
कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
कॉकरोच जनता पार्टी का आन्दोलन समाप्त हो गया है और उनकी मांग मान ली गई है । पिछले बारह सालों मेे यह दूसरा अवसर था जब सरकार झुकी और उसने आन्दोलनकारियों की मांगों को माना । इसके पहले वह किसान आन्दोलन को समाप्त कराने के लिए भी झुकी थी और उसने ससंद में पारित हो चुके किसान बिलों को वापिस लिया था । तब किसान लम्बे समय से आन्दोलन कर रहे थे और अपनी मांग पर अडिग थे । एक मंत्री एम जे अकबर ने उनके उपर लेग आरोपों के बाद स्वंय ही स्तीफा दे दिया था । इस बार भी ऐसा ही हुआ । कॉकरोच जनता पार्टी का आन्दोलन हुआ और संसद घेराव से लेकर जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन भी हुआ, इसके पूर्व से ही सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठ चुके थे जिन्हें संसद सत्र के प्रारंभ के पूर्व ही अस्पताल मेें भर्ती करा दिया गया था । संसंद सत्र प्रारंभ हो चका था तो विपक्ष को भी सरकार को घेरने का मौका मिल गया । कांग्रेस ने इसे बखुबी इस्तेमाल किया, वहीं अखिलेश यादव और आप पार्टी ने भी प्रभाव जमाने की कोशिश की पर वे उतने सफल नहीं हो पाए जितने राहुल गांधी सफल हुए । कॉकरोच जनता पार्टी छात्रों का नहीं युवाओं का संगठन है और युवा भारत के भविष्य की नींव हैं । संभवतः केन्द्र सरकार ने यह ही सोचा होगा । यह तो सही है कि नीट पेपर लीक हो जाने के बाद से ही शिक्षा मंत्री के स्तीफे का दबाव बन रहा था । छात्र और युवा तब भी आन्दोलित हुए थे और विपक्ष ने तब से ही सरकार को घेरना प्रारंभ कर दिया था । नीट परीक्षा के पेपर लीक ने लाखों छात्रों के सामने अंधकार फैला दियए थे उनमेें से करीब 20 बच्चों ने आत्महत्या भी कर ली जिससे आक्रोश और बढ़ा । पेपर लीक होने मेें शिक्षा मंत्री की कोई भूमिका नहीं होती पर उनकी नैतिक जिम्मेदारी अवष्य होती है । पेपर लीक होने की यह कोई पहली घटना है भी नहीं पर आक्रोश पहलीबार सामने दिखाई दिया । हो सकता है कि लगातार हो रही ऐसी घटनाओं से युवाओं के मन मेें विद्रोह के भाव जन्म लेते रहे हों पर कोई मंच न मिलने से वह आक्रोश सामने नहीं आ पा रहा हो ? कॉकरोच जनता पार्टी ने उन्हें एक मंच दे दिया तो युवाओं और छात्रों का आक्रोश व्यक्त करने का माध्यम मिल गया । कॉकरोच जनता पार्टी का अस्तित्व भी यूं ही सामने आ गया और देखते ही देखते कॉकरोच जनता पार्टी युवाओं की पंसद की पार्टी बन गई और जब आन्दोलन हुआ तो समझ मेें आया कि आक्रोश केवल नीट परीक्षा के पेपर लीक होने तक नहीं आया था आका्रेश तो और भी बिन्दुओं पर व्यक्त किए जा रहे थे यह अलग बात है कि चूंकि पूरा धरना प्रदर्शन केवल नीट परीक्षा के पेपर लीक होने का और शिक्षा मंत्री के स्तीफे के मुद्दे पर था तो बात वहीं आकर ठहर गई, पर इस ठहरी हुई बात से सरकार को इतना तो समझ लेना ही चाहिए कि युवाओं के पास मुद्दे और भी हैं । आन्दोलन का आव्हान और युवाओं का