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कल्पनाएँ , स्वप्न या सत्यमूल : आशा सहाय

कल्पनाएँ जो सामान्य शब्दों में मनोजगत की सृष्टि समझी जा सकती हैं और मानव निर्मित दृश्य और अदृश्य जगत को प्रभावित कर, उसे रंग रूप और आकार देती हैं ,वे स्वयं कहाँसे और क्यों सृष्ट होती हैंयह एक विचारणीय प्रश्न है।कल्पना से क्या ज्ञान का कोई सम्बन्ध है?क्याये सत्य के समीप होती हैं अथवा उसके पूर्वरूप ? यह मन और भावना की एक अलग परत है,जिसे न आँका जा सकता और न किसी कसौटी पर कसा जा सकता है।यह अनर्गलऔर निरर्थक भी हो सकती हैं और सार्थक भी।इसका क्षेत्र अपरिमित और अंतहीन है। भारतीय अध्यात्म इसे मनोमय देह का अंग मानता है जो स्मृतियों ,वर्तमान और भविष्य को एक स्वरूप प्दान करता है।पर स्वप्नों का क्या? ये कहाँ से आते हैं ? बहुत सरल है यह कह देना कि ये भी मनोमय जगत की ही क्रीड़ाएँ हैं। क्रीड़ाएँ इसलिए कि आँखें खुलने पर उनका कोई अस्तित्व नहीं रहता। बस स्मृति रहती है। वह भी कुछ अंशों तक। कभी कभी तो उन स्वप्नों सेहम चमत्कृत भी होते हें क्यों कि न उनका कोई आदि होता है न अन्त न ही स्वप्नघटित स्थितियों की कोई संभावना ही होती है। अगर मन ही उनका जनक है तो अकारण वहऐसे अप्रासंगिक खेल कैसे खेल सकता है।सम्बद्ध व्यक्ति की भावनाओं को वह कई रूप तो दे सकता है किन्तु अनदेखे काल और स्थान से वास्तविकता की हद तक जोड़कर एक सत्य कथा का सृजन कैसे कर सकता है। कभी कभी तो यह एक भविष्य कथा अथवा काल अतीत स्थितियों का नाटकीय चित्रण कर डालता है।जो कभी घटित नहीं हुई ऐसी धटनाओं को जीवन से जोड़ देता है। कभी ऐसे दृश्य भी दिखा देता है जो व्यक्ति, देश और समाज की भयावह भावी स्थितियाँ होती है, और कालान्तर मे सत्य भी सिद्ध हो जाती हैं। आध्यात्म और मनोविज्ञान ने कई तरह से इसे व्याख्यायित करने की कोशिश की हैपर फ्रायड, एडलर ,युंग आदि ने भी अपनी सीमाएँ पहचान लीं।सारे स्वप्न उनके सिद्धांतो का ही परिपोषण करते नहीं प्रतीत हुए।ये सभी भी तो भौतिक शरीर के मन को ही विश्लेषित कर रहै थे। सच तो यह है कि जहाँ ये सारे विश्लेषण नहीं पहुँच पाते वहाँ आध्यात्म पहुँच जाता है।

