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राजनीतिक सफरनामा : जेनजी के लिए लालीपाप का दौर – कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

भारत में आजकल जेनजी हीरो बन चुके हें जिसे देखो वह ही जेनजी को मनाने-थपाने मेें लगा हुआ है । जेनजी कल तक सो रही थी, राजनीतिक पार्टिंयां उन्हें नारे लगवाने के काम में लगा कर उन्हें अपनी ही ताकत से विस्मृत कर देती थीं । वही जेनजी दिल्ली मेें कॉकरोच पार्टी के आन्दोलन के बाद हीरो की भूमिका मेें आ चुकी है । देश में एक बड़़ी आबादी जेनजी की है जो या तो शिक्षा ले रही है या शिक्षित होकर रोजगार मांग रही है । देश मेें लाखों युवा हर साल बेरोजगार हो रहे हैं उनके सामने अपना लम्बा भविष्य है, वे अपने वर्तमान के संघर्ष मेें भविष्य को सुनहरा होते हुए देखना चाहते हैं । पिछले एक-दो दशकों में प्रायमरी से लेकर उच्च षिक्षा तक महंगी हुई है । सरकारी निःशुल्क शिक्षा की घोषणा के बाद भी सरकारी स्कूलों की पढ़ाई में ही हजारों रूपए लग रहे हैं और प्रावईवेट शिक्षण संस्थान तो दुकानें बन कर अधिकतम पैसा वसूल लेने के लिए काम कर रहीं हैं । वहीं उच्च शिक्षा तो और महंगी होती जा रही है । काम्पटीशन इतना की सौ प्रतिशत पर भी प्रतिस्पर्धा होती है । केवल उच्च शिक्षा ले लेने से काम नहीीं चलता अब रोजगार के लिए काम्पटीशन परीक्षा पास करो, यह परीक्षा कभी विलंब से होती है तो कभी पेपर ही लीक हो जाता है । एक एक काम्पटीशन परीक्षा के लिए साल भर इंतजार करो । काम्पटीशन परीक्षा मेें पास होने के लिए बडे-बड़े कोचिंग संस्थान लाखों रूपयों की फीस लेकर कोचिंग कराते हैं और उनमेें से भी बहुत सारे युवा आगे नहीं निकल पाते । जो रह जाते हैं वे फिर से पढ़ाई मेें जुट जाते हैं । सच तो यह है कि भारत का जेनजी महंगाई और शून्य आमदनी की मार झेल रहे हैं । इस जेनजी के अंदर एक गुस्सास तो जन्म ले ही रहा था उनको अंगड़ाई तो लेना ही थी तो उसने ले ली । उन्हें अपनी आवाज को उठाने के लिए हौसला मिल गया । युवाओं को कॉकरोच को भले ही व्यंग्य मेें कहा गया हो और कॉकरोच पार्टी भले ही यूं ही सोशल मीडिया मेें बन गई हो और भले ही दिल्ली के जंतर-मतर पर उनका पहला आन्दोलन यूं ही हो गया हो, पर इस आन्दोलन में जिस ढंग से युवा जुटे और उन्होने अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाई, और सरकार को भी झुकना पड़ा, उसने यह बात तो स्पष्ट कर दी कि युवा को एक मंच की तलाश थी, युवाओं को अपने आक्रोश और वेदनाओं को बाहर निकालने के लिए एक मंच की जरूरत थी । आन्दोलन सफल हुआ तो युवाओं का हौसला भी बढ़ गया । युवा भले ही कॉकरोच पार्टी से न जुड़ा हो, युवा भले ही उसके सिद्धान्तों से सहमत न हो पर उनको अपनी आवाज उठाने का साहस तो मिल ही गया । इस साहस को कई बार दबाया गया, उनके होसलों को तोड़ा गया पर अब युवा जागरूक होकर निर्भीक होकर अपनी आवाजें उठाने लगा है । युवाओं की यह जाग्रती ही अब राजनीतिक पार्टियों के लिए सिरदर्द बनती जा रही है और वे इसे सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी के रूप मेें इस्तेमाल करने के लिए लालीपाप देने मेें लगे हैं । राहुल गांधी का ‘‘गूंज’’ कार्यक्रम हो या प्रधान मंत्री जी का छात्रों से मिलने का कार्यक्रम हो यह सभी उसी की ही एक कड़ी हैं । इतना ही नहीं केन्द्र सरकार ने तो अपने