अध्यक्ष मल्लाकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी जी को लेकर बिहार के पटना मेे जो टिप्पणी की वह बदलती राजनीति की ही तस्वीर है । ऐसा नहीं है कि किसी भी राजनीतिक दल के नेता ने पहली बार ऐसी भाषा का प्रयोग किया हो । राजनीतिक दल कोई भी हो और नेता कितना ही बड़ा क्यों ने हो वह अभद्र टिप्पणी करने में महारत हासिल कर चुका है । राजनीति का वह दौर जब वैचारिक राजनीति मेें वैचारिक मतभेद हुआ करते थे । वैचारिक मतभेद ही नइए राजनीतिक दलों के गठन का कारण भी होते थे । भारत की राजनीति कभी दो-तीन दलों से शुरू हुई थी पर जैसे-जैसे लोकतंत्र आगे बढ़ा राजनीतिक दलों की संख्या भी बढ़ती चली गई, सभी के अपने-अपने सिद्धांत थे और सभी की अपनी-अपनी विचारधारा । अलग-अल्र विचारधारा के बावजूद भी आपसी संबंध बेहतर होते थे और भाषा मेें संयम होता था । नेहरू जी से लेकर अटलबिहारी बाजपूई तक वैचारिक प्रतिद्वन्दता आपसी संबंधों मेें कभी आड़े नहीं आई और विचारों के मतभेद के बावजूद भी आपसी संबंध मजबूत होते रहे जो भारत के विकास मेें महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते रहे । यह ही भारत के लोकतंत्र के मजबूती का अधार भ रहा जिसे सारे विष्व मेें सम्मान के साथ देखा जाता रहा है । पर 21 वीं सदी का वह दौर आ गया जब मतभेद, मनभेदों मेें बदलते चले गए और दूसरी पार्टी के नेता दुष्मन की भूमिका मेें आ गए । जब बड़े नेता अपनी ऐसी भूमिका बनाते हैं तो कार्यकर्ता और बढ़चढ़ कर भागीदार बन जाते हैं । चुनाव के दौरान अक्सर ऐसी भाषा का उपयोग होने लगा और अब गाहे-बेगाहे अभद्र भाष भाषण देते नेताजी को तालियां बजवाने का काम करने लगी । राजनीतिक दल कोई भी हों और नेता भी कोइ्र भी हो ज्यादातर बार अभद्र भाषा को प्रयोग से कोई परहेज नहीं करता । चुनाव के दौरान तो यह और भी बढ़ जाती है । अप्त्याक्षरी जैसी मुहिम छिड़ जाती है । एक मंच से कोई कुछ बोलता है तो दूसरे मंच से कोई कुछ । चुनाव मेें लोग विकास की बातें सुनना चाहते हैं, चुनाव मेें मतदाता अपने लिए भविष्य की योजनाओं के ारे में जानना चाहते हैं, पर ज्यादातर बार नेताओं को इससे कोई मतलब नहीं दिखता । विकास की बातें गुम हो चुकी हें और भविष्य की योजनाओं में लालीपाप प्रयोग में आने लगा है । सामूहिक विकास से परे व्यक्तिगत लाभ के बिन्दु इसमेें शमिल होते चले गए । कौन सी पार्टी किसे कितना लाभ देगी इस बात पर चिन्तन होने लगा है । महिलाओं को दिए जाने वाले मासिम पेसे भी इसी श्रेणी में आते हैं जिनसे विकास के कार्य अवरूद्ध होते दिख रहे हैं और मतदाता हर बार यह राषि कितनी बढ़ेगी इस पर विचार करने लगे हैं । सिद्धान्तों की राजनीति शायद अब नहीं हो रही अब केवल मतदाताओं को रिझाने के प्रयत्न हो रहे हैं । जाहिर है कि इसने लोकतंत्र की गरिमा को कम तो किया ही है साथ ही भविष्य के परिदृष्य को कुरूप् भी किया है । अभद्र भाषा अक्सर झल्लाहट का परिणाम होती है । आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा टांग खींचकर की जाने लगी है जो लोकतंत्र की सबसे खराब छवि का कारक बन रही है । मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ ही साथ वरिष्ठ नेता भी हैं तो उनसे यह उम्मी द की जा सकती है कि वे अपने दौर की सम्तानजनक भाषा का प्रयोग करें पर इसके लिए यह भी तो आवष्यक है कि दूसरे बड़े नेता और बड़े पदों पर बैठे नेता भी राजनीति मेें शालीनता का परिचय दें । उसने कहा था तो मेंने भी कहा सह आपसी लड़ाई मेें तो चल जाता है पर जहां सैद्धांतिक लड़ाई का राग अलापा जाता है वहां इसे केसे स्वीकार किया जा सकता है । खरगे पहले व्यक्ति नहीं हें और कंग्रेस पहला राजनीतिक दल नहीं है जिसके नेता अभद्र भाषा का प्रयोग करते दिख रहे हैं, सत्तारूढ़ दल के कई नेता भी कई बार ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल कर चुके हें । एक सांसद जी ने तो संसद में ही एक दूारे दल के सांसद के प्रति अीाद्र भाषा का प्रयोग किया था । बहुत सारे डायलाग चर्चाओं में आ चुके हैं जिनमें बड़े-बड़े नेता अभद्र भाषा का प्रयोग करते दिख रहे हैं । लोकतंत्र के लिए यह सुखद तो नहीं माना जा सकता । कांग्रेस मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेष कुमार को लेकर आन्दोलन कर रही है । हांलाकि यी आन्दोलन जिस तेजी