देवेन्द्र के दोहे
देवेन्द्र कुमार पाठक अपने तीरथ धाम हैं,खेत और खलिहान। अनिल,अनल,जल,भूमि,नभ; हैं प्रत्यक्ष भगवान।। श्रम ही अपना धरम-व्रत,घोर तपस्या घाम। ओला-पाला,बारिशें,बाढ़ हमारे नाम।। इल्ली,गंधी, गेरुआ,कांसा, गाजर घास। आवारा गोवंश ने, किया फसल को नाश।। माघ-पूस की रात में जब चलता हिमवात। फसल सींचते खेत की,हाड़ा-गोड जुड़ात।। सरहद पर बेटा सजग,अन्न उगाते बाप। उनकी सेवा,त्याग का,कोई मोल…