किनतु कहीं ऐसा तो नहींकि स्वप्नों का सम्बन्ध भी कल्पनाओं से होता हो!संभव है-कि स्वप्न में हमारा मनोजगत कल्पनाओं में डूब जाता हो। यह इसलिए भी संभव है कि मस्तिष्क निंद्रा में जाग्रत अवस्था के वास्तविक तनावों से मुक्त होकर उनका सरलतम निदान ढूँढता है। यह निदान उसे कल्पनाओं में ,भविष्य के संदर्भ में अतीत की स्मृतियों के ताने बाने से जुड़कर मिल जाता हो यह संभव है !पर यही सब कुछ तो नहीं। प्रश्न है कि ये कल्पनाएँ हैं क्या?ये कहाँ से आती हैं?
शास्त्र कहते हैं कि हमारी आत्मा अपनी आंतरिक उन्नयन यात्रा मे साधना के द्वारा इस भौतिक शरीर के विभिन्न आयामों मे प्रवेश करती है, जिसका एक स्वरूप मनोमय देह का है।दुख और सुख मनोमय देह को अनुभूत होते हैं।साधक इस स्तर पर विचारों और भावनाओं को अलग अलग देख सकता है। कल्पनाओं और विचारों से सत्य को ढूँढ सकता है।यह वह आयाम है जिसमे पहुँच वह सपनों और ,कल्पनाओं द्वारा चिंतन को सही निर्णय की ओर प्रेरित करता हैं। है।यौगिक साधना द्वारा इसी भौतिक शरीर के भावनात्मक स्वरूप के साथ वह ब्रह्म तक की यात्रा कर लेता है और निरंतर विभिन्न शक्तियों को प्राप्त करता रहता है। किन्तु मनोमय दैहिक स्वरूप में भी ये कल्पनाएँ आती कहाँ से हैं, यह प्रश्न अब भी शेष है।
वस्तुतः ये कल्पनाएँ भी चेतना से उद्भूत हैं।।ब्रहमाण्डीय चेतना जो सृष्टि के कण कण में है – वह अतीत और भविष्य सबकी नियामक तो है ही पर जो उससे भी सम्बद्ध नहीं और ,विविध कल्पनाओं के रूप ग्रहण कर स्वप्न मे अनेकानेक रूपों में आती हैं वे इसी ब्रह्माण्डीय चेतना के प्रतिफल हैं।मानवीय चेतना इस ब्रह्माण्डीय चेतना से इन वैचारिक स्वरूपों को अपने लिए खींच लाती हैं।इन्हें हम कल्पना की संज्ञा दें अथवा कुछ और की ,–कोई अतर नही होता।
जिसे हम अचानक से आए एक विचार का प्रतिफल मानते हैं, जिसे दूसरे यूनिवर्स में स्वयं की उपस्थिति अथवा गतिमान स्वरूप मे स्वयं की भागीदारी की प्रतीति मान लेते हैं, वे इसी सर्वत्र विद्यमान ब्रहमाण्डीय चेतना के प्रतिफल हैं।वे कल्पनाओं के रूप में मन में आ सकते हैं।मन ब्रह्माण्ड का चक्षु है जो पूरे ब्रह्माण्ड के सभी चाहे अनचाहे पहलुओं को देखता है।कल्पना मनःतत्व है।चूकि मन हर दिशा औरकाल का प्रत्यक्ष कर सकता है,वह चेतना के उन स्वरूपों की भी कल्पना कर स्वप्नों में प्रगट कर देता है जो हमारी सोच की सीमा में आ ही नहीं सकते।यह चेतना काल और स्थान की बाधा से बाधित नहीं होती।
चेतना के ऐसे अबूझ स्वरूपों को योगी, संत, धर्माचार्य आदि तो योग बल से पकड़ते ही हैं इन्द्रियोंसे विहीन तथा विकलाँग भी अपनी अन्य शक्तियों को विकसित कर पकड़ पाने में समर्थ हो सकते हैं ।और अगर ये कल्पनाएँ इसी चेतना के व्यक्त, अव्यक्त स्वरूप हैं तो कालांतर में इनका सत्य हो जाना भी अत्यंत सहज ही है। इस प्रत्यभिज्ञा से समानांतर ब्रह्माण्ड अथवा अन्यान्य लोकों की कल्पनाओं में स्वयं का प्रत्यक्षीकरण भी स्वयंमेव व्याख्यायित हो जाता है। स्वप्न में दिशानिर्देश मिलना, समस्याओं का समाधान अचानक प्रस्तुत हो जाना भी निरंतर सक्रिय चेतना के द्वारा ही संभव है।
ब्रह्माण्डीय चेतना मस्तिष्क की चेतना को आहार देती है।अपने सम्पूर्ण स्वरूप से कुछ की झलकियाँ संकेत रूप मे वह मस्तिष्क को प्रेषित करती है।हमारा मस्तिष्क ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क का ही प्रतिरूप है ऐसा अब आज के वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं।फिर उसके त्रिकालीय और बहुआयामी संकेतों का हम तक पहुँचना कोई आश्चर्य का विषय नहीं।संभव है ये संकेत हमें वर्तमान जीवन के सत्य प्रतीत न होकर मात्र कल्पना से प्रतीत हों ।पर उनका स्वप्नों में आना ही उन्हें सत्य के करीब ले आता है ।वह सत्य आज का नहीं होकर भावी कल का हो सकता हैअथवा दूरगामी सुदूर भविष्य का हो सकता है।ब्रह्माण्डीय चेतना के ये स्वरूप प्रतीकात्मक कल्पनाएँ हो सकती हैं।संभव है कि वे जीवन के सत्य के अत्यन्त करीब या उनके पूर्वरूप भी हों।

आशा सहाय

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