
पता नहीं किस मूड में हमारे पूर्वजों ने यह युक्ति गढ़ दी कि “ईर्ष्या कबहूँ न कीजिए”।
मुझे तो ऐसा लगता है कि उन्हें शायद किसी की प्रगति देखी नहीं गई, तभी हताश होकर उन्होंने यह उक्ति बना दी।
वरना यह तो सर्वविदित है कि लोग उसी से ईर्ष्या करते हैं जो प्रगति-पथ पर बढ़ता हुआ मुसाफिर या पड़ोसी होता है।
कबीर दास सठिया तो नहीं गए थे, जब उन्होंने कहा था —
“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।”
कितना यथार्थवादी दृष्टिकोण सुझाया था कबीर बाबा ने!
भले ही आपको सिर छुपाने की जगह न मिले, लेकिन निंदक के लिए कुटी बनाकर उसे पास रखिए।
अब आप ही बताइए, उस व्यक्ति को कौन महान मानेगा जिससे एक भी व्यक्ति ईर्ष्या न करता हो?
हम उसी से ईर्ष्या करते हैं जो किसी भी तरह अपनी आर्थिक प्रगति करता दिखता है।
उसकी तरक्की देखकर मन में ईर्ष्या की आग सुलगती है, और फिर उसे नीचा दिखाने के लिए हम खुद की संपन्नता बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की जुगाड़ में लग जाते हैं।
अगर हम शांत मन से सोचें, तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हम में से ज्यादातर काम अपने फायदे से ज्यादा दूसरों को दिखाने और जलाने के लिए करते हैं।
ईर्ष्या से प्रगति का नजारा देखिए —
पड़ोसी के यहाँ नई चीज़ आते ही श्रीमती जी अगले दिन खबर सुनाती हैं:
“उनके यहाँ तो फलां चीज़ आ गई है, अब आप भी इसी महीने ले लो। हाँ, उनका वाला मॉडल लेना, भले महँगा हो।”
बस फिर क्या — वर्मा जी के यहाँ बत्तीस इंच का टीवी आते ही हमारी श्रीमती जी किस्त पर बयालीस इंच का टीवी ले आईं।
उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि किस्त भरने से घर का बजट बिगड़ेगा या नहीं।
मैं बहस भी नहीं कर सकता था। उनकी इज्ज़त का सवाल था, और मुझे डर था कि कहीं घर की शांति भंग न हो जाए।
अगर मैं गलत नहीं हूँ, तो आज हमारे घरों की ज़्यादातर चमक-दमक इसी प्रतिस्पर्धा की देन है।
शायद इसी वजह से हमने मन ही मन समझौता कर लिया है कि हम एक-दूसरे से सदा ईर्ष्या करते रहेंगे।
एक के यहाँ कोई चीज़ आते ही, मोहल्ले के बाकी घरों में “हम किसी से कम नहीं” के सिद्धांत पर वही चीज़ मँगवा ली जाती है।
बाजारवाद के युग में ईर्ष्या ने आस-पड़ोस और गली-मोहल्ले में खुद को श्रेष्ठ दिखाने की बीमारी फैला दी है।
ऐसे में “ईर्ष्या कबहूँ न कीजिए” जैसी उक्ति का औचित्य ही क्या रह गया?
मेरी तो धारणा है कि अगर हम सबका भला चाहते हैं, तो एक-दूसरे से ईर्ष्या करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना चाहिए।
ताकि लोग ईर्ष्या से प्रेरित होकर एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते रहें, और हर परिवार प्रगति की राह पर चल पड़े।
हो सकता है इक्कीसवीं सदी में भी कोई सठियाई बुद्धि वाला आपकी तरक्की देखकर सलाह देने आ जाए —
“भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए मानसिक शांति क्यों भंग कर रहे हो?”
ऐसे समाज-सुधारकों के लिए मेरे पास एक ही सलाह है — घर का दरवाज़ा हमेशा बंद रखिए।
आज का युग भौतिकता का युग है। समय के साथ चलना ही बुद्धिमानी और प्रगतिशीलता की निशानी है।
अगर आपके विचार प्रगतिशील नहीं होंगे, तो लोग आपको ‘बुर्जुआ’ कहकर बैठे-बिठाए कलंक लगा देंगे।
इसलिए ईर्ष्या की प्रासंगिकता को समझिए, और खुद भी तथा अपने शुभचिंतकों को भी इसका महत्व समझाते रहिए।
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