कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
देश की राजधानी दिल्ली मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के चलते अस्त-व्यस्त हो चुकी है। दो अक्टूबर से लगातार चल रहे धरना-प्रदर्शनों ने दिल्लीवासियों के साथ-साथ देश के कोने-कोने से आने-जाने वाले लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दस अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी के धरने के दौरान दो सौ से अधिक रेलगाड़ियाँ और 57 से अधिक मेट्रो ट्रेनें बंद किए जाने की खबरों के बीच पूरी दिल्ली को 43 हजार सुरक्षाकर्मियों के घेरे में ले लिया गया। दिल्ली से जुड़े राज्यों की सीमाओं पर भी सख्ती की गई, ताकि प्रदर्शनकारी राजधानी में प्रवेश न कर सकें। जंतर-मंतर, जहाँ अक्सर धरना-प्रदर्शन होते रहते हैं, उसे भी किसी बक्से की तरह सील कर दिया गया। क्या यह अजीब नहीं लगता कि प्रदर्शन रोकने के लिए पूरी दिल्ली को ही जेल बना दिया गया?
कांग्रेस और विपक्षी दल दो अक्टूबर से लगातार जुलूस और धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके कारण कभी एक मार्ग बदला जा रहा है तो कभी दूसरा। आम आदमी, जिसे न ज्ञानेश कुमार से कोई मतलब है और न ही किसी राजनीतिक दल से, वह इन दो पाटों के बीच पिस रहा है। सब कुछ अस्त-व्यस्त है और तीज-त्योहारों का समय भी चल रहा है। आखिर इसका हल क्या है? आंदोलन करने वाले गलत नहीं हो सकते और न ही उन्हें रोकने का प्रयास कर रही सरकार को पूरी तरह गलत ठहराया जा सकता है, लेकिन इसका कोई रास्ता तो निकलना ही चाहिए। दुर्भाग्य से समाधान की संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही है।
आंदोलनकारी आंदोलन कर रहे हैं और पुलिस उन्हें रोकने का प्रयास कर रही है। हालाँकि, इस बार पिछली बार की तरह पुलिस ने लाठीचार्ज या ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे वह कटघरे में खड़ी हो। यह पुलिस की तारीफ के काबिल है। दूसरी ओर, पुलिस के जवान आरोप लगा रहे हैं कि प्रदर्शनकारियों ने उनके साथ मारपीट की। वे अपने टूटे हाथ और खून बहते घाव भी दिखा रहे हैं।
कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को उम्मीद है कि केंद्र सरकार पर दबाव बनाए रखने से एक दिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना पड़ेगा। वे इसी रणनीति के तहत अपने लोकसभा और राज्यसभा सांसदों के साथ लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी को अपने पिछले आंदोलन की सफलता का गुमान था। उसे लगता था कि जिस तरह धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया गया, उसी तरह ज्ञानेश कुमार का भी इस्तीफा लिया जा सकता है। पार्टी ने आह्वान किया, लेकिन सरकार ने आंदोलनकारियों को दिल्ली में प्रवेश ही नहीं करने दिया।
इस बार प्रदर्शन में अधिक भीड़ दिखाई नहीं दी। खुद अभिजीत दीपके और उनके दो साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली पुलिस ने पहले ही दिन आंदोलनकारियों का हौसला तोड़ने की रणनीति अपनाई और विभिन्न राज्यों से आने वाले हजारों लोगों को उनके अपने प्रदेशों में ही रोक दिया। परिणामस्वरूप, कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन फीका दिखाई दिया। इससे सरकार के हौसले भी बुलंद हुए हैं। भाजपा प्रतिदिन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आंदोलनकारियों को हतोत्साहित करने का प्रयास कर रही है और उनके आंदोलन को राजनीतिक गतिविधि बताकर उसका प्रभाव कम करना चाहती है।
इस पूरे प्रकरण में चुनाव आयोग की भूमिका खामोश बनी हुई है। जिसके खिलाफ आंदोलन हो रहा है, वह मौन है, जबकि सरकार अपनी जिम्मेदारी समझकर जवाब दे रही है। इंडिया गठबंधन के लगभग सभी प्रमुख दलों के नेताओं वाले एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से मुलाकात की। वे मुख्य न्यायाधीश से भी मिलना चाहते थे, लेकिन उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली। इसे इंडिया गठबंधन की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। गठबंधन इस मुद्दे को जीवित रखना चाहता है, क्योंकि यह तब तक सुर्खियों में रहेगा, जब तक धरना-प्रदर्शन जारी रहेंगे। फिलहाल विपक्ष अपनी इस रणनीति में सफल दिखाई दे रहा है।
ममता बनर्जी भी इस मुद्दे पर लगातार हमलावर हैं। उन्हें लगता है कि पश्चिम बंगाल में उनकी सत्ता जाने का कारण ज्ञानेश कुमार हैं। वे इंडिया गठबंधन के धरना-प्रदर्शनों के साथ-साथ कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में भी शामिल हुईं। अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के चुनाव को लेकर अधिक चिंतित हैं। वे प्रदेश छोड़कर दिल्ली आने से बच रहे हैं, हालाँकि उनके सांसद इंडिया गठबंधन के प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं। उनके बयान भी मुख्यतः उत्तर प्रदेश की राजनीति पर केंद्रित हैं।
अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। एक आरोप लगाता है तो दूसरा जवाब देता है। मतदाता इनसे कितना प्रभावित होगा, यह कहना मुश्किल है। इतना तय है कि चुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वर्ष 2017 से पहले और वर्तमान उत्तर प्रदेश की तुलना करेंगे, जबकि अखिलेश यादव सरकार के कामकाज की कमियाँ गिनाएँगे।
इस बीच मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे का आंदोलन भी अखिलेश यादव के लिए महत्त्वपूर्ण है। एसआईआर के दौरान उत्तर प्रदेश में भी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे जाने के आरोप हैं। अखिलेश यादव को भरोसा है कि हटाए गए नामों में भाजपा समर्थकों के नाम भी हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में कड़ी सुरक्षा के बीच चुनाव कराए जाने के अनुभव को देखते हुए उन्हें आशंका हो सकती है कि उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह की सख्ती समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है। विपक्ष चाहता है कि एसआईआर की प्रक्रिया बंद हो।
