भारत के रक्तिम सूर्यास्तों और मौन पर्वत-शृंखलाओं से दूर, एक प्राचीन प्रांत के हाशिये पर स्थित था—मालवीपुरा। वह गाँव कभी फसल की हरियाली और लोकगीतों की मधुर गूँज से भरा रहता था। पर इतिहास के किसी क्रूर मोड़ पर वहाँ ऐसी छाया उतरी कि आज भी उसका नाम लेते ही वृद्धों की आँखें सहम जाती हैं।
वर्षों पहले जब उस प्रदेश पर एक दुर्बल राजा का शासन था, तब वास्तविक सत्ता उसके दुष्ट और क्रूर मंत्री—शेरशाह—के हाथों में थी। कर-वसूली के नाम पर वह गाँवों में अपनी सेनाओं संग उतरता, गरीबी की हड्डियों को तोड़ता, और शक्ति की आड़ में वह अपराध करता जिसके आगे शब्द भी सिर झुका देते हैं। मालवीपुरा उसका सबसे प्रिय शिकार था— क्योंकि वह दूर था, निर्बल था और सहायता से कटे हुए लोगों का ठिकाना था। शेरशाह की आँखों में केवल लालच नहीं, स्त्रियों के प्रति विकृत हवस की वह चिंगारी थी जो किसी भी सुसंस्कृत सभ्यता का सूर्यास्त कर सकती है।
गाँव की गोरी, सीधी-सादी बहुएँ जैसे ही उसके घोड़े की टाप सुनतीं, अपनी चौखटें बंद कर आँचलों में दुबक जातीं। पर शेरशाह के लिए कोई चौखट अभेद्य नहीं थी।अत्याचारों की वह अंधेरी गाथा साल दर साल गाँव की आत्मा को खोखला करती रही—जब तक कि एक दिन भय ने विद्रोह का रूप नहीं ले लिया।
एक अमावस की रात, जब आकाश अपने सबसे काले वस्त्र में था, गाँव के सभी घरों के दीपक बुझ गए। एक चुप्पी—विस्फोट से ठीक पहले की चुप्पी— धरती पर उतर आई और सुबह होने से पहले मालवीपुरा पूर्णतः खाली हो चुका था। कोई नहीं जानता कब, कैसे, किस दिशा में लोग चले गये— किसी ने नहीं देखा। पर जो सुना गया, वह इतिहास का सबसे खूँखार वाक्य बन गया— “यह भूमि अब श्रापित है। जो भी यहाँ बसेगा— धूल भी उसका नाम न जाने देगी.”
राजा ने सैनिक भेजे, पर गाँव का एक भी जीवित प्राणी न मिला— बस टूटी खपरैल, जली उपले और हवा में घुली वह सिसकी जो मानो धरती की नसों में उतर गई थी। समय आगे बढ़ा, राज्य बदले, नए नगर बने— पर मालवीपुरा की धरती पर घास तक उगने से हिचकती रही। लोग कहते हैं— सूर्यास्त के बाद वहाँ कोई नहीं जाता। क्योंकि जैसे ही अंधकार अपना पहला पाँव उस भूमि पर रखता है, वहाँ से करुण पुकारें उठती हैं— जैसे किसी स्त्री की घुटती रुलाई, किसी पुरुष की अंतिम चीख, किसी शिशु का भय से भरा रुदन।
वह भूमि आज भी विरान है। बरगद का पुराना वृक्ष अब भी खड़ा है— पर उसकी छाया में चलते ही मनुष्य को लगता है कि कोई अदृश्य हाथ उसका अंगुली-फाल पकड़कर रोक रहा है। मालवीपुरा आज मानचित्र पर मात्र एक धब्बा है— पर इतिहास में वह एक चेतावनी है—कि जब अत्याचार अपनी सीमा लाँघता है, तो मानव का आर्त-स्वर केवल आह नहीं रहता— वह धरती की चेतन स्मृति बनकर युगों तक प्रतिशोध का दीपक जलाता है।
आज गाँव की सीमा पर एक सरकारी सूचना पट्ट लगा है जिस पर लिखा है—“सूर्यास्त के बाद यहाँ आने की मनाही है।“ उस “शापित भूमि” की कहानी आज भी हर पवन-झोंके में सुनाई देती है।
डॉ. सुरेश पुष्पाकर
ग्रेट ब्रिटेन