उत्साह, तो जंतर मतर पर युवाओं की भीड़ इकट्ठी हो गई । हजारों युवा अपने आप ही वहां पहुंच गए और शिक्षा मंत्री के स्तीफे की मांग के साथ ही साथ अपना आक्रोश भी व्यक्त करते रहे । दअसल सरकार से चूक तब ही हो गई थी जब नीट परीक्षा के पेपर लीक होने के बाद न केवल युवा संगठनों ने बल्कि विपक्ष ने भी शिक्षा मंत्री के स्तीफे की बात कही और सरकार मौन रही । सरकार परीक्षा के सुधार पर अपने आपको फोकस किए रही । पेपर लीक करने वाले पकड़े गए और जूल मेें डाल दिए गए । फिर से परीक्षा हुई और उसमेें कोई विघ्न भी नहीं आया तो सरकार को लगा कि अब शिक्षा मंत्री का स्तीफा देना बेमानी है । सरकार परीक्षा मेेें सुधार और त्वरित कार्यवाही को र्प्याप्त मान रही थी पर युवा शिक्षा मंत्री के स्तीफे पर अड़ा था । यदि तब ही शिक्षा मंत्री स्तीफा दे देते तो बात यहां तक पहुंचती ही नहीं पर यहां सरकार से चूक हो गई और युवाओें को संगठित होने का अवसर मिल गया । इधर विपक्ष ने भी इस मुद्दे को जकड़ लिया । वे पेपर लीक होने के बाद से ही सरकार पर हमलावर हो चुके थे और जब युवाओं ने धरना-प्रदर्शन करना प्रारंभ कर दिया तो उन्होने ने भी इसे अपने मुख्य अंजडे मेें शामिल कर लिया । कांग्रेस ने और राहुल गांधी ने इसके सहारे वैतरणी पार कर लेने का साधन बना लिया । राहुल गांधी ने सबसे बेहतर ढंग से इस मुद्दे को उठाया वहीं समाजवादी पार्टी ने और आप पार्टी ने भी इस ज्वलंत मुद्दे मेें अपने भविष्य को देखा तो वे भी इसमेें कूद पड़े इससे कॉकरोच पार्टी को मजबूती भी मिली । जंतर-मंतर मेें हो रहे धरने के साथ ही साथ पूरे देश मेें धरना-प्रदर्शन चलने लगा । पटना, भोपाल, कलकत्ता, मंुबई, लखनउ जैसे महानगरों के अलावा छोटे-छोटे शहरों तक आन्दोलन फैल गया । यह तो सच है कि सरकार ने इस आन्दोलन को दबाने का पूरा प्रयास किया पर जब प्रयास सफल नहीं हो पाया और आन्दोलन विस्तारित होता चला गया तो सरकार को आन्दोलनकारियों से वार्ता करने के लिए झुकना पड़ा । वार्ता करने वाले मंत्री जानते थे कि आन्दोलन तब तक खत्म नहीं होगा जब तक शिक्षा मंत्री का स्तीफा नहीं हो जाता । यह स्थिति वार्ताकारों के लिए धर्मसंकट जैसी स्थिति थी । भाजपा अपने मंत्रियों का स्तीफा नहीं लेती इस बात की घोषणा खुद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कर चुके थे वो वीडियों बहुत वायरल भी हुआ ऐसे मेें धर्मेद्र प्रधान का स्तीफा कैसे लिया जाए यह चिन्तन का विषय केन्द्र सरकार को दुविधा मेें डाल रहा था । वे आन्दोलनकारियों को स्तीफा न हो इस बात पर राजी करने का असफल प्रयास करते रहे । अंततः केन्द्र सरकार को आन्दोलनकारियों की बातों को मान ही लेना पड़ा और धर्मेन्द्र प्रधान का स्तीफा हो गया, शेष मांगेतो ऐसी थी भी नहीं जिन्हें माना न जाए तो वो भी मान ली गई और इस तरह से इस पूरे घटनाक्रम का अंत हो गया । कॉकरोच पार्टी के आन्दोलन ने एक बात तो स्पष्ट कर दी है कि विभिन्न मुद्दों