मंत्रियों को भी बोल दिया है कि वे कालेजों मेें जाकर छात्रों से मिलें उनसे संवाद करें और उनकी समस्याओं को समझकर उनका निराकरण भी करें । जिन राज्यों मेें विधानसभा के चुनाव होना हैं वहां भी अब जेनजी को मनाने का कार्यक्रम सुनिश्चत किया जा रहा है । उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा के चुनाव होना है तो उत्तर प्रदेष मेें भी जेनजी का गणित खंगाला जा रहा है और जेनजी कैसे प्रसन्न हो इसके उपाय खोजे जा रहे हैं । राज्य सरकार जेनजी के लिए अलग से घोषणायें कर रही है और विपक्षी दल जेनजी के लिए अपनेे घोषणापत्र मेें प्रमुख स्थान देने जो रहे हैं । राजनीति मेें दो ट्रेन्ड चल रहे हैं महिला और युवा । महिलाओं को
साधने के लिए ही कभी लाडली बहिन या इसी तरह का कुछ नाम देकर उन्हें हर महिना पैसा दिया जा रहा है, लखपति दीदी के नाम से भी उनको उपकृत किया जा रहा है पर युवाओं के लिए ? बेरोजगारी भत्ता वाली स्कीम कुछ राज्यों मेें प्रांरंभ की गई पर वो उतनी सफल नहीं हुई । बेरोजगारी के अलावा भी बहुत सारे बातेें हैं जो जेनजी सरकार के सामने लाना चाहता है और इसके लिए उनको अब मंच भी मिल गया और साहस भी आ गया। जेनजी को प्रसन्न करना जरूरी है जेनजी जाग चुका है तो अब सभी महिलाओं के साथ ही साथ जेनजी को अपनी ओर खींचने के लिए नई-नई योजनायें बना रहे हैं । उनके लिए अब यह जरूरी है क्योंकि जेनजी जाग चुका है । राज्य कोई सी भी हो सत्ता किसी के भी पास हो पर सभी भयभीत जेनजी से हैं । जेनजी के साथ ही अल्फा जेनजी भी चर्चाओं मेें आ चुकी है । प्रायमरी से लेकर हायरसैकैण्डरी स्कूलों मेें पढ़ने वाले बच्चे भी अपनी आवाज बुलन्द कर रहे हैं । उनके सामने अधिकारियों के हाथ जोड़ने की तस्वीर भी सामने आ रही है । कहीं स्कूल भवन नहीं है, स्कूल हैं तो शिक्षक नहीं है, तो कहीं स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है वे अपनी समस्या को अब दबाकर नहीं रख रहे हैं उन्हें आन्दोलन का हथियार मिल गया है । अच्छा हुआ कम से कम वे अपने बचपन से ही जान गए कि अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलन्द की जानी चाहिए । जेनजी राजनीति का नया ट्रेंड बन कर उभरा है, वह भयभसीत भी कर रहा है सरकारों को, प्रशासन को । भयभीत व्यक्ति समाधान खोजता है, सरकारें भी समाधान खोज रही है, पर उनके पास देने के लिए लनौकरी नहीं है, केवल आंकडें हैं जो यह बता देते हैं कि हमने इतनी नौकरी दी, आंकड़ों से भी भला कोई मानता है, उसे प्रमाण चाहिए, उसे आश्वासन नहीं कि अब पेपर लीक नहीं होगा या कि अब परीक्षा मेें धांधली नहीं होगी उसे प्रमाणिक रूप से ऐसा होता दिखना चाहिए । यही वह जेनजी भी है जो दिल्ली की एक बिल्डिंग की पांच मंजिला इमारात केेें घौसले से जैसे कमरों मेें रहकर अपने भविष्य की तैयारी कर रही थी और यकायक वह बिल्डिग धराशायी हो गई । बच्चों को अपनी जान गवंानी पड़ी और जो बच गए वे केवल भगवान का ही धन्यवाद दे रहे हैं । दिल्ली सहित बड़े महानगर जो शिक्षा के केन्द्र के रूप मेें पहचान बना चुके हैं वहां हर साल हजारों की संख्या मेें आने वाले बच्चों के रहने की व्यवस्था सबसे कठिन होती है, उन्हें मजबूरी मेें ऐसे मकानों मेें रहना पड़ता है जो रहने लायक होते ही नहीं हैं । पर उनको पढ़ना है और विकल्प हैं नही तो वे रहते हैं मकान मालिक की शर्त पर रहते