‘शिवरानी देवी’
कहावत है- “ हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है।” तथा
“ पुरुष की उन्नति में स्त्री का मौन किंतु अपरिहार्य योगदान निहित होता है।”

इस कहावतों को चरितार्थ किया है प्रेमचंद की अर्द्धांगिनी शिवरानी देवी ने, जिन्होंने अपने मौन, संयमित एवं अनिवार्य योगदान से प्रेमचंद नामक विराट साहित्य पुरुष की साधना को मंजिल तक पहुंचाया। शिवरानी देवी से विवाह के पूर्व प्रेमचंद को घरेलू हालात के चलते निश्चिंत होकर लेखन का अवसर प्राप्त नहीं होता था क्योंकि उनकी पहली पत्नी झगड़ालू व बदसूरत थी, जिसे प्रेमचंद नापसंद करते थे। यदि शिवरानी देवी द्वारा लिखित अमूल्य साहित्यिक संस्मरण “प्रेमचंद घर में” हमारे पास न होता तो हम प्रेमचंद की ज़िंदगी के अनेक अंतरंग, मानवीय और ऐतिहासिक पहलुओं से अनजान रहते।
शिवरानी देवी का जन्म 1888 के आसपास फतेहपुर जिले के सलीमपुर, डाकख़ाना कनवार में हुआ था। पिता का नाम मुंशी देवी प्रसाद था। सबसे छोटी पुत्री शिवरानी देवी का विवाह मात्र ग्यारह वर्ष की अल्पायु में हो गया था तथा तीन-चार माह बाद ही वह गौने से पूर्व विधवा हो गयी। लाडली बेटी के दुर्भाग्य पर माता-पिता क्षुब्ध थे। उन्होंने बेटी के खुशहाल भविष्य के लिए पंडितों की सलाह पर विवाह के लिए इश्तहार दिया। तत्कालीन समय यह एक क्रांतिकारी कदम था पर बेटी की ख़ुशी के लिए मुंशी देवी प्रसाद जी समाजिक वर्जनाओं के खिलाफ तन कर खड़े हो गये। वहीं प्रेमचंद भी विधवा विवाह के इच्छुक थे। अतः पुनर्विवाह हेतु उन्होंने सम्पर्क किया। ससुर ने होने वाले दमाद को पसंद कर लिया एवं विवाह तय हो गया। दोनों पक्षों को अंदेशा था कि समाज का विरोध झेलना पड़ेगा। और वही हुआ भी।
विवाह फाल्गुन मास की शिवरात्रि के दिन 1905 में सम्पन्न हुआ। विवाह में भाई महताब के अलावा कुछ दोस्त ही सम्मिलित हो पाये जिनमें मुंशी दया नारायण भी थे।
विवाहोपरांत कुछ माह पश्चात चैत्र में वह सब डिप्टी इंस्पेक्टर बन गये- मानो गृहस्थ जीवन का मंगल आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो गया हो।
शिवरानी देवी तथ्य व सत्य के साथ रहते हुए कभी झुकने वाली महिला नहीं थी। प्रेमचंद संकोचवश अपनी सौतेली माँ, जिन्हें वह चाची कहते थे, के समक्ष मूक रह जाते थे। इसी कारण चाची का न तो प्रेमचंद की पहली पत्नी से बना और नहीं शिवरानी देवी को वह पसंद करती थी। पर शिवरानी देवी मर्यादा के अंदर रहते हुए उनकी हर ग़लत बात व व्यवहार का प्रतिकार करती थी। प्रेमचंद की बहन का भी चाची से मनमुटाव था जिस कारण प्रेमचंद विगत कई वर्षों से अपनी बहन को बुलाने में हिचकिचाते थे। इस हेतु शिवरानी देवी ने उन्हें धिक्कारा था- “बहन का हक़ पहले है और मायके आने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”
शादी के समय शिवरानी देवी को बताया गया था कि उनकी पहली पत्नी का देहांत हो चुका है। परन्तु वास्तविक स्थिति की जानकारी होने पर उन्होंने प्रेमचंद को बहुत लताड़ा था कि उन्होंने दो स्त्रियों का जीवन बर्बाद कर दिया। प्रेमचंद के विरोध के बावजूद उन्होंने पहली पत्नी को पत्र लिखकर साथ रहने का प्रस्ताव दिया था। पहली पत्नी ने जबाब दिया कि “जब वह लेने आयेंगे तब मैं चलूँगी।” परन्तु प्रेमचंद इससे सहमत न थे।
एक लंबी जीवन यात्रा के पश्चात पाँच दिसंबर 1975 को शिवरानी देवी की देहावसान हुआ।