आम आदमी पार्टी को भी आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव की चिंता है। वह ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सक्रिय है, लेकिन कांग्रेस के साथ खड़ी नहीं हो सकती। दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस उसकी प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। इसलिए वह अपनी लड़ाई अलग लड़ रही है। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में भी उसके नेता शामिल हुए और अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी भी सुर्खियों में रही। हालाँकि, पार्टी में पहले की तरह सक्रिय और चर्चित नेताओं की कमी दिखाई देने लगी है। संजय सिंह और मनीष सिसोदिया ही अधिक सक्रिय नजर आते हैं। दिल्ली की सत्ता उसके पास नहीं है, हालाँकि कार्यकर्ता अब भी मौजूद हैं।
सरकार के सामने भी चुनौतियाँ हैं। वह मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा नहीं चाहती और चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे एसआईआर का समर्थन करती है। भाजपा का मानना है कि एसआईआर से चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ा है और अपात्र मतदाताओं की पहचान हुई है। भाजपा के कई सांसद ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न देने की मांग भी कर रहे हैं। वहीं, पूर्व न्यायाधीशों और पूर्व आईएएस तथा आईएफएस अधिकारियों ने पत्र लिखकर उनका समर्थन किया है। उनका कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अपना काम सही तरीके से कर रहे हैं और उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। हालाँकि, ऐसे समर्थन-पत्रों का कितना प्रभाव पड़ता है, यह स्पष्ट नहीं है।
ज्ञानेश कुमार का मुद्दा इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि दूसरे मुद्दे पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। यदि कोई नागरिक या राजनीतिक दल किसी संस्था की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं है, तो उसे अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन जब इतने सारे राजनीतिक दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, तब सरकार को भी विचार करना चाहिए। जिस संस्था पर निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी है, यदि उसी की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें, तो आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लगातार चलता रहेगा। इसलिए समाधान निकालना अब जरूरी हो गया है।
आगामी महीनों में पंजाब, उत्तर प्रदेश सहित पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ये चुनाव न केवल निष्पक्ष होने चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखाई भी देने चाहिए। भारत का लोकतंत्र विश्व में अपनी विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है। उसकी साख बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे आंदोलन को विदेशी मीडिया में भी जगह मिल रही है। जाहिर है कि अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार पर टिकी हैं।
उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल बनने लगा है। भाजपा और समाजवादी पार्टी ने अपने प्रचार की शुरुआत कर दी है। सभाएँ हो रही हैं और एक-दूसरे को चुनौती दी जा रही है। अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी, जिसे योगी ने स्वीकार करते हुए अखिलेश को भी वहीं से चुनाव लड़ने की चुनौती दे दी। अयोध्या की लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की जीत से अखिलेश यादव उत्साहित हैं। शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि योगी उनकी चुनौती स्वीकार कर लेंगे।
समाजवादी पार्टी पूरे प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन है, लेकिन सीटों के बँटवारे पर अभी सहमति नहीं बनी है। कांग्रेस अधिक सीटें चाहती है, जबकि अखिलेश यादव का मानना है कि गठबंधन को उन्हीं सीटों पर प्रत्याशी उतारने चाहिए, जहाँ जीत की संभावना हो। यह रणनीति व्यावहारिक है, क्योंकि केवल चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशी उतारने से गठबंधन का नुकसान हो सकता है। उम्मीद है कि यह विवाद सुलझ जाएगा और दोनों दल साथ चुनाव लड़ेंगे।
दूसरी ओर, एआईएमआईएम भी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। उसने समाजवादी पार्टी के सामने गठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव रखा था, जिसे अखिलेश यादव ने स्वीकार नहीं किया। अब उसके अपने प्रत्याशी उतारने से विपक्षी गठबंधन के मतों में बँटवारा हो सकता है। चुनाव में अभी कुछ समय है, इसलिए आने वाले दिनों में राजनीतिक समीकरणों में बदलाव संभव है।
फिलहाल दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग, एसआईआर का विरोध और विपक्षी दलों की रणनीति ने राजनीति को गरमा दिया है। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल आम नागरिक की परेशानी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का है। आंदोलन और सरकार के बीच टकराव का रास्ता निकालना आवश्यक है, ताकि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार भी सुरक्षित रहे और आम जनता को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना भी न करना पड़े।
