Latest Updates

बुजुर्ग की झोली में खुशियां भर दीजिए

बुजुर्ग की झोली में खुशियां भर दीजिए बुजुर्ग की यादाश्त कमजोर हो जाती है, बेचारे से  अक्सर  गलतियां हो जाती हैं. बेवजह  उन्हें  उलहना  सुनना पड़ता है, जिल्लत की जिंदगी  ढोनी पड़ जाती है. दिल की बात कहें  तो वे  किससे  कहें? कोई भी हमदर्द उनकेआसपास नहीं है इसलिएअकेले में वे चुपके से रो लेते…

Read More

साँस हर दिल की थमी-थमी है सहमा-सहमा सा हर आदमी है

कविता मल्होत्रा (स्थायी स्तंभकार-उत्कर्ष मेल, कवियित्री एवं समाजसेवी) आज से तीन महीने पहले कब किसी ने सोचा था कि सरपट भागती जीवन की रफ़्तार अचानक यूँ थम जाएगी कि अगले पल साँस लेने से पहले भी सोचना पड़ेगा और साँस छोड़ने की दशा भी अकल्पनीय हो जाएगी। सच है! परिवर्तन ही संसार का शाश्वत नियम…

Read More

वक्त दो वक्त जियो खुद के लिए

रचयिता  विशिष्टाचार्य डॉ.सर्वेश कुमार मिश्र काशीकुंज जमुनीपुर प्रयागराज वक्त दो वक्त जियो खुद के लिए उम्र बहुत है गुजार दी दूजों के लिए दूजे दूजे ही होते हैं अपने भी सपने से होते हैं निन्यानवे काम करो उनका बस कोई एक ना करो काम उनका फिर तुम सा कोई जाहिल नहीं फिर तुम सा कोई…

Read More

“चलो तस्वीरें बनाए”

पारमिता षडगीं जिंदगी जिंदगी को बुला रही थी मेरे भीतर के खालीपन में रात भी थोड़ी थोड़ी मेरी नींद को चुराने लगी थी तुम्हारे भीतर व्याप्त रहने की इच्छा जो अनदेखी थी जो अनसुनी थी मेरे अकेलेपन के आतुर स्वर आकाश को खंड खंड कर पिघलने लगे थे आत्मा की उपत्यका में एक नदी बहने…

Read More

स्वछंद लेखन

हम तो ऐसा ही लिखते हैं दलील ये अच्छे दिखते हैं मौलिकता का हो विश्वास नयी शैली का शिलान्यास खींच कर एक नई लकीर लिख डाले वो नई तहरीर तय नियम में ला  बदलाव दूर ही हो बोझिल ठहराव हो सहज ग्राह्य तथा सरल मधु सा मीठा, ना हो गरल नव विधा ही हो अतिप्रिय…

Read More

जब इलाज भी बाज़ार बन जाए: भारत में स्वास्थ्य अधिकार की लड़ाई

भारत में बढ़ती निजीकरण प्रवृत्ति और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय की कमी: क्या ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ सच में न्यायालयों में लागू किया जा सकता है? जब उपचार एक सेवा नहीं, बल्कि बाज़ार की वस्तु बन जाए, तब अधिकारों की भाषा कमजोर पड़ जाती है। – डॉ सत्यवान सौरभ भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा और ढांचा…

Read More

जन भागिदारी के बिना पर्यावरण संरक्षण असंभव  है

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष (5 जून,) जन भागिदारी के बिना पर्यावरण संरक्षण असंभव  है लाल बिहारी लाल नई दिल्ली । जब इस श्रृष्टि का  निर्माण हुआ तो इसे संचालित करने के लिए जीवों एवं निर्जीवों का एक सामंजस्य  स्थापित करने के लिए जीवों एवं निर्जीवों के बीच एक परस्पर संबंध का रुप प्रकृति ने…

Read More

मुर्दों का मोहल्ला

हो गया हल्ला जब मिला मुर्दों का मोहल्ला खुले आसमान में गंगा की गोद में सोये हुए प्राणहीन आप के सगे संबंधी।  कौन है? जिम्मेवार! जिन्हें छोड़ कर बालू की रेत में चले जा रहे अपना कर्म पूर्ण कर। बनाकर विविध पंथ, धर्म, पाखण्ड में पड़कर! अपनों को ही चील , कौओं के हवाले कर…

Read More

सावन में

मिला सानिध्य शिव जी का हमें उपहार सावन में   चले हैं आज मिल सारे लिए मनुहार सावन में।।   सुनो जी आज बम लहरी रही है गूंँज धरती पर।   चली कांँवड़ लिए टोली करे जयकार सावन में।।   बहुत भोले हमारे शिव यही कहते सभी ज्ञानी।   चला जो पास है जाता करें…

Read More

लघुकथा – कर्मठ : डोली शाह 

बचपन  में ही राहुल को मां  छोडकर इस दुनिया से चली गयी तो  पिता ने घर के साथ  खेती-बाड़ी का काम  संभाल कर मा की कमी को पूरा करते हुए उसकी  परवरिश की । राहुल भी जब कुछ बडा हुआ तो वह भी पिता के हर कार्यों में हाथ बंटाता साथ मे पढने के लिए …

Read More