पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

इसमें ग़लत है क्या कुछ..? ये जातिवादी गुंडे आरक्षणम देहि बोलते बोलते एक धरने में रोज़ घुसते हैं और बिना लॉग लपेट के खाना खाकर ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद बोलकर चल देते है। आख़िर ये सब नेता और साहेब के चेले ही तो हैं जिन्होंने अस्सी साल तक आरक्षण की भिक्षा मांंग कर मुफ्त में भर पेट खाया है। ये नये भारत के भिखारी हैं। इनका अंदाज़ थोड़ा अलग है माय फ्रेंड्स ! आज के युग में पैसा कमाना बहुत मुश्किल काम है, इतनी आसानी से नहीं होता जितना रील में दिखाया जाता है। जब से फेसबुक ने 2018 मे इस देश मे मोनेटाइजेशन सिस्टम शुरू किया है, हर व्यक्ति अपने समाज का ठेकेदार बनकर कंटेंट क्रिएट करता है, नफ़रत फैलाता है। हर किसी ने अपनी प्रोफाइल को प्रोफेशनल मोड में बदल लिया। हर आदमी के मन में एक ही बात ने घर कर लिया कि फेसबुक पैसा दे रहा है। और बस यहीं से एक नई जंग शुरू हो गई। एजेंडा सेट है कि बस ब्राह्मण को गाली दो और नेता बन जाओ। आज देश में हालात ये हैं की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 50 करोड़ लोग सोशल मीडिया पर हैं। इनमें अकेले फेसबुक पर करीब 40.3 करोड़ और इंस्टाग्राम पर 48.1 करोड़ यूजर हैं। सोचो, इतनी बड़ी भीड़ जब ये सोच लेगी कि सबको नफरती कंटेंट क्रिएटर बनना है तो क्या होगा। वही हुआ, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर रील बनाने वालों की भीड़ लग गई। शॉर्टकट से वायरल होने की होड़ में लोग अपनी जान, इज्जत, नींद और चैन तक दांव पर लगाने को तैयार हो गए। फेसबुक के मालिक की भी नींद उड़ गई। वो भी सोचने लगा कि इस देश में जितने यूजर हैं अगर सभी कंटेंट क्रिएटर बनकर पैसा छापने लगे तो इतनी पेमेंट कहां से करेगा। ये सिलसिला मोनेटाइजेशन शुरू होने से लेकर एआई के आने तक चलता रहा। कंपनी ने खुद बताया कि 2025 में उसने पूरी दुनिया के क्रिएटर्स को लगभग 3 अरब डॉलर बांटे हैं जो पिछले साल से 35% ज्यादा था। भारत में ही आज 20 से 25 लाख लोग ऐसे हैं जो सोशल मीडिया से पैसा कमा रहे हैं और वो देश में 350 से 400 अरब डॉलर की खरीददारी पर असर डालते हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि इस भीड़ में 90% लोगों की जेब में 100 डॉलर भी पूरे महीने में नहीं आते। पैसा सिर्फ उन्हीं को मिल रहा है जो सच में ओरिजिनल पोस्ट कर रहे है। इसीलिए आप सभी को एक सलाह है कि सवर्ण नफरत वाले लोगो को उनके वीडियो, फोटो पोस्ट मत करो। दूसरी एप का लोगो लगा हुआ कंटेंट और दूसरे का उठाया हुआ वीडियो डालोगे तो फेसबुक का लॉग उसे अन-ओरिजिनल और स्पैम मानकर आपका रेकमेंडेशन हमेशा के लिए बंद कर देगा। धीरे-धीरे आपकी प्रोफाइल की रीच 2% तक रह जाएगी। कुल मिलाकर दूसरे का इस्तेमाल किया हुआ कंटेंट डालने से बचो, जैसा भी लिख बोल सकते हो अपना लिखो, अपना बनाओ यहाँ बने रहो।नहीं तो भविष्य में ऐसा होगा कि आपकी फ्रेंड लिस्ट वाले लोग भी आपकी पोस्ट नहीं देख पाएंगे, फॉलोअर्स तो बहुत दूर की बात है। रही बात वायरल होकर पैसा छापने की, तो उसे भूल ही जाना बेहतर है। इस एआई वाले दौर में हर हफ्ते बदलाव देखकर सब पलायन ही करते नजर आएंगे।
हां मेरी समझ में एक बात नहीं आई कि इन जातिवादी नेताओं ने बस एक ग़लती की है वो ये कि एक ग़ैर हिंदू के कैफ़े पर पहुंच गए और मालिक को बुरा लग गया। इनको एक कट्टर सनातनी के होटल में जाना चाहिए जहां इनकी मुफ्त के खाने के सिस्टम को हजारों साल का त्याग समझा जाता है । हिंदू राष्ट्र बनाने के अथक प्रयास को समझना चाहिए। इनकी दिव्य कंगाली को समझिए, इनकी हजारों साल के प्यास को समझिए, और इन्हें मुफ्त योजनाएं उपलब्ध कराकर धन्य महसूस करते रहिए । आगे से अगर ये ख्याल रखेंगे तो कोई विवाद नहीं होगा और इनका पेट भी मज़े से भरता रहेगा। वो अगर चाहें तो हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी और योगी जैसे दिव्य लोगों को गरिया सकते है। भिक्षा के रूप में एससी एसटी नामक ब्रह्मस्त्र चला कुछ रकम की गूहार लगा सकते हैं। इनकी मांग अवश्य पूरी होगी क्योंकि ये ही तो हैं जातिवादी भीम योद्धा और जातिवाद के असली रक्षक जो भाजपा और संघ विरोधियों के रूप में नफ़रती चिंटू के नाम से कुख्यात हैं।