आज शिक्षा और बेरोजगारी की बहुत बात की जाती है। नेताओं से लेकर चाय की दुकान तक यही चर्चा है। पर क्या कभी हमने सोचा है कि समस्या की जड़ कहाँ है?

क्या कोई भी सरकार, चाहे वह किसी भी राज्य या देश की हो, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों से निकलने वाले हर विद्यार्थी को सरकारी नौकरी दे सकती है? कदापि नहीं। क्योंकि हर सरकारी पद के लिए अलग-अलग योग्यता तय है। डॉक्टर के लिए चिकित्सा स्नातक, इंजीनियर के लिए अभियांत्रिकी स्नातक, शिक्षक के लिए शिक्षा स्नातक चाहिए। फिर कला स्नातक, कला परास्नातक पास सभी युवाओं को एक ही पलड़े में रखकर नौकरी कैसे दी जा सकती है?
हर माँ-बाप जब बच्चे को स्कूल भेजते हैं तो आँखों में एक सपना लेकर चलते हैं। बच्चा भी बड़ा होकर कुछ बनने का सपना पालता है। मेहनत भी करता है। पर साथ ही मन में एक डर भी रहता है – “अगर इसमें सफल न हुआ तो?”
यही डर हमें भटका देता है। बच्चा पैदा होते ही माँ-बाप तय कर देते हैं – “इसे डॉक्टर बनाना है” या “इंजीनियर बनाना है”। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसकी रुचि और क्षमता सामने आती है। विज्ञान में नंबर कम आए तो “चलो वाणिज्य करा देते हैं, चार्टर्ड अकाउंटेंट बन जाएगा”। वहाँ भी राह कठिन लगी तो “कला परास्नातक कर लो, फिर प्रतियोगिता की तैयारी”। और अंत में एक औसत विद्यार्थी के कंधे पर भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा बनने का बोझ लाद दिया जाता है।
यह किसी एक घर की कहानी नहीं है। यह आज अधिकांश भारतीय परिवारों की हकीकत है।
पढ़ाई समाप्त करने के बाद जब सपना टूटता है तो युवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दरवाजा खटखटाता है। पर वहाँ उसके लिए जगह नहीं होती। क्योंकि बाजार को डिग्री नहीं, “कौशल” चाहिए। उसे ऐसे लोग चाहिए जो काम कर सकें, समस्या सुलझा सकें। कला स्नातक, कला परास्नातक की डिग्री से वहाँ कोई उपयोगिता नहीं बचती।
इन सब दरवाजों से निराश होकर अंतिम सहारा बचता है – सरकारी नौकरी। जहाँ एक बार लग गए तो सेवानिवृत्ति तक वेतन सुरक्षित। काम करो या न करो, तनख्वाह आती रहेगी। इसी “सुरक्षा” के मोह में लाखों युवा सालों तक कोचिंग और प्रपत्र भरने में निकाल देते हैं।
आज प्रतियोगिता का युग है। यहाँ रोने-धोने से कुछ नहीं होगा। हर व्यक्ति को अपनी प्रतिभा सिद्ध करनी होगी। डिग्री के साथ हुनर, मेहनत और नई सोच जरूरी है। वरना हम बेरोजगारी का शोर मचाने वाली भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे। और शोर से पेट नहीं भरता।
जंगल में शेर भी तभी जिंदा रहता है जब वह शिकार के लिए संघर्ष करता है। इंसान को भी अब संघर्ष करना ही होगा।
और यह सोचना होगा बेरोजगार युवकों को।तथा उन्हें तय करना होगा कि अपनी प्रतिभा और मेहनत से जीने की नई राह तलाशते हैं, या आलस्य का लबादा ओढ़कर बेरोजगारी का रोना रोते हैं।
क्या वे माँ-बाप के ऊपर बोझ बनकर, हाथ में मोबाइल लेकर, सामाजिक माध्यमों पर शोर मचाने वाली भीड़ का हिस्सा बनकर रहना चाहते हैं?
या फिर अपनी मेहनत से अपना और अपने परिवार का नाम रोशन करना चाहते हैं?
कहावत है न – “न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी”
मतलब ये कि पहले सब व्यवस्था आपके अनुकूल हो, फिर आप कदम बढ़ाएंगे – ऐसा इंतजार करते-करते जिंदगी निकल जाएगी।
जो उपलब्ध है, उसी में राह तलाशनी होगी। शोर मचाने से व्यवस्था एक दिन में नहीं बदलेगी। अगर आज हम “परिपूर्ण व्यवस्था” का इंतजार करेंगे, तो सवाल है – आज कैसे जिएंगे? आज का खर्च, आज का घर, आज की इज्जत कौन चलाएगा?
फैसला उन्हें ही करना है। क्योंकि जिंदगी शोर मचाने से नहीं, संघर्ष करने से बदलती है।
