बहुत पहले की बात है। नेहा गर्मी की छुट्टियों में गांँव गई तो एक तो शहर से आने का रुतबा,दूसरा शहरी लड़की होने का एहसास उसे सबसे अलग कर रहा था। गाँव में शहर से आने वालों की कद्र कुछ ज्यादा ही होती थी। मानों आकाश से कोई भगवान ही उतर आया हो । नेहा भी अपने को सबसे अच्छा समझ रही थी । वह जबसे गाँव आई थी उसके पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे । वह गाँव के सभी हमउम्र बच्चों पर अपना रोब झाड़़ते फिर रही थी। उसे थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती थी और गाँव के कुछ बच्चे उससे अंग्रेजी सीखना चाहते थे।उन सब की यह सोच थी कि शहर में रहने वालों की अंग्रेजी बहुत अच्छी होती है। वैसे नेहा को अंग्रेजी तो बहुत कम आती थी पर वह उसे ही सब बच्चों को सिखाती फिर रही थी। मेहा, गीता और सीमा सभी लड़कियांँ उसे घेरे रहतीं थीं। वे नेहा को खुश करने का प्रयास करतीं और फिर उससे अंग्रेजी
सिखाने के लिए कहतीं,
“अरी नेहा हमहू के अंगरेजिया सिखाय देव” यानी मुझे भी अंग्रेजी सिखा दो ।
नेहा एक सीधी-सादी बालिका थी वह किसी को भी मना नहीं करती थी। वह सब को लेकर अपने घर के बाहर दरवाजे पर बैठ जाती और फिर एक अच्छी शिक्षिका का चरित्र निभाने लग जाती थी।
“गीता तुम एबीसी पूरा लिख कर दिखाओ।”
“सीमा तुम अभी भी ठीक से नहीं लिख रही हो।”
इसी तरह अन्य बच्चों से भी कहती थी और उसके सभी हमउम्र बच्चे आज्ञाकारी बच्चों की तरह ही उसकी सारी बात मानते थे।
“ठीक है नेहा, देखो तो अब कैसा लिखे है?” मेहा ने कहा ।
“ठीक है थोड़ा और सही से लिखो।” नेहा बोली।
इस तरह नेहा जब तक गाँव में रहती सारे बच्चों की शिक्षिका बन जाती थी।
गाँव में बच्चे और बड़े सब उसे बहुत ही प्यार करते थे। बगल वाली आजी के घर में तो वह दिन- दिन भर बिता देती थी । वह आजी रोज ही मट्ठा बनाती थीं उनके यहाँ उसे तला हुआ चना तथा खूब गाढा-सा मट्ठा पीने को मिल जाता था । तब किसी के भी घर जाने पर मन भरकर दही मट्ठा खाने के लिये मिल जाता था । दादी हमेशा आवाज़ लगातीं
“अरी नेहा, आजा मट्ठा बन गया ।”
शायद उन्हे लगता होगा कि गाँव की चीजें शहर में कहाँ मिलेंगी इसलिये भी वे नेहा को घर में बुलाकर खिलाती रही होंगी। नेहा भी पड़ोस वाली आजी की आवाज सुनते ही,
“आई आजी ” कहते हुए वह उनके पास दौड़ लगा देती, इस समय उसे और कुछ भी सुनाई नहीं देता था।
नेहा वैसे भी पड़ोस वाली या सरपंचाइन आजी को कुछ ज्यादा ही प्रिय थी । यही नहीं बुआ लोग भी उसे बहुत प्यार करतीं थीं। शायद गाँव बहुत कम आती थी इसलिये भी वे लोग प्यार करती हों।
उनके घर के सामने ही नेहा की एक अपनी आम की बगिया भी थी । कभी वह आम के बगिया में चली जाती। वहाँ कभी जामुन तो की नीची डाली पर झूला झूलती, कभी कोई गिरा हुआ आम देख कर उसे उठाने के लिए दौड़ पड़ती थी। हाँ इतना कई बार होता था की दौड़ में वह हार जाती थी और इस दौड़ में आम किसी दूसरे बच्चे को मिल जाता था। कभी आंँधी आने पर बच्चे आम बीनने दौड़ते और आम बीनते तो वहाँ भी वह हमेशा ही पीछे रह जाती थी ।