को लेकर युवाओं मेें आक्रोश है । आन्दोलन का जो स्वरूप् सामने आया वह भी हैरान करने वाला था । अलग-अलग युवाओं की टिप्पणियां चर्चा का विषय बनी रही । युवाओं पर लाटी चार्ज भी हुआ और आंसु गैस के गोले भी छोड़े गए जो स्थिति से निपटने के लिए जरूरी था भी, आन्दोलनकारी ससंद की ओर बढ़ रहे थे तो उनको तो रोका जाना ही था । लाठी चार्ज ने आन्दोलन को अलग दिशा दे दी । विपक्ष ने भी लाठी चार्ज के मुद्दे को हथियार बना लिया जबकि साफ है कि उनकी सरकार होती और आन्दोलनकारी संसद की ओर बढ़त तो वे भी उनको रोकने की कोशिश करते ही । दरअसल विपक्ष के सामने लोकसभा और राज्यसभा का सत्र था जिसे वे चलना नहीं देना चाहते थे । वैसे इस बार तो उनकी तैयारी सरकार को घेरन की दूसरे मुद्दों को लेकर थी, रामंदिर चंदा चोरी कांड, टीएमसी और शिवसेना के सांसदों का पाला बदलना जैसे मुददे उनकी झोली मेें थे वे इन मुद्दों क तैयारी कर रहे थे और यह नया मुद्दा उनके सामने आ गया हालांकि वे भी ससंद मेें पेपरलीक का मामला ठाने वाले थे पर जब युवओं का आन्दोलन हुआ तो उन्हेाने इस मुद्दे को युवाओं के माध्यम से ही प्रस्तुत किया । संसद के बाहर धरना प्रदर्शन किया और नारे लगाकर सरकार को घेरने का काम किया । कांग्रेस के और समाजवादी पार्टी के कई नेता जंतर मंतर पर जाकर आन्दोलनकारियों से मिले भी और अपना समर्थन दिया । राज्य स्तर पर भी इन पार्टियों की इकाईयों ने धरना-प्रदर्षन किया और हल्ला-गुल्ला किया । सरकार को दबाव मेें आना ही था तो वो आ भी गई । वैसे इसे न तो युवाओं की जीत के रूप् मेें देखा जाना चाहिए और न ही केन्द्र सरकार की हार के रूप् मेें । लोकतंत्र मेें कई बार ऐसा होता है जब अपने सिद्धांतों से परे जाकर निर्णय लिए जाते हैं । मंत्रियों के स्तीफे पहले भी कई बार हुए हैं तो ह कोई अनहोनी या आश्चर्यचकित करने वाली बात नहीं है । किसी भी र्निएाय को सरकार जिस दृष्टि से देखती है जरूरी नहीं है कि उस दृष्टि से ही सभी उसे देखें ऐसे मेें विरोध तो होता ही है । विपक्ष का काम विरोध करना है पर रचनात्मक विरोध किया जाए तो सभी को अच्छा भी लगे । ससंद नहीं चल पाती और सत्र यूं ही निकल जाता है । वैसे सरकार के प्रयास भी उतने ठोस नहीं होते । इस बार तो विपक्ष और कमजोर हुआ है । कुछ सांसद पाला बदलकर एनडीए के साथ आकर खड़े हो गए हैं पर इसके बावजूद भी विपक्ष अपने आपको मजबूती के साथ खड़ा कर पाने मेें सफल रहा है । भारत मेें गांधीवादी आन्दोलन एक विचार के रूप् मेें स्वीकार किया जाता रहा है । आजाद भारत मेें कई ऐसे आन्दोलन भी हुए हैं जो हिंसा रहित और गांधवीदी तरीके से हुए और सफल भी रहे । पर विगत कुछ वर्षों से स्थिति बदलती दिखाई देने लगी है आन्दोलन हिंसक रूप् ले लेते हैं और सरकार हिंसा को दबाने के लिए बल प्रयोग करती है । सोमनवांगचुक ने गांधीवादी तरीके से अनषन किया पर इसके लिए उन्हे 26 दिन भूख रहना पड़ा अस्पताल मेें भर्ती होना पड़ा । युवा