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मंदिरों में दान न करें…?

पलटें तो पाएँगे कि भारत पर हुए अनेक विदेशी आक्रमणों के पीछे मंदिरों में संचित अपार संपदा भी एक प्रमुख कारण रही है। कुषाणों, हूणों और बाद के अनेक मुस्लिम आक्रमणकारियों की दृष्टि भारत की समृद्धि और मंदिरों में संग्रहित अकूत धन पर रही। सत्ता-विस्तार की महत्वाकांक्षा के साथ-साथ इस संपदा को प्राप्त करना भी उनके उद्देश्यों में सम्मिलित था।

वर्तमान समय में भी अनेक राज्यों में मंदिरों का प्रबंधन प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सरकारों के नियंत्रण में है। इसके पीछे मंदिरों की विशाल आय और संपत्तियाँ एक महत्वपूर्ण कारण मानी जाती हैं। किंतु यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि इस धन का उपयोग किन उद्देश्यों के लिए और किस सीमा तक होना चाहिए। अनेक बार यह आरोप लगते रहे हैं कि इस धन का उपयोग धार्मिक संस्थानों के मूल उद्देश्यों से इतर विभिन्न योजनाओं और प्रशासनिक आवश्यकताओं में किया जाता है। परिणामस्वरूप मंदिरों में संचित धन-संपदा सदैव आकर्षण, विवाद और विमर्श का विषय बनी रहती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है अन्य धार्मिक संस्थाओं की व्यवस्था पर सरकारों का नियंत्रण नहीं है क्योंकि वहाँ इतनी अधिक दान राशि का संग्रहण नहीं होता है।

सनातन परंपरा में दान, सेवा, भक्ति और परोपकार को धर्म का प्राण माना गया है। श्रद्धालु मंदिरों में श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं, प्रसाद अर्पित करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। इसी भाव से वे धन, स्वर्ण और अन्य मूल्यवान वस्तुएँ का अर्पण करते हैं।

किंतु यहाँ एक विचारणीय प्रश्न उपस्थित होता है—जिस श्रद्धा और विश्वास के साथ हम धन अर्पित करते हैं, क्या उसका सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित हो पाता है?

संभवतः बेहतर यह होगा कि श्रद्धालु मंदिरों में पूजा-पाठ करें, धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता करें, प्रसाद चढ़ाएँ तथा मंदिरों की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वस्तुरूप में सहयोग दें। नकद दान करने से पूर्व यह अवश्य विचार करें कि उसका उपयोग वास्तव में संबंधित धर्म, समाज और जनकल्याण के उद्देश्यों की पूर्ति में हो रहा है या नहीं।

हमारे आसपास असंख्य ऐसे लोग हैं जिन्हें हमारी सहायता की तत्काल आवश्यकता है। अनाथालयों में पल रहे निराश्रित बालक, वृद्धाश्रमों में सांध्य बेला में जीवन व्यतीत कर रहे असहाय बुजुर्ग, विधवा आश्रमों में रह रही विवश महिलाएँ, आर्थिक अभाव से जूझते विद्यार्थी, गंभीर रोगों से संघर्ष कर रहे मरीज तथा विपन्न परिवार—सभी किसी न किसी रूप में हमारी संवेदना और सहयोग की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

यदि हम अपने दान का एक बड़ा भाग ऐसे जरूरतमंद लोगों की सहायता में लगाएँ, तो न केवल हमें आत्मिक संतोष प्राप्त होगा, बल्कि यह ईश्वर की सच्ची उपासना भी होगी। यहाँ दिया गया सहयोग सीधे किसी के जीवन में आशा का दीप प्रज्वलित कर सकता है। ऐसे दान का सदुपयोग हमारी आँखों के सामने दिखाई देता है और लाभार्थी के हृदय से निकली सच्ची प्रार्थनाएँ हमारे जीवन को भी आलोकित करती हैं।

निस्संदेह मंदिर हमारी आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के केंद्र हैं। उनका सम्मान, संरक्षण और संवर्धन हमारा कर्तव्य है। किंतु धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है; वह सेवा, दया, करुणा और परोपकार में भी निहित है।

यदि हमारी श्रद्धा मानव-सेवा की दिशा में प्रवाहित हो सके, तो हमारे दान का उद्देश्य और अधिक सार्थक हो जाएगा। अंततः यह निर्णय प्रत्येक श्रद्धालु का अपना अधिकार है कि वह अपना दान कहाँ और किस रूप में अर्पित करे। परंतु इतना तो निर्विवाद है कि ईश्वर को वही दान सर्वाधिक प्रिय होगा जो किसी पीड़ित के आँसू पोंछ सके, किसी भूखे को अन्न दे सके और किसी निराश व्यक्ति के जीवन में आशा का संचार कर सके।

मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है, और यही दान का सर्वोच्च एवं सर्वाधिक पवित्र स्वरूप है।

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