शिवरानी देवी ने प्रेमचंद को कमज़ोर शारीरिक स्थिति एवं स्वास्थ्य के कारण स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने पर रोकती थीं, वहीं वे स्वयं इन आंदोलनों में सक्रिय रही। 1930 में विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना देते हुए वह गिरफ़्तार कर ली गईं। इस समय प्रेमचंद गोरखपुर गये हुए थे तथा अपने बच्चों को उन्होंने पड़ोसियों को सौंपा जबतक पति घर न आ जाये। दो माह बाद वह रिहा हुई।
1931 में बारह हज़ार के जनसमूह में उन्होंने ओजस्वी भाषण दिया था, जबकि उस समय विशेष पर कांग्रेस को ग़ैरक़ानूनी करार दे दिया गया था। यह उनकी निर्भीकता व राजनीतिक चेतना का अनूठा प्रमाण था।
शिवरानी देवी स्वयं स्वीकार करती हैं- “शादी से पहले मेरी साहित्य में रुचि नहीं थी। मैं पढ़ी-लिखी भी नहीं के बराबर थी। आज मैं जिस लायक़ हूँ वह पति के द्वारा ही।”
प्रेमचंद अक्सर अपनी रचनायें उन्हें पढ़कर सुनाते।अंग्रेज़ी अख़बार की ख़बर भी अनुवाद कर उन्हें बताते। धीरे-धीरे साहित्य के प्रति उनकी जागरूकता बढ़ती गई। प्रेमचंद के दौरे पर जाने के बाद वह दिन भर किताबें पढ़ती रहती।इस प्रकार वह साहित्य जीवन में कब प्रवेश कर गई, उन्हें इसका अंदेशा भी न हुआ।
1913 में उनकी पहली कहानी साहस, पत्रिका “चाँद” में प्रकाशित हुई जिसकी जानकारी प्रेमचंद को न थी। चाँद में कहानी देखकर प्रेमचंद उत्साहित हुए- “अच्छा, अब आप भी कहानी लेखिका बन गई हैं।”
शिवरानी देवी का पहला कथा संग्रह “नारी ह्रदय” का प्रकाशन 1933 में स्वयं प्रेमचंद ने ही किया था। दूसरी कहानी संकलन “कौमुदी” के नाम से प्रेमचंद की मृत्यु के पश्चात 1937 में छपी थी। असंकलित कहानियों का एक संग्रह “पगली” प्रकाशित हुआ।
एक अत्यंत मजेदार संयोग है कि शिवरानी देवी की पाँच कहानियों सौत, बूढ़ी काकी, पछतावा, बलिदान व विमाता का शीर्षक प्रेमचंद रचित कहानियों का भी था। पर इनमें कोई साम्यता न थी। कथानक अलग-अलग
थे।
इनकी प्रसिद्ध रचना 1944 में प्रकाशित साहित्यिक संस्मरण “प्रेमचंद घर में “ है। इसमें उन्होंने 1880 में प्रेमचंद के जन्म से लेकर 1936 में उनकी मृत्यु तक का संस्मरण बिना लाग लपेट के बताया है। 25 वर्षों के विवाह पूर्व घटनाक्रम के साथ विवाह उपरांत 31 वर्षों का सम्पूर्ण विवरण अपनी यादाश्तानुसार ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया है।
अपनी रचनाओं में प्रेमचंद समस्याओं को लेकर उग्र नहीं थे।वह समस्याओं को यथारूप में प्रस्तुत करते थे। वहीं शिवरानी देवी समस्याओं के प्रति अतिसंवेदनशील रहती थी। वह इसे मूक स्वरूप में सहने को तत्पर न थी। उनकी पहली कथा “साहस” आज के समय से भी आगे का प्रतिनिधित्व करती है। जहाँ कहानी की नायिका रामप्यारी बेमेल विवाह के विरोधस्वरुप मंडप में दुल्हे को जूते से मारने लगती है एवं आजीवन कुँवारी रहती है। उन्होंने अपनी रचनाओं में एक महिला की पहचान को स्वतंत्र रूप में परिभाषित किया। जिसे सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है।
यह सही है कि साधारण प्रेमचंद को “विराट प्रेमचंद” बनाने में शिवरानी देवी का अप्रतिम योगदान है परन्तु व्यक्तित्व व साहित्य साधना में वे उनसे उन्नीस नहीं थी। फिर भी उनकी चर्चा, पहचान हर क्षेत्र में प्रेमचंद की पत्नी के तौर पर ही रही। उनका सही मूल्यांकन नहीं हुआ और न ही सम्मान प्राप्त हुआ जिसकी वह हकदार थी। प्रेमचंद नाम के विराट वटवृक्ष के साये में उनके तेजस्वी व्यक्तित्व तथा साहित्य व अन्य क्षेत्रों की उपलब्धियों को उकेरने का प्रयास ही नहीं हुआ।जबकि उनका प्रकाश स्वयं में एक स्वतंत्र आकाश बनने की क्षमता रखता था।
सादर
गोपाल कृष्ण श्रीवास्तव जीके
वाराणसी