ये चौबीस घंटे हिंदू धर्म और सवर्ण को गरियाते है। सरकार इन्हे सुरक्षा प्रदान करती हैं। कोई और काम नहीं करते जो इन्हें कुछ आमदनी हो, इनको भर पेट खिलाने से बड़ा पूण्य एक सनातनी के लिए कुछ भी नहीं हो सकता माय फ्रेंड्स। उधर दिव्या दीदी जी की पत्रकारिता में इन दिनों एक नई दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है—योगी जी को देखकर उनके मन की बात पढ़ लेने की शक्ति! योगी जी इनको देख कर डर गए, नहीं दीदी बिल्कुल नहीं आप डरावनी थोड़ी ही हो जो वो डरेंगे। रही मुस्कराहट की बात तो किसी ने कहा था की महिला के मुस्कुराहट से बच के रहिये तो दीदी आपके चिल्लाने की तुरंत बाद कोई भी मुस्कराहट के साथ आपकी कुटिलता के भाव को देख सकता हैं। दिव्या जी, एक दिन पहले आपका सवाल था कि छोटे पत्रकारों को रस्सी के घेरे में क्यों रखा जाता है। बस एक छोटी-सी जानकारी: सुरक्षा प्रोटोकॉल नाम की भी कोई चीज होती है। मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था किसी पत्रकार को छोटा-बड़ा बताने के लिए नहीं, सुरक्षा जोखिमों को ध्यान में रखकर होती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक कार्यक्रम की सुरक्षा व्यवस्था को एक ही तराजू पर तौलना भी पत्रकारिता नहीं है। और फिर आती है वह महान पत्रकारिता की डिग्री वाली दलील। उत्तर प्रदेश में हजारों पत्रकारों के पास पत्रकारिता की डिग्री है। क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी के पास उतनी ही कुर्सियाँ लगा दी जाएँ? वहाँ बैठे कई पत्रकार आपसे वर्षों वरिष्ठ हैं। सवाल डिग्री का नहीं, मौके, मर्यादा और पत्रकारिता के विवेक का है। जहाँ तक मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता का सवाल है, कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री के मिनट-टू-मिनट कार्यक्रम का अपना प्रोटोकॉल होता है। ऐसे में आखिरी क्षण में टोका-टोकी को लेकर बनाई गई पूरी कहानी को देखकर लगता है कि घटना छोटी थी, लेकिन नैरेटिव की दिव्य शक्ति बहुत बड़ी थी। दिव्या ने दिव्यता से राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामना, अखिलेश यादव को जन्मदिन की शुभकामना—बिल्कुल दीजिए, हो सकता है दीदी ये वाली पोस्ट डिलीट अब कर दे इसलिए स्क्रीनशॉट्स लगा दिया हूँ, इसमें कोई समस्या नहीं की अखिलेश यादव संसद में बोलें तो शेर की तरह दहाड़ने वाला विशेषण भी दीजिए। पर अपने को निष्पक्षता वाली बात मत बोलिए, समाजवादी पार्टी के नए पोस्टर बॉय लक्ष्मण यादव और आप वाले संजय सिंह से आपके अति मधुर संवाद आपकी निष्पक्षता की गवाही दे रहे है, लेकिन फिर उसी सोशल मीडिया पर यह दावा भी कि हम पूरी तरह निष्पक्ष हैं, हमारा किसी राजनीतिक विचारधारा से कोई झुकाव नहीं है, तो पाठक को सवाल पूछने का अधिकार तो दीजिए। निष्पक्षता का दावा करने से निष्पक्षता सिद्ध नहीं होती, आपकी पूरी सार्वजनिक पत्रकारिता देखकर पाठक खुद निष्कर्ष निकालता है। योगी जी को सवालों से डरने वाला बताने से पहले उनके सार्वजनिक इंटरव्यू और राजनीतिक जीवन का इतिहास देख लेना चाहिए। वामपंथी पत्रकारिता के आप लोगो के भगवान एनडीटीवी वाले प्रणव रॉय, the print वाले शेखर गुप्ता या अंजुम साहेब के वाले सारे इंटरव्यू इंटरनेट पर भरे पड़े है योगी जी कठिन से कठिन मुद्दों पर खुलकर जवाब दिए हैं। जिन्हें आपके ही पसंदीदा पत्रकार अक्सर सपाट, बेबाक और बिना लाग-लपेट बोलने वाला नेता बताते रहे हैं, उन्हीं योगी जी के बारे में अचानक यह नैरेटिव कि वे एक सवाल से डर गए—कुछ जमता नहीं।