वह कभी-कभी चिढ़ जाती कि वह क्यों नही
उन लोगों के बराबर दौड़़ पाती है । रमेश ,मटरु
उमेश, मुन्नी और सीमा सभी दौड़- दौड़़ के आम उठा लेते और वह हमेशा ही पीछे रह जाया करती थी। उसे अपने ऊपर बहुत गुस्सा आता था, कभी- -कभी तो गुस्से में वह रो भी पड़ती थी । पर जीवन में रोने से कभी भी जीत हासिल नहीं होती। जीतने के लिए सार्थक कर्म आवश्यक ही है । नेहा शरीर से बेशक कमजोर थी पर मन से नहीं । वह किसी भी काम में प्रयास तो जरूर करती थी फिर चाहे जीत मिले या हार उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था ।
गाँव में आंँधी आने पर बच्चे बाग में भाग लेते थे।कोई थैला लेकर कोई बोरी ही लेकर बगिया में
भाग लेते थे। नेहा के गाँव से कुछ दूरी पर आम की एक बहुत बड़ी बगिया थी। उसमें कई तरह के आम के पेड़ थे । उनके नाम भी उतने ही तरह के थे।कोई लंगड़ा आम ,कोई गोला आम, कोई दशहरी आम आदि-आदि । कोई-कोई आम तो इतना बड़ा होता था कि एक ही आम से पेट भर जाता था।कोई खट्टा आम होता उसे लोग कच्चे में ही तोड़़कर अचार बना लेते थे । तब आम के बगीचों की रखवाली जरूर होती थी लेकिन बच्चों से नहीं । बच्चे पूरी तरह आजाद होते थे। कहीं भी और किसी की भी बगिया का आम, अमरूद खाने के लिये उन पर कोई पाबन्दी नहीं थी ।
गाँव में ही एक तिलंगाइन नाम से प्रसिद्ध दादी भी थीं । उनके घर के सामने अमरूद का एक पेड़़ था । वह अमरूद का पेड़़ काफी नीचा था उस पर छोटे बच्चे बड़े आराम से चढ़ जाया करते थे लेकिन वह दादी किसी बच्चे को भी अमरुद नहीं तोड़ने देती थीं । बच्चों को देखते ही वे डंडा लेकर दौड़ा लेती थीं और हाँ साथ ही साथ वे गालियां भी देती थीं । “रुक जा फलाने की बिटिया, अबहीं बताइत हैं ।” यानी रुक जाओ अमुक व्यक्ति की बेटी,अभी बताते हैं और सब बच्चे वहाँ से भाग जाते थे ।उनके पास हमेशा एक छड़ी रहती थी, वे उसी को लेकर बच्चों को दौड़ा लेतीं और बच्चे उन्हें दूर से ही देखकर भाग लिया करते थे । वे गाली भी खूब देतीं थीं पर दोनों ही पक्ष हार मानने को कभी राजी नहीं हुए । ना दादी कभी बच्चोंको गाली देकर हारतीं, ना बच्चे अमरूद तोड़ने से बाज आते। वे जानबूझकर उन्हीं के अमरूद के पेड़ से अमरुद तोड़ते थे। सच में तो उन्होंने कभी भी, किसी भी बच्चे को नहीं मारा था। बच्चों के निडर होने का कारण शायद यह भी था ।
“बड़की बगिया में चलबू।” सीमा ने नेहा से
कहा तो वह बहुत ही खुश हुई ।
“हाँ,हाँ मैं भी चलूँगी ।”
“ठीक बा, तैयार रहू, अबकी आँधी आये तौ फिर
चला जाये ।” यानी तैयार रहना अबकी आँधी
आयेगी तो चला जायेगा ।
नेहा छोटे बाग तक तो गई थी पर बड़े बाग तक वह कभी नहीं गई थी। अबकी बार उसने मन बना लिया था कि वह भी आंँधी आने पर बड़की बगिया तक जायेगी और वह भी ढेर सारा आम बीन कर के लायेगी और माँ जो हमेशा दूसरे बच्चों की तारीफ किया करती हैं, उन्हें दिखा देगी कि वह भी
