटारमनन के साथ मिलकर समस्या को समझने का प्रयास किया और दीर्घकालिक नीतियाँ बनाई।
इसके अलावा जुलाई 1991 में भारतीय रुपये का दो बार अवमूल्यन करना पड़ा। इसका उद्देश्य रुपये को प्रतिस्पर्धी बनाना एवं निर्यात को प्रोत्साहन देना था।
नई औद्योगिक नीति और 24 जुलाई को पेश बजट ने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा दोनों बदल दी। भारत ने उदारीकरण, निजीकरण को अपनाया। विदेशी निवेश के रास्ते खोले गए, उद्योगो पर नियंत्रण ढीले किए गए और लाइसेंस परमिट व्यवस्था को खत्म करने की शुरुआत हुई। जिससे भारत की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती चली गई। वास्तव में 1991 का संकट भारत और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके पीछे पैंतीस वर्षों से चली आ रही नीतियो में निरंतरता, आर्थिक सुधार, निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका, वैश्विक व्यापार में बढ़ती हिस्सेदारी और बदलती आर्थिक संस्थागत संरचना है।
उदारीकरण का ही प्रभाव था कि भारत की जीडीपी 1991 में 266 अरब डॉलर से बढ़कर 2026 में 4.18 ट्रिलियन डॉलर पर पहुँच गई। विदेशी मुद्रा भंडार 692 अरब डालर तक पहुँच चुका है।
1991 के आर्थिक संकट को टालने में केन्द्र सरकार, रिजर्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं आदि की महत्वपूर्ण भागीदारी थी। लेकिन इन सभी के योगदान के पीछे सिर्फ और सिर्फ रिजर्व बैंक के गवर्नर एस वेंकिटारमनन द्वारा निर्भीक होकर उठाए गए कदम थे जिसकी, जितनी भी तारीफ़ की जाए, कम है। उन्होंने 1991 में भारत को आर्थिक झंझावात से निकाल कर भारत की आर्थिक व्यवस्था को बदलने का सोच दिया, एक दृष्टि दिया। जिससे भारत आज अग्रणी देशों में एक गिना जा रहा

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