
नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में सदा से मतभेद रहा है, और वह रहेगा ही। कारण यह है कि नयी पीढ़ी के पास जोश होता है। वह इस जोश पर विश्वास करके सोचती है कि भविष्य के हर अवरोध को वह सहजता से पार कर जाएगी।
वहीं पुरानी पीढ़ी के पास अनुभव होता है। वह जानती है कि केवल जोश या बल से समय के साथ आने वाले सभी अवरोध पार दल नहीं होते। उसके लिए धैर्य और समय का इंतजार करना पड़ता है।
इतिहास इसका प्रमाण है। अभिमन्यु के पास चक्रव्यूह भेदने का आधा ही ज्ञान था। फिर भी उसने जोश में आकर उसे भेदने की जिद की। परिणाम क्या हुआ, सभी को मालूम है। देखा जाय तो अर्जुन और अभिमन्यु भी नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के ही प्रतीक थे – एक के पास पूरा अनुभव, दूसरे के पास पूरा जोश।
नयी पीढ़ी अनुभव के अभाव में जो वर्तमान में दिख रहा है, उसी के साथ जीना चाहती है। उसने अपने पिता को देखा है। पूरी जिंदगी आने वाले कल के लिए बचाते-बचाते। अच्छा नहीं खाया, अच्छा नहीं पहना, कहीं घूमे नहीं। जब कल आया तो घुटनों में दर्द था। इसलिए वह आज को पूरी खुशी के साथ जीना चाहती है। वह आज को मरने नहीं देना चाहती। इसीलिए वह रात-दिन मेहनत करके जीवन की सभी भौतिक सुख-सुविधा का लाभ आज ही ले लेना चाहती है।
जबकि पुरानी पीढ़ी ने अपने माता-पिता का जीवन भी देखा है। उसने देखा है कि कैसे एक-एक रुपये से परिवार चलता है, कैसे एक रिश्ता टूटने से पूरा आँगन सूना हो जाता है। जिसने भूख देखी हो, वह रोटी का मूल्य जानता है। इसलिए वह जानती है कि कल जब सब साथ छोड़ देते हैं तो जीवन जीना कितना कठिन हो जाता है। उस समय आज की सारी भौतिक सुविधाएँ भी अच्छी नहीं लगतीं।
इसीलिए पिता की रोक-टोक संतान को अच्छी नहीं लगती। क्योंकि पिता की रोक-टोक कल के अनुभव की पीड़ा से निकलती है, जो वह खुद देख और भोग चुका होता है। आज भी भोग रहा है।
पीढ़ी का यह टकराव रोज का है। पिता कहता है मोबाइल बंद करो, बेटा कहता है इसी पर पढ़ रहा हूँ। दादी कहती है पास बैठ, पोता कहता है थोड़ी देर में। यहीं पर तार टूटता रहता है।
विद्वान और अनुभवी लोग इस टकराव के बीच सेतु बनाने के अनेक सुझाव सदा से देते आ रहे हैं। फिर भी टकराव का अंत नहीं दिखता। क्योंकि सदा से मानव अपनी आँखों से देखे और अनुभव से मिले ज्ञान को ही सबसे सही मानता है। औरों का सुनता-पढ़ता भले है, पर करता अपने विवेक से ही है।
शायद इसीलिए राजकुमार सिद्धार्थ एक वृद्ध को देखकर तथा एक श्मशान जाते हुए अर्थी को देखकर खुद से सवाल करने लगता है – क्या आदमी कभी वृद्ध भी होता है, क्या कभी मरता भी है? क्योंकि उसके पिता ने उसे सदा इन सब बातों की जानकारी से दूर रखा था।
नयी पीढ़ी के सिद्धार्थ को शायद ज्ञानी होने का भ्रम टूटा, तभी तो वह ज्ञान और अज्ञान के बीच को समझने के लिए सिद्धार्थ से तथागत बनने की यात्रा पर निकला।
जैसे आज और कल के बीच एक रात की दीवार सदा से बनती चली आ रही है। इसीलिए वर्तमान को भविष्य से यह रात की दीवार सदा अनजान ही रखती चली आ रही है।
इसीलिए नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी का द्वन्द्व कालजयी है, जो कभी समाप्त नहीं हो सकता। तभी जिसके पास जोश है, उसके पास होश यानी अनुभव का अभाव है। और जिसके पास आज होश है, तो उसका जोश ही समाप्त हो रहा है।
बस समय और व्यक्ति पर सदा निर्भर रहेगा कि पीढ़ी के बीच की दूरी कब और कितनी रख कर जीवन जिया जाये।