उनकी तरह तेज है। वह भी बाकी बच्चों से कम नहीं है।नेहा ने पहले से ही बड़ा-सा थैला रख छोड़ा था कि अबकी बार वह बड़ा-सा थैला लेकर जायेगी और उस थैले में भरकर ढेर सारा आम ले आयेगी।उसे बड़ी ही बेसब्री से आँधी आने और बड़े बाग में जाने का इन्तजार था ।
एक दिन आकाश में काले-काले बादल छाने लगे। लोगों ने कहा बहुत तेज आँधी आ रही है। बस
बच्चों की फौज तैयार हो गई। सब अपने-अपने झोले के साथ ऐसे लग रहे थे मानों कोई फौज युद्ध पर जा रही हो हो।नेहा को माँ ने रोका भी –
“तुम कहाँ उन लोगों के साथ जा रही हो,वे सब बड़की बगिया में जा रहे हैं।”
परन्तु नेहा नहीं मानी वह भी उन लोगों के साथ-साथ यह कहकर दौड़ पड़ी,
“बस अभी आ रही हूँ,माँ ।”
सारे बच्चे तेजी से बड़ी बगिया की ओर जा रहे थे। कुछ दूर तक तो नेहा उनके साथ बनी रही
और फिर पिछड़ गई।अब वह बाकी बच्चों से बहुत
ही पीछे थी। सारे बच्चे बगिया में पहुँच गये और
वह उनसे काफी पीछे पहुँची। वहाँ तक पहुँचते-
-पहुँचते उसकी साँस फूलने लगी थी । इतने में ही
आँधी आ गई, सभी बच्चे दौड़-दौड़ कर आम बीनने
लगे लेकिन नेहा जिधर भी जाती कोई दूसरा बच्चा लपक कर आम उठा लेता।हारकर वह उदास होकर एक पेड़ के नीचे चुपचाप खड़ी हो गई। उसे एक भी आम नहीं मिल पाया था । बाकी बच्चे अपने बीने हुए आम देखकर खुश हो रहे थे ।
अचानक ही एक व्यक्ति आया, उसने नेहा के
हाथ से थैला ले लिया और उसे एक आश्वासन-सा देते हुए बोला, “तुम यहीं ठहरो मैं आता हूंँ।”
और कुछ ही देर में ही वह थैला भरकर आम लेकर आया और नेहा को थमा दिया,
“बिटिया तुम इतना ही उठा पाओगी नहीं तो मैं और भी आम दे देता। “
नेहा कभी थैले में भरे हुए आम को देखती तो कभी उस व्यक्ति को । फिर वह आम का थैला लेकर धीरे-धीरे अपने घर की ओर चल दी।उससे उतना आम भी नहीं उठाया जा रहा था ।
अब सीमा ,मुन्नी उसकी मदद को आगे आईं
“लावा हम पहुँचाय देई ।” यानी लाओ हम इसे घर
तक पहुँचा दें। पर नेहा ने मदद लेने से साफ मना कर दिया,
“नहीं हम ले जा लेंगे ।”
किसी तरह वह आम का थैला लेकर धीरे-धीरे
चलकर अपने घर आ गई। रास्ते में दूसरे बच्चे अगर मदद की कोशिश भी करते तो वह उनको मना कर देती थी । उसको यह डर लग रहा था कि कोई बच्चा उसका आम ले न ले ले । खैर वह धीरे-धीरे
वह घर पहुँच गई । उसके हाथ में इतना आम देख कर सबसे अधिक हैरानी उसकी माँ को हुई ,उन्होंने पूछा,
“तुमको इतने आम किसने दिए हैं ?
“पता नहीं, कोई चाचा जी थे।”
नेहा क्या बताती? उसे तो वहांँ के किसी के भी बारे में कुछ भी पता नहीं था। वह तो कभी-कभी ही गांँव आती थी । उसने सारी बात माँ को ज्यों का त्यों बता डाला और माँ आम का थैला लिए हुए अन्दाजा ही लगाती रहीं कि वह व्यक्ति कौन हो सकता है जिसने उनके बच्चे को थैला भरकर आम दे दिया ।
नेहा बचपन के बाद कभी भी गांँव नहीं गई या अवसर नहीं मिल पाया लेकिन उसके मन में आज भी उस आम के थैले की याद ज्यों की त्यों बनी हुई है।
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डॉ.सरला सिंह ‘स्निग्धा’
दिल्ली।
