
अपनी धार्मिकता को महसूस किया जा सके पर ऐसा नहीं हो सका । इन दिनों युवाओें का आचरण अजीब ढंग का महसूस किया जाने लगा है । स्वछंदता और बेशर्मी इसके मानक बन चुके हैं । यही कारण है कि देश के विभिन्न अंचलों मेें ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं । शादी-ब्याह को खेल समझ लेने की मानसिकता और अपनी तथा कथित स्वतंत्रता का ढिंढोरा । इंदौर की सोनम रघुवशी की दास्तां भी यही थी और सिया की भी । सोनम ने जिस बेदर्दी के साथ राजा रघुवशी को मारा सिया एससे एक कदम आगे निकल गई । विकल्प दोनों के पास थे, सोनम भी यदि शादी से इंकार कर देती तो राजा रघुवंशी की जान बच जाती और सिया भी इंकार कर देती तो केतन अग्रवाल बच जाता । हर एक माता पिता अपने बच्चों की खुशी के लिए बेहतर से बहेतर करते हैं पर यदि यह बेहतर पसंद नहीं है तो मना किया जा सकता है । संोनम ने किसी भी दबाव मेें शादी कर ली और इस चक्कर मेें एक युवा की जान ले लेी । खुद तो जेल की सींकचोें मेें बंद होकर अपना पूरा जीवन ही बरबाद कर लिया पर जिस रघुवंशी परिवार ने उसे दुल्हन बनाकर फूलों की सेज दी उनके लिए तो कभी न भरने वाला जख्म दे ही दिया । सिया के साथ भी ऐसा ही हुआ, उसकी तो अभी शादी भी नहीं हुई थी, केवल रिश्ता तय हुआ था, वह चाहती तो शादी से मना कर सकती थी, वह चाहती तो भाग कर अपने प्रेमी के साथ शादी रचा सकती थी पर उसने इन विकल्पों को छोड़कर अपने मंगेतर को ही मार डालने का कुचक्र रचा । इसमेें एक परिवार का बेटा तो चला ही गया साथ ही सिया और उसके प्रेमी का जीवन भी अंधेरी कालकोठरी में व्यतीत हो जाने का इंतजाम भी हो गया । हमारी संस्कृति और हमारे संस्कारों मेेें शादी-ब्याह को पवित्रता की श्रेणी मेें माना गया है । पर हम तो हमाी संस्कृति को विस्मृत करते ही जा रहे हैं । आधुनिकता के चक्कर मेें जब से हम और हमारी वर्तमान पीढ़ी संस्कृति और संस्कारों से दूर हुई है तब से ऐसी घटनाओं मेें वृद्धि भी हुई है । हम अपने बच्चों को शिक्षा देते समय उन्हें पाश्चात्य संस्कृति का ज्ञान देते हैं तो वे अपनी परंपराओं और संस्कारों से दूर होते जाते हैं, संस्कारविहीन युवाओें से और क्या अपेक्षा की जा सकती है । पर हम सभी को चिन्तन तो जरूर करना चाहिए कि आखिर लगातार ऐसी घटनाएं क्यों हो रहीं हें और इसको रोका कैसे जा सकता है । संभवतः हम एक बार फिर अपनी परंपराओं, अपने संस्कारें और अपनी संस्कृति की तरफ लौटने की आवष्यकता महसूस होगी ं सिया ने जो किया औ सोनम ने जो किया उसका दंड तो वो भोगेगें पर इन परिवारों ने कुछ नहीं किया वे सिया और सोनम से ज्यादा दुख भोगेगें । इसमेें एक बात और शामिल कर लेनी चाहिए वो है भरोसे के टूटने का, विश्वास के कमजोर होने का और संशय, भय के जीवन का । हर एक लड़की भयभीत करने लगेगी, हर बार शादी के समय और शादी के बाद विभिन्न आशंकाओं का जन्म होता रहेगा । अभी जाने कितनी सिया और सोनम मौजूद हैं और जाने कितने केतन और राजा का जीवन दांव पर लगने वाला है । बेशर्मी और केवल बेशर्मी । ऐसी बेशर्मी राजनीति मेें भी दिखाई देने लगी है । नेता दलबदल रहे हैं । दलबदलना तो बेशर्मी है ही पर उससे भी ज्यादा बेशर्मी इस बात को लेकर है कि वे जिस दल से चुनकर आए उसने जो दिया उसे छोड़कर दल नहीं बदल रहे हैं । पश्चिम बंगाल मेें और महाराष्ट्र मेें सांसदों ने जिस तरह से दलबदला वा शर्मनाक तो है ही उससे ज्यादा शर्मनाक यह है कि वे शर्मिंदा हुए बगैर मुसकुराते हुए अपने ही दल के बारे मेें बुरा-भला कहने लगे । राजनीति मेें एक दल से दूसरे दल मेें जाना नई बात नहीं हेै ऐसा होता रहा है पर ऐसा नहीं हुआ कि आप जिस दल के चुनाव चिन्ह पर जीत