हैं, जरूरत से ज्यादा किराया देकर रहते हैं और जब ऐसे हादसे हो जाते हैं तो प्रशासन कुछ दिनों तक तो सक्रिय दिखाई देने लगता है फिर वही पुराना ढर्रा चालू हो जाता है । गत वर्ष भी एक बिल्डिंग के बेसेमेन्ट मेें पानी भर जाने के कारण कुछ छात्रों को जान गवांनी पड़ी थी और आनन-फानन मेें ऐसे भवनों की तलाश् की जाने लगी जहां बेसमेन्ट बना है, जब तक घटना विस्मृत नहीं हुई तब तक कार्यवाही होती रही फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया । इस साल इस बिल्डिग ने जान ले ली ं। बल्डिंग गिरने के बाद दिल्ली सरकार जाग्रत हुई और उसने जीर्ण-शीर्ण भवनों को चिन्हित किया और उनको गिराने की कार्यवाही भी शुरू कर दी । इस कार्यवाही से वे थोड़े बहुत भवन गिर जायेगें बहुत सारे पीजी और गिरा दिये जायेगें बहुत सारे ऐसे भवन जिनमेें चल रहे हैं कोचिंग सेन्टर चल रहे हैं वे भी खाली हो जायेगें, पर प्रश्न अब यह है कि हर साल हजारों की संख्या मेें आने वाले छात्र ठहरेगें कहां ? वे जिन कोचिंग संस्थानों में पढ़ना चाह रहे हैं वे भी तो ऐसे ही संकीर्ण भवनों में लग रहे हैं तो फिर वे पढ़ेगें कहां ? यदि कोचिंग सेन्टर बंद हो गए तो उनको आगे की पढ़ाई के लिए क्या करना होगा ? छात्रों की इन मूलभूत समस्याओं पर दिल्ली सरकार इस दिशा मेें काम करती तो दिख नहीं रही है । छात्र तो आयेगें ही, कोचिंग संस्थान भी चलेगें ही पर आवश्यक यह है कि उनकी व्यवस्था कष्टकारी न रहे इसके उपाय किए जाने चाहिए । सरकार तो सक्षम है फिर इसका स्थाई उपाय किया जा सकता है । केवल दिल्ली में ही नहीं कोटा राजस्थान सहित ऐसे सभी शहर जहां छात्र कोचिंग पढ़ने आते हैं या उच्च शिक्षा ग्रहण करने आते हैं वहां प्रशसनिक रूप से तैयारी की जानी चाहिए । यदि राज्य सरकारें ऐसा कर पाई तो यह बहुत महत्वपूर्ण काम होगा युवाओं के लिए । फिर जेनजी की दूसरी समस्या पपेर लीक होना या परीक्षा मेें धांधली होना इन पर भी तो रोक लगे, जो सक्षम है वह पेपर भी खरीद रहा है और पास हो जाने के अन्य विकल्प भी खोज रहा है, पर जो ऐसा नहीं कर पा रहा है वह केवल निराशा भरा जीवन ही जी पा रहा है, कई बच्चे आत्महत्या तक कर रहे हैं, इसका समाधान भी चाहिए । चूंकि अब युवा जाग चुका है और वो इतनी तादाद मेें है कि वो सरकारें बनवा सकता है और गिरा भी सकता है, तो फिर अब सरकारांें को उनके लिए काम करना ही पड़ेगा । अचानक नेपाल मेें भयानक बाढ़ आई और कुछ ही मिनिटों में सारा कुछ बरबाद हो गया । जहां कुछ देर पहले तक चहल-पहल थी, लोग अपने सपनों को बुनकर अपनी दिनचर्या की पहली सीढ़ी की ओर आगे बढ़ रहे थे वहां यकायक आई बाढ़ ने सब कुछ निगल लिया । गांव के गांव बह गए या मलबे में दब गए, जो बच पाए वे खुशकिस्मत थे पर खुशकिस्मत लोग कम ही होते हैं तो बहुत सारे लोग अब लापता की श्रेणी में आ गए । किसने सोचा होगा कि यह सुबह अंतिम सुबह है, जान के लिए भी और आबादी से भरपूर रहने वाले गांवों के लिए भी । सब कुछ मलबे मेें दब गया । बड़े-बड़े मकान दब गए, बड़ी-बड़ी गाड़ियां बह गई और मजबूत माने जाने वाले पुल अपना स्थान छोड़कर धराशायी हो गए । हंसते-खेलते रहने वाली, कोलाहल से पूर्ण गावं-आंगन सब कुछ तो बह गया । सोशलमीडिया मेें चलने वाले वीडियो देखकार कंपन पैदा हो रहा है फिर जिन्होने इसे झेला उनके क्या हाल हुए होगें ? सब कुछ अचानक हुआ और इतनी