से आगे बढ़ा था अब उसमेें उतनी गति दिखाइ्र नहीं दे रही है । दो अक्टूबर से कांग्रेस ने ज्ञानेष कुमार के खिलाफ मोर्चा खोला था और लगभग प्रत्येक दिन धरना-प्रदर्षन कर यह जताने का प्रयास किया था कि वह ज्ञानेष कुमार के स्तीफे तक रूकने वाले नहीं है। पर वे अपनी गति को बनाए नहीं रख सके ं। संभवतः राहुल गांधी के विदेष जाने से भी आन्दोलन की गति को विराम मिला । वेसे तो कांग्रेस और इंडिया गठबंधन आगामी 1 नवम्बर को बड़ा आन्दोलन करने जा रहे हैं । इस आन्दोलन मेें कितने लोग जुटेगें यह आगे की रणनीति को तय करेगा । इंडिया गठबंधन में दल कम हो गए हेैं । आप पार्टी अलग हो चुकी हे वहीं डीएमके भी अलग हो चुका है । वामपंथी दल जरूर अभी भी इस गठबंधन का हिस्सा बना हुआ है । आप पार्टी ने भी अपने स्तर पर गठबंधन से दूरी बनाते हुए आन्दोलन किया पर वो सफल नहीं हो सका । सामूहिकता की बात अलग होती है बाकी तो केवल हल्ला मचाने जेसा ही होता है । कॉकरोच जनता पार्टी ने जब आन्दोलन करने की घोषणा की तो आन्दोलन को मजबूती मिलती दिखाई । भले ही कॉकरोच जनता पार्टी किसी राजनीतिक दल को सपोर्ट नहीं कर रहा हो, पर वो जो करता है उससे विपक्ष को मजबूती मिलती ही है । कॉकरोच जनता पार्टी ने जिस ढंग से जुलाई में जंतर-मंतर पर तात्कालीन षिक्षा मंत्री के खिलाफ आन्दोलन किया था और धमेन्द्र प्रधान का स्तीफा भी ले लिया था उससे न केवल उनके होंसले बुलंद हुए थे बल्कि सभी को उनकी ठोस उपस्थिति का अहसास भी हुआ था । मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कॉकरोच जनाता पार्टी के आन्दोलन की घोषणा ने सरकार को सहमा तो दिया था, वहीं विपक्ष को भी आषांवित कर दिया था कि वे ज्ञानेष कुमार का स्तीफा लेकर ही रहेगें । पर कॉकरोच जनता पार्टी का आन्दोलन विफल हो गया । सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर ऐसा षिकंजा कसा कि वे धरना स्थल तो छोड़ो वे तो दिल्ली भी नहीं पहुच पाए, जो थोड़ंे-बहुत लोग पहुंचे भी उनको अरेस्ट कर लिया गया । कॉरोच जनता पार्टी के बड़े नेताओं पर भी षिकंजा कसा औ उन्हें भी जेल मेें डाल दिया गया । कुल मिलाकर कॉकरोच जनता पार्टी का आन्दोलन पूरी तरह फेल हो गया । इससे विपक्ष को सबसे ज्यादा निराषा हाथ लगी, उसे उम्मीद थी कि जैसे षिक्षा मंत्री के खिलाफ आन्दोलन मेें वे सफल हुए थे, वैसे ही इस बार के आन्दोलन मेें भी वे सफल हो जायेगंें और इसका लाभ उन्हें मिल जायेगा । कॉकरोच जनता पार्टी के फेल आन्दोलन के बाद सारा दबाव कांग्रेस और राहुल गांधी पर आ गया है, क्योंकिं इंडिया गठबंधन के आन्दोलन को वे ही लीड करते दिख रहे हैं । अब कांग्रेस के लिए करो या मरो क स्थिति बन चुकी है । यदि वे ज्ञानेष कुमार का स्तीफा नहीं ले पाते तो इा हताषा को झेल पाना उनके लिए कठिन हो जायेगा और ज्ञानेष कुमार स्तीफा देगें ऐसा लग नहीं रहा है । एक नव्म्बर के आन्दोलन के बाद औ साफ हो जायेगाा कि विपक्षी दलों का आन्दोलन अंतिम आंदोलन होगा या वे इतना दबाव बना पायेगें कि आज नहीं तो कल ज्ञानेष कुमार स्तीफा दे ही दें । त्यौहरों को देखते हुए कितनी भीड़ इसमेें जुटती है उसके आधार पर ही मूलंयकन होगा । वेसे तो दिल्ली के व्यापारियों ने भी राहुल गांधी से आन्दोलन न करने की अपील की है । उनका तर्क है कि आन्दोलन के चलते त्यौहारी सीजन मेें उनका बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा । हांलाकि फिलहाल कांग्रेस इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रही है । जाहिर है कि कांग्रेस हताषा और निराषा के झूले में झूल रही है । इन्हीं परिस्थितियों मेें कांग्रेस अध्यक्ष खरगे जी का संबोधन सामने आ गया जो उनकी झल्लाहट को ही दर्षाता हुआ लग रहा है । बात कोई भी हो और नेता कोई भी हो मर्यादा को बनाए रखना बहुत आवष्यक हेैं, ऐसी उम्मीद यदि वपक्षही दलों से की जाती है तो सत्तारूढ़ दलों से भी की जाती है । अभद्र भाषा के प्रयोग से वे भी अरोपित हैं, उनके बड़े-बड़े नेता भी शालीनता को त्याग विषैली टिप्पण्ी कर भी चुके हें और आगे भी करते रहेगें, रोक उन पर भी लगे । राजनीति अपनी जगह है पर लोकतंत्र का पवित्रीकरण अपनी जगह जिस पर पूरे विष्व की नजरें लगी होती हें । हमेें अपने लोकतंत्र की मर्यादाओं को बचाए रखना चाहिए ।
राजनीतिक सफरनामा – राजनीति में अभद्र भाषा का दौर