कर सांसद या विधायक बने उसे छोड़े बगैर दूसरे दल मेेें चले गए । इतनी नैतिकता तो होनी चाहिए कि आप जिस चुनाव चिन्ह पर जीतकर आए, जिन वायदों और सिद्धांतोें को आम मतदताओें के सामने परोस कर आए और उसके कारण उन्हें विजयश्री मिली कम से कम उससे तो त्यागपत्र देकर आते और फिर आम मतदाता के बीच जाकर वोट मांगते । आपका मतदाता तय करता कि आप का निर्णय उसे सही लगा अथवा नहीं, यदि आप फिर से जीत जाते तो आपके निर्णय पर मुहर लग जाती । पर अब नेताओं मेें इतनी नैतिकता कहां बची है । किस ने किस नेता को खरीदा या धमकाया यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि आप जिस दल से जीतकर आए पार्टी छोड़ते समय आप उस पद को भी त्याग कर आते तो मतदाता के बीच आपकी साख बची रहती और लोकतंत्र की लाज भी बची रहती । ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को इस बार पश्चिमबंगाल मेें हार का सामना करना पड़ा तो क्या यह पराजय केवल ममता बनर्जी की ही है अथवा उसमेे ये दलबदलने वाले नेता भी शामिल हैं । हर एक सांसद के संसदीय क्षेत्र मेें लगभग आठ विधानसभाएं तो आती ही हैं और यदि इन आठ विधानसभाओें मेें पार्टी को पराजय मिलती है तो इसका मतलब है कि मतदाता आपके कार्यों से प्रसन्न नहीं है तो स्तीफा तो आपको देना ही चाहिए । लोकतंत्र मेें मतदाता सर्वोपरी माना जाता है यदि उसका विश्वास आपके उपर रहा ही नहीं तो पार्टी की पराजय हुई तो आपका भी नैतिक दायित्व बनता है आप स्तीफा दें, इसके उलट आप पार्टी छोडक़र दूसरी पार्टी मेें जा रहे हैं और जिस पार्टी ने आपको विजयी बनवाया उसे आप बुरा भला कह रहे हैं । यह लोकतंत्र का सबसे कुरूप चेहरा ही माना जा सकता है । महाराष्ट्र हो या पश्चिम बंगाल जिनके सांसदो ने दल बदला और वहीं आप पार्टी के राज्यसभा सदस्य हों चिन्तन तो उनको करना ही चाहिए । राज्यसभा सदस्य तो पूरी तरह पार्टी के विधायकों की वोट से ही बना जाता है ऐसे मेें आप पार्टी के सांसदों को दल बदलते समय राज्यसभा की सदस्यता से स्तीफा देना ही चाहिए था । पर अब राजनीति भी सुविधाभोगी हो चुकी है । इनको अपने दल मेें मिलाने वाले इसके लिए दोषी कम हैं, जाने वाले दोषी अधिक हें । बेशर्मी और केवल बेशर्मी । एक बेशर्मी की घटना अयोध्या मेें स्थित राम मंदिर के दान की चोरी की घटना ने भी हलचल मचा दी है । रक्षक ही भक्षक बनकर दान के पैसों की लूटमार कर रहे थे । राम मंदिर तो भरत के हर एक देष््रावासी के लिए आस्था का केन्द्र रहा है । मंदिर निर्माण से लेकर उसके वर्तमान स्वरूप तक पहुंचाने में लोगों ने श्रद्धा, भक्ति और समर्पण दिखाया है । लोगों ने अपनी हैसियत से ज्यादा दान दिया इस विष्वास के साथ कि भारत मेें और हमारी परंपराओं में दान का विशेष महत्व है । बाबरी मस्जिद के विघटन के साथ ही नए मंदिर बनने की अभिलाषा मेें लोगों ने तब से दान देना प्रारंभ कर दिया था । मुक्त हस्त से जिसके पास जो है उसे दान दे दिया । फिर जब मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ तो ‘‘भारत के हर एक नागरिक की सहभागिता हो’’ इस नारे के साथ गांव-गांव, अमीर-गरीब सभी से चंदा लिया गया और लोगों ने श्रद्धा के साथ दिया भी, अब जब मंदिर बन गया तो प्रभु श्रीराम की मूर्ति की स्थापना हो गई तब भी दान देने का क्रम चलता रहा । वे श्रद्धालु जो अयोध्या मेें भगवान श्रीराम के दर्शन करने जाते हैं उन्होने तो दानपत्रों में नगद राशि, जेवर और सामान दान मेें दिए ही साथ ही वे श्रद्धालु जो अयोध्या नहीं पहुंच पाए उन्होने भी दान दिया । सभी को भरोसा था कि उनका दान भगवान को अर्पित है तो उन तक पहुंच ही रहा होगा और किसी न किसी रूप मेें उनके काम आ रहा होगा । पर एकाएक लोगों को पता चलता है वो जो दान दे रहे हैं वो तो तथाकथित लोग हड़प रहे हें । दान चोरी हो रहा है, सुनियोजित ढंग से चोरी हो रहा है जाहिर है कि यह सब आम जनता की श्रद्धा और भरोसे की भी चोरी है । पहले आरोप लगे, उन्हें नकारा गया, फिर बात आगे बढ़ी तो एसआइटी बनाकर जांच करानी शुरू कर दी । किसी को भरोसा नहीं था कि मंदिर मेें दान की चोरी की इतनी बड़ी कड़ी सामने आएगी । प्रारंभ मेें तो यह ही लग रहा था कि छोटे कर्मचारी थोड़ा बहुत गोलमाल कर रहे होगें, पर जैसे-जैसे जांच आगे बड़ी तो बड़े-बड़े नाम सामने आने लगे । दान चोरी की लम्बी श्रृखला दिखाई देने लगी । खुद जांचकर्ता आश्चर्य मेें रहे होगेें । एक के बाद एक ऐसे नाम संदेह के घेरे मेें सामने आए जिनके बारे मेें सोचा भी नहीं जा सकता था । माथे पर पीला तिलक लगाए और ओठों में राम नाम जपते चेहरों के उपर से नकाब हटता हुआ दिखाई देने लगा । जांच आगे बढ़ती रही और आम लोगों की उत्सुकता भी आगे बढ़ी । एसआईटी को मिला समय खत्म हो गया तो उसने प्रारंभिक रिपोर्ट बना कर सौप दी और यह भी अनुरोध किया कि उन्हें और समय मिल जाता तो वे पूरी जांच कर लेते । पर उनको समय अभी तक तो नहीं मिला जो उनको मिलना चाहिए ताकि वे सच के करीब पहुंच सकें । प्रशासन ने जब उन्हें जांच का आदेश दिया होगा तब प्रशासन को भी भरोसा नहीं रहा होगा कि प्याज जैसी कई परतें हैं जिन्हें जिता छीलते जाओगे उतने ही रहस्य सामने आते जायेगें । अब प्रशासन उन्हें आगे का समय नहीं दे रहा है और उनकी प्रारंभिक रिपोर्ट को ही आधार बना रहा है, जांच रिपोर्ट मेें क्या है यह अभी बताया नहीं गया है पर जो कुछ सामने निकल कर आ रहा है वह ही अचंभित करने वाला है । अब तो वे लोग भी सामने आने लगे हें जिन लोगों ने दान दिया, उनको दिए गए दान की रसीद नहीं दी गइ्र थी पर वे विश्वास के चलते निश्चिंत थे कि उन्होने रामकाज मेें अपना सहयोग किया पर वे आज आशंकित हैं कि उन्होने जो दिया वह मंदिर तक तो पहुंचा ही नहीं, संभवतः बीच मेें ही गायब हो गया । अभी और भी बहुत सारे लोग सामने आयेगें ऐसी संभावना है । किसी ने चांदी की ईटे दान मेें दीं तो किसी ने आभूषण, किसी मेें मंदिर के काम आने वाली सामग्री दान मेें दी तो किसी ने साज-सज्जा के लिए दान दिया । अब वे सारे लोग प्रश्न कर रहे हैं और जानने की उत्सुकता भी है कि आखिर उन्होने जो दान दिया उसका उपयोग कहां हुआ । अब चर्चा शुरू से शुरू हो गई है याने बाबरी मस्जिद टूटने के बाद मंदिर निर्माण की संभावनाओं के साथ दिए गए दान के बारे मेें जानने की फिर आगे की भी । जब किसी को कोई उत्तर नहीं मिलता तो वह अपने मन से गणित लगाने लगता हे जो ज्यादा खतरनाक होता है । राम मंदिर ट्रस्ट ने आठ लोगों के खिलाफ रिपोर्ट तो दर्ज करा दी है और वे अरेस्ट भी हो चुके हैं, पर कहानी केवल आठ लोगों तक सीमित नहीं रह सकती ऐसा माना जा रहा है हो सकता है कि कुछ बड़े लोगों के खिलाफ भी रिपार्ट हो । बहरबहाल इंतजार करना पड़ेगा पर इतना तो तय है कि जांच पूरी और ईमानदारी से करनी होगी वरना यह आम श्रद्धालुओं से जुड़ा मामला है तो आम जनता इसके खिलाफ खड़ी हो जायेगी । जैसे एक खराब ईट पूरी इमारत को ध्वस्त कर देती है तो क्या यह खराब ईट ही है जो पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगी है । जांच तो पूरी होनी चाहिए केवल प्रारंभिक जांेच से काम चलने वाला नहीं है । इस पूरे घटनाक्रम ने शंकायें तो पैदा कर ही दी हैं । किसके उपर क्या कार्यवाही होगी वो अलग विषय हे पर भारत जेसे संस्कृति प्रधान देश मेेें भी ऐसा हो सकता है यह आश्चर्यजनक अवश्य है ।
बेशर्मी और केवल बेशर्मी ।
