राखी के दोहे
धागा यद्यपि सूत का,पर दृढ़ औ’ मजबूत । बहिन-सहोदर नेह का,बन जाता जो दूत ।। पर्वों का यह पर्व है,जिसमें रक्षा,नेह । अंतर्मन उल्लास में,होती पुलकित देह ।। धागा बस इक माध्यम,पलता है विश्वास । जिसमें रहती निष्कपट,मीठी-सी इक आस ।। बचपन की यादें लिये,बिखरे मंगल गान । सम्बंधों में है सजा,संस्कार का मान ।।…
