पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

मंदिरों और स्कूलों में आया धन जनता का धन होता है। यह भगवान और माँ सरस्वती के नाम पर श्रद्धाभाव से अर्पित किया जाता है, हलांकि ईश्वर तो बस श्रद्धाभाव से पत्रं पुष्पं फलं तोयं के ही आकांक्षी हैं लेकिन विद्या का मंदिर कही कही तो यह अभिवाहकों से जबरिया वसूला जाता है फिर भी लोग दे देते है । किसी भी स्कूल अथवा मंदिर को मिलने वाले धन की सतत आवश्यकता होती है जिससे प्रबंधगत आवश्यकतायें पूरी हो सकें जिसमें स्टाफ का वेतन, स्वच्छता, निर्माणादि कार्य सम्मिलित होते हैं। मगर इस धन के व्यय को लेकर पूरी पारदर्शिता होनी चाहिये। बल्कि इस बाबत प्रतिमास एक स्टेटमेंट सार्वजनिक होना चाहिए। कितना आया कितना खर्च हुआ और कितना बचा और कहां जमा हुआ। स्कूल में कर्मचारी मेहनत और मंदिर में भक्तगण दानार्पण को ‘नेकी कर दरिया में डाल’ की तरह भूल जाते हैं। मगर इस दानवीरता का अनुचित लाभ कुछ लालची लोग उठा रहे। जो समाज में सफेदपोश की भूमिका में है। उनके चेहरे से पर्दा उठना चाहिए और अगर पर्दा भी न उठाया जाय तो यह कड़ाई के साथ सुनिश्चित करना चाहिये की धन ऐसे हाथों में जाए ही ना । और यदि सरकारों को लगे कि इसमे हस्तक्षेप करना अपरिहार्य हो गया है तो ऐसा करने में कोई हिचक भी नहीं होनी चाहिए।जिस आंदोलन में लाखों लोगों ने अपनी आस्था, संघर्ष और बलिदान लगाया, आज उसी राम मंदिर में चोरी का खुलासा हुआ जो राम के नाम पर उठ रहे सवाल से लोगों को बेचैन कर गया। कथित दान पात्र चोरी के मामले पर एक ईमानदार दानकर्ता का दर्द और गुस्सा खुलकर सामने आया। उनकी जुबान से निकले शब्द बता रहे हैं कि मामला केवल पैसों का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का है। उधर शिक्षा के मंदिर में भी बैठे पदासीन लूटेरे भाई साहब, भाई साहब कर के आपकी जेब काट लेंगे। और जब आप शोर करेंगे तो ये सॉफ्ट कार्नर वही अबला का विलाप वाले मेंढरे लोग , इन्होंने लूटा है.. समाज को। चोरी पर प्रतिक्रिया दे रहा एक कारसेवक, जिसने राम मंदिर आंदोलन को करीब से जिया हो, इस तरह अपनी पीड़ा व्यक्त करे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आख़िर दान में दिए गए करोड़ों रुपये का हिसाब कौन देगा ? आस्था के नाम पर जुटाए गए धन की पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाई जा रही ? मंदिरों से चढ़ावे की चोरी का मामला कोई नया नहीं है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में अपने दो दशक पहले ही इक्ज़िक्यूटिव मजिस्ट्रेट कार्यकाल के दौरान ऐसा मामला उठा था । नगदी तो छोड़िये सोने चांदी के आभूषणों तक की चोरी के आरोप सामने आये। सूत्रों के अनुसार तब एक वैलूअर नियुक्त था जो आंखे बचाकर हर रोज एकाध आभूषण पार कर देता था। मंदिर के कार्यपालक अधिकारी ने आखिरकार यह आदेश दिया कि हुंडियों /दानपात्रों और अर्घे से मिले दान, चढ़ावे और आभूषणों की गणना तत्समय ड्यूटी पर उपस्थित मजिस्ट्रेट के सामने कराई जाय। आप सोचिये क्या राम के नाम पर सवाल पूछना गलत है, या फिर जवाब मांगना हर श्रद्धालु का अधिकार है ? राम मंदिर करोड़ों लोगों की श्रद्धा का प्रतीक है। इसलिए यदि कोई आरोप लगते हैं, तो उनकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए, ताकि सच सामने आए और जनता का विश्वास बना रहे। जय श्री राम का नारा लगाने वालों को भी यह जानने का अधिकार है कि राम के नाम पर आने वाला हर एक रुपया कहाँ और कैसे खर्च हो रहा है। राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी के आरोपों के बाद एक कर्मचारी के घर से नगद दस लाख की बरामदगी और एक दूसरे कर्मचारी द्वारा आलीशान मकान निर्माण और डेढ़ करोड़ की जमीन खरीदने के मामले से साबित हो गया है कि वहां सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। अब राम मंदिर ट्रस्ट भी अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकता। यह दुनिया- देश के कोने-कोने से आ रहे करोड़ों हिन्दू भक्तों की आस्था और विश्वास से छल करने का एक अत्यन्त घृणित वाकया है। साथ ही दक्षिण भारतीयों के मन में उत्तरप्रदेश /अयोध्या को अनायास ही कलंकित करने की भी वजह है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इस दुष्कर्म का भंडाफोड़ किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने उचित ही एसआईटी का गठन कर इस मामले में गंभीरता का परिचय दिया है।
