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मोबाइल की चमक मृगतृष्णा है —-राजेन्द्र परदेसी

शहर का युवा आज सबसे ज्यादा व्यस्त दिखता है और सबसे ज्यादा खाली भी वही है। उसके हाथ में हमेशा मोबाइल है। उसकी आँखें हमेशा स्क्रीन पर हैं। उसे हर पाँच मिनट में देखना है कि उसकी पोस्ट पर कितने लाइक आए, कितने कमेंट आए, किसने क्या कहा। यही बेचैनी आज शहर के युवा की सबसे बड़ी पहचान बन गई है।

पहले युवा की बेचैनी कुछ और होती थी। उसे नौकरी की बेचैनी होती थी, कुछ बनने की बेचैनी होती थी, हुनर सीखने की बेचैनी होती थी। उस बेचैनी में एक करेज था, एक आग थी। वह गिरता था, उठता था, सीखता था। आज की बेचैनी दूसरी है। आज उसे लाइक की बेचैनी है। वह काम करने से पहले सोचता है – इसमें लाइक मिलेगा क्या? फोटो ऐसी लूँ कि लाइक ज्यादा आए। बात ऐसी कहूँ कि वायरल हो जाए।

तो सवाल ये है कि इस लाइक की बेचैनी से उसके विकास में क्या योगदान हो रहा है?

पहली बात, इससे उसका साहस खत्म हो रहा है। असली साहस वो होता है जो बिना किसी की ताली के भी अपना काम करे। किसान बिना लाइक के खेत जोतता है, जवान बिना लाइक के सीमा पर खड़ा है। पर लाइक का भूखा युवा वही काम करता है जहाँ ताली बजे। जहाँ लाइक नहीं, वहाँ वह कदम ही नहीं रखता। धीरे-धीरे वह भीड़ का गुलाम बन जाता है। भीड़ जो पसंद करे, वही वह करता है। अपना दिमाग, अपना रास्ता – सब बंद।

दूसरी बात, इससे उसका विकास रुक रहा है। विकास के लिए एकांत चाहिए, अभ्यास चाहिए, धीरज चाहिए। एक चित्रकार को महीनों एक चित्र पर काम करना पड़ता है, एक खिलाड़ी को सालों पसीना बहाना पड़ता है। पर लाइक की दुनिया में सबको तुरंत चाहिए। आज पोस्ट किया, आज ही हजार लाइक चाहिए। इस तुरंत की आदत ने उसे मेहनत से दूर कर दिया है। उसे लगता है मोबाइल पर फेमस होना ही विकास है। पर ये विकास नहीं, भ्रम है। फॉलोवर बढ़ रहे हैं, पर ज्ञान नहीं बढ़ रहा। लाइक बढ़ रहे हैं, पर हुनर नहीं बढ़ रहा।

तीसरी बात, ये बेचैनी उसके मन को बीमार कर रही है। सुबह उठते ही वह दूसरों से अपनी तुलना करता है। उसके दोस्त को ज्यादा लाइक मिले तो जलन। उसे कम मिले तो उदासी। पूरा दिन उसका मूड लाइक की गिनती पर टिका है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इससे चिंता और अवसाद बहुत बढ़ रहा है। वह हजार लोगों से जुड़ा है, पर अकेला है। मुश्किल घड़ी में कमेंट करने वाले हजार हैं, पर घर आकर पूछने वाला कोई नहीं।

तो क्या लाइक का कोई योगदान ही नहीं? थोड़ा है। अगर लाइक को मृगतृष्णा न बनाकर औजार बनाया जाए। अगर युवा अपनी कला, अपनी बात, अपने अच्छे काम को लोगों तक पहुँचाने के लिए इसका उपयोग करे, तो ठीक है। पर जब लाइक ही लक्ष्य बन जाए, तो सब खत्म।

अंत में बात वही है – लाइक से जीवन की कोई समस्या हल नहीं होती। लाइक से न रोटी आती है, न हुनर आता है, न सच्चा साथी मिलता है। शहर के युवा को ये समझना होगा कि मोबाइल की चमक मृगतृष्णा है। असली उजाला तो मेहनत, धीरज और अपने काम में है। जब तक वो लाइक के लिए नहीं, अपने लिए जीना नहीं सीखेगा, उसका विकास अधूरा ही रहेगा।

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