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इस ब्रह्माण्ड में :- सवर्ण सिर्फ टैक्स भरने, सीजेपी धरना देने, कांग्रेस शोषण करने, सपा जातिवाद करने और बीजेपी वाले देश बचाने आए है ….पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

यह पूरा लोकतंत्र एक पूरी आकाशगंगा है जिसमें अच्छे बुरे ग्रह और करोड़ों तारे सपा बसपा रूपी नक्षत्र और असपा प्रसपा रूपी कंजड़ उल्का पिंड जिनके बीच में एक मोदी नाम का सूरज जल रहा है। इस गैलेक्सी के एक कोने में, एक छोटा सा भगवा झंडा लगा है जिसके नीचे लिखा है – सवर्णों टैक्स भरना ठीक है, पर अपना अधिकार मांगना मना है क्यूंकि तुम सोने का चम्मच लेकर पैदा होते हो। उधर राहुल नाम का राहु डर के जीने को गलत बता रहा और सबको आंदोलन में झोक रहा। अपनी कीमत मत बढ़ने दो। जिंदगी सिर्फ सर्वाइव करने के लिए नहीं है। और हाँ सुनो राहुल सर ! वीर रस में पढ़े गए दो के पहाड़े जैसा तुम्‍हारा भाषण अब कोई नहीं सुनना चाहता। सॉरी सॉरी के बोल सुनकर पब्लिक की स्‍क्रीन तक, तुम से बोर हो गई है। तुम्‍हारी हक्लाती जबान और नकसुरे बोल अब कानों को चुभने लगे हैं। मुश्लिमेनिया से ग्रसित तुम्‍हारे आत्‍मरति के शब्‍द बिलकुल छिछले हो गए हैं। रहने दो, क्‍यों पीछे पड़े हो भारतीय लोकतंत्र के, छोड़ो अगले को आने दो ! वक्‍त आ गया है। सबका वक्‍त आता है। चले जाओ, उस थोड़ी सी इज्‍जत के साथ, जिसका तुम्‍हें आज भी भरम है। वक्‍त बदल गया है। तुम्‍हारे नारों का खोखला ढोल फट गया है। तुम्‍हारे वादों का रुई का पहाड़ कपास के जैसा उड़ रहा है। तुम्‍हारे परिवारतंत्र की महकती कपूर हवा हो गई है। तुम्‍हारी दाढ़ी से काले बाल फना हो रहें है। इसलिए रहने दो। न यकीन हो तो आईने से पूछो। वह अब भी सच बोलने की जुर्रत करता है। अयोध्या के पांडे जो पवन हो चुके है उनके प्रपंचों के पुरोधा बने चापलूसों से पूछो ! और साथ में अपने पालतुओं को भी ले जाओ बेवजह, वे लोग महिलाओं पर जुता चलवा रहें।
यही भारत की सबसे बड़ी बीमारी है कि हम राहुल मोदी और कॉकरोच के अलावा कुछ नही देखना सुनना और चबाना पसंद कर रहें। हम सवर्ण इस दोमुहे संविधान के तले जी नहीं रहे, सिर्फ भर रहे हैं। सुबह उठो – बिल। अखबार का, बिजली का, पानी का, स्कूल का, फोन के इएमआई का। फिर टैक्स जीएसटी , पेट्रोल पर टैक्स, सैलरी पर टीडीएस । और फिर डर भी लगा है कि सरकार के खिलाफ लिखा तो नौकरी जाएगी भ्रस्टाचार के खिलाफ लिखा तो पेंशन मिलेगी या नहीं ? प्राइवेट स्कूलों के लूट पर लिखा तो कहीं बच्चा बेरोजगार रह गया तो ! सर भागवत ने इसी को कहा था – हमने 1.1 करोड़ लोगों को हाई वेज एन्क्लेव बना दिया। 42% इनकम टैक्स वही दे रहे हैं, बाकी 10 करोड़ प्राइवेट की सैलरी 14.2 लाख से 10.8 लाख पर आ गई। प्रॉफिट 173% बढ़ा, वेतन 31%। पर गरीब अब भी गरीब है और मुफ्त का राशन अब भी बटता है, मतलब एक छोटा सा तबका डर में टैक्स भर रहा है, बड़ा तबका एससीएसटी से डरा के मलाई खा रहा है। जी कौन रहा ? फर्क सिर्फ तुम्हें पड़ता है। क्योंकि तुम एक ही जिंदगी लेकर आए हो। टैक्स भरना गलत नहीं। बिल भरना भी ठीक है। पर विरोध तो करना पड़ेगा क्यूंकि तुम पैदा बिल भरने के लिए नहीं हुए जो करना है करो – नौकरी, टैक्स, सेविंग। पर उसके बीच में वो मत भूलो जिसके लिए पैदा हुए थे। एक शाम बिना मोबाइल के आसमान देखना और सवर्ण बच्चों के भविष्य की चिंता को समझना। सरकार का काम है आंकड़े देना – 185 लाख करोड़ कर्ज, 53% डीए, आठवा वेतन आयोग और गरीब फिर भी गरीब। काम है आंकड़ों के बीच में जिंदा रहना तो फिर वेतन आयोग घटाओ, आठवें को तीसरे पर लाओ, पचास हजार से ऊपर किसी को सैलरी मत दो। ना पैसा रहेगा ना घूसखोरी बढ़ेगी ना कोई ऐस करने वाला लुटायेगा ना गरीबी रोयेगी ! गैलेक्सी के उस झंडे को देखो। वो तुम्हारा सनातन है और तुम उसके सवर्ण । पेपर पर टैक्स पेयर, पर असल में एक इंसान – जो इस अनंत में सिर्फ एक बार आया है वो भी बिल, टैक्स और कर्ज भरने , पर डर में मत मरो। भटका युवा हर जगह है। धरनो में भी है। किसान आंदोलन याद है ना, लम्बा चला था, लास्ट मे लाल किले पर चढ़ाई की, तिरंगा उतारा फिर भी पुलिस चुपचाप देखती रही, सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया। पहलवानों ने कथित यौन शोषण को लेकर दिल्ली मे आंदोलन किया, सड़क से संसद तक पहुंच गये, अच्छी खासी झड़प हुई मग़र पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की। जेन जी के पास भागने, भौंकने, सुबह धरने पर, दिन में पुलिस की गाड़ी में अलग अलग पोज में फोटो खिंचवाने और रात में रिहा होने के अलावा देश के लिए एक योगदान बताओ इन युवाओं का ! वैसे आजकल नेहा वोरा और अनेक उन टाईप की प्रोटेस्टर भाईजान लोगों की आदर्श बनी हुई हैं जो अपनी लड़कियों को टेंट जैसे कपड़े में रखते हैं और तुम्हे जंतर मंतर पर टीशर्ट में। जुलाई मे नीट पेपर लीक का आंदोलन हुआ, सो कॉल्ड ‘जेन जी’ ने उपद्रव किया, गालियां दी, सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचाया और सुरक्षा को तोड़ते हुऐ संसद तक जा पहुँचे फिर भी पुलिस और सरकार खामोश रही। आज 10 अक्टूबर ऐसा क्या हुआ जो आंदोलन को शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया, सीजेपी की टॉप लीडरशिप को फ्लाइट से ही उठा लिया, तमाम अन्य दलों के नेताओं को भी घर से निकलते ही डिटेन कर लिया। तीनों आंदोलनों मे क्या फ़र्क है जो पहले दो आंदोलन मे कार्यवाही नहीं हुई और तीसरे मे जबरदस्त कार्रवाई कर दी। वही पुलिस वही सरकार और वही विपक्ष फिर आज का निर्णय अलग क्यूँ ? क्या सरकार ने पहले वाले आंदोलन से सबक लेकर ये बंदोबस्त किया? ध्यान से देखिये तो समझ आयेगा सरकार का काम करने का तरीका सबसे महत्वपूर्ण है आप किस मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रहे हो? सरकार डिफेंसिव होंगी या आक्राम्क ये आंदोलन की फेस वैल्यू पर डिपेंड करता है। 2021 मे किसान आंदोलन मे ये आंदोलनजीवी अन्नदाता का मुखौटा पहने हुऐ थे इसलिए सरकार खामोश रही। पहलवान आंदोलन मे देश के खिलाड़ी चेहरा थे प्लस यौन शोषण का गंभीर आरोप सराकर चुपचाप देखती रही पुलिस के हाथ बांधे रखे। जुलाई मे नीट पेपर लीक आंदोलन -आंदोलन का चेहरा छात्र और चिंता उनके भविष्य की खूब गालियां दी गई,उपद्रव किया गया फिर भी सरकार सब्र का कड़वा घूंट पी कर मौन रही, अब आया 10 अक्टूबर मुद्दा। कथित वोट चोरी का मतलब जनता के किसी भी वर्ग से डायरेक्टली कनेक्टेड नहीं और ना कोई इमोशनल अटैचमेंट, सरकार ने फ्री हैंड दे दिया दिल्ली पुलिस को, और दिल्ली पुलिस ने वो कर दिखाया जो पिछले 12 साल से हमने नहीं देखा था और जिसका इंतज़ार करते करते हमारी आँखें सुख गई थी, आज की दिल्ली पुलिस की कार्यवाही के माध्यम से सरकार ने विपक्ष को, और अपने समर्थकों को क्लियर मैसेज दे दिया कि हमारी शराफत को हमारी कायरता समझने की भूल मत करना, हम सबक सीखते भी हैं और सिखाना भी जानते हैं। सरकार का दूसरा क्लियर मैसेज विपक्ष को ये है की वोट चोरी के फेक मुद्दे पर वो एक इंच भी नहीं झुकने वाली। इस्तीफा तो दूर तुम्हें आंदोलन करने की जगह भी नहीं दी जायेगी। मुझे लगता है अगले कुछ दिनों या महीने दो महीने मे ज्ञानेश कुमार का मुद्दा वैसे ही ठंडे बस्ते मे जाने वाला है जैसे कभी एवं का गया था, राफेल का गया था, चौकीदार चोर का गया था, पैगासास, जीएसटी और नोटबंदी का गया था। अपनी यात्रा को स्वीकार लो तो.. कभी कभी रास्ता बदल लेना हार मानना नहीं होता। समझदार आदमी ही रास्ता बदलता है। मंजिल एक रखनी है, रास्ता कोई भी ले लो.. और सच कहूं तो कभी कभी वक्त के साथ मंजिल भी बदल जाती है।

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