तेजी से हुआ कि कोई सम्हल ही नहीं पाया, किसी को अंदेशा था भी कहां कि प्रलय जैसा नजारा दिखाई देगा, बाढ़ तो हर साल आती है पर तबाही पहली बार आई और ऐसी आई कि जो बचा उसे केवल चमत्कार माना जाने लगा । बताया जा रहा है कि करीब पच्चीस फीट तक का मलबा जम गया है । मलबे के नीचे सब दब गया, मकान, गाड़ी, आदमी और ढेर सारे सपने । प्रकृति की इस विनाश लीला की हमने कभी कल्पना भी नहीं की पर अब तो गाहे-बेगाहे ऐसी घटनायें हो रहीं है जिन्हें हम प्रकृति के आक्रोश के नाम से जानने लगे हैं । ग्लोबल वार्मिंग को लेकर कई वर्षो से चेताया जा रहा है पर नही सोच पाए कुछ भी । हिमालय की वर्फ ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ही पिघल रही है । वैज्ञानिक बताते हैं कि धरती का तापक्रम हर साल बढ़ रहा है और जब तापक्रम बढ़ेगा तो वर्फ पिघलेगी ही । तापक्रम इसलिए बढ़ रहा है कि उसको आच्छादित करने वाले पेड़ हमने काट लिए हैं, हमने आधुनिक यंत्रों से इतना प्रदूष्ण पैदा कर दिया है कि धरती का तापक्रम बढ़ने लगा । तापक्रम बढ़ा तो वर्फ पिघलने लगी और हमेशा से वर्फ की सफेद चादर ताने खड़ा दिखाई देने वाला हिमालय इस ताप को सहन नहीं कर पा रहा है । उसकी वर्फ तेजी से पिघल रही है । छोटी-छोटी झीलों में वर्फ जमा हो रही है जो अचानक किसी दिन अपनी बाड़ी तोड़कर बहने लगती है । नेपाल मेें भी ऐसा ही हुआ । इस वर्फ ने ही बरबाद कर दिया आबादी को । अब तो आसमान मेें सेटेलाइट हमें धरती की हर एक घटना की जानकारी दे रहे हैं ताकि हम सजग हो जाएं पर इस घटना के संकेतों को हम समझ ही नहीं पाए । हमको तो सजा मिलनी ही थी पर ऐसी अकल्पनीय है । पर अभी भी हमारे पास बहुत कुछ बचाने को तो अब भी हम जागरूक हो जायेें, अब भी हम ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी को समझ लें तो आगे होने वाले नुकसान को बचा सकते हैं । केवल वर्फ पिघलना ही ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी नहीं है और भी बहुत सारी सावधानियां रखने के सुझाव भी हैं तो उन पर ध्यान दिया जाना चाहिए । भूस्खलन की बढ़ती घटनायें, अचानक पड़ने वाली दरारें और भूकंप की चेतावनी यह सब भी इसी सावधानी के दायरे मेें आता है । प्रकृति से छेड़़छाड़ गंभीर परिणाम दे रहे हैं । हमने जंगल नष्ट कर दिए हमने पहाड़ांें के नीचे सुरंग बना कर उन्हें खोखला कर दिया हमने विकास के नाम पर प्रकृति के साथ छेड़खानी की इसका परिणाम तो भोगना ही होगा । देश के बहुत सारे क्षेत्रों में आ रही भयानक बाढ़ भी इससे जोड़ कर देखा जा सकता है । बरसात है तो पानी तो गिरेगा भी और बाढ़ भी आएगी पर ऐसी बाढ़ जिसे पहले कभी नहीं देखा, ऐसा रोद्र रूप जिसके बारे मेें कभी नहीं सोचा, इन दिनों कितने ही राज्यों के कितने ही गांव और शहर बाढ़ की आपदा को झेल रहे हैं । कितनी बड़ी आबादी अपना सबकुछ खोती जा रही है, उनके मकान बरबाद हो रहे हैं, खेतों की फसले बाढ़ की चपेट मेें आ चुकी हैं, सड़के बह रही हैं और विकास बरबाद हो रहा है । चिन्तन तो करना पड़ेगा कि हम से कहां भूल हुई है । जब तक हम सोचेगें नही तब तक हम यूं ही अपना सब कुछ खोते रहेगें । केवल बाढ़ पीड़ितो की मदद कर देना पर्याप्त नही माना जाना चाहिए । आगे ऐसा न हो इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए ।

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