शायद इतना र्धर्य नहीं रख पाते । युवाओं के इस आन्दोलन को मजबूती तो सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से ही मिली इस सच को झुठलाया नहीं जा सकता । कभी अन्ना हजारे के आन्दोलन भी ऐसे ही गांधवादी तरीके से हुए है और सफल भी हुए हैं । जंतरमंतर से लेकर पूरे देश में युवाओं के आन्दोलन भी अहिंसक ही हुए पर इसमेें जबरन घुस चुके शरारती तत्वों ने इसे उत्पात मेें तब्दील कर दिया । कई वीडियों सामने आए है जिनमें कुछ लोग पुलिस पर हमला करते दिख रहे हैं, यह पत्थर फेंकते दिखाई दे रहे हैं, बैरीकेट तोड़ते दिखाई दे रहे हें, वहीं ऐसे भी वीडियों सामने आए जिनमेें पुलिस के जवान आन्दोलनकारियों के उपर लाटी बरसाती या उनको घसीटते हुए दिखाई दे रही है । वैसे इस बार पुलिस के वर्दीधारी जवानों के साथ हेलमेट लगाए सिविल कपड़ों मेें भी कुछ लोग दिखाई, वे आन्दोलनकारियों पर लाठी भांजते भी दिखाई दिए,, वे कौन थे….. इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल किसी को नहीं मिला है जो शंकाएं भी पैदा कर रहा है और पुलिस की कार्यवाही को भी संदिग्ध बना रहा है । बहरहाल आन्दोलन के दौरान बोले गए अपशब्दों को लेकर भी आम जनता मेें आक्रोश रहा और अब जब आन्दोलन खत्म हो गया तो संभवतः ऐसे लोगों पर कार्यवाही भी की जा रही है । हमारी युवा पीढ़ी अब संस्कारित नहीं रही यह भी इस आन्दोलन ने हमेें जता दिया, कितने गलत शब्दों का प्रयोग लड़कियों से लेकर लड़कों तक ने किया वह हमारे समाज मेें कतई स्वीकार्य नहीं है । एक महिला तो आगे बढ़कर गांधजी तक को बुरा-भला बोल रही थी उसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है । यदि ऐसे वीडियो पर और वीडियों में बोलने वालों पर कार्यवाही होती है तो उसका समर्थन किया ही जाएगा भले ही कॉकरोच पार्टी के नेतओं को यह आश्वासन दिया गया हो कि आन्दोलनकारियों पर कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी, वैसे भी अभद्र भषा का प्रयोग करने वाले आन्दोलनकारी नहीं भड़काउ ही ज्यादा साबित हो रहे हैं । आन्दोलनकारियों पर लाठी चार्ज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी नाराजगी जाहिर की है पर इस बात पर भी विचार होना चाहिए कि जब आन्दोलकारी काबू से बाहर हो जाएं तो बल प्रयोग तो करना ही पड़ता है । सरकार को भी अब सम्हल कर चलने की आवश्यकता है, ऐसे मुद्दे जो सीधे जनता से जुड़े होते हैं या युवओं को आक्रोषित करते हैं उनको लेकर संवेदनशील होना पड़ेगा । सरकार ने ससंद मेें पेपरलीक अध्ाििनयम को और कड़ा बनाने के लिए बिल भी रखा और पास भी कराया । ऐसा नहीं है कि इसके पहले पपेरलकी को रोकने के लिए कोई कानून नहीं था पर इस कानून को और कड़ा बनाया गया है ताकि पपेरलीक करने वालों के दिलोदिमाग मेें भय बैठ जाए । सजा भी बढ़ाई गई और जुर्माना भी दोगुना कर दिया गया । उम्मीद की जा सकती है कि इससे पेपरलीक करने वालों के मन मेें भय बैठेगा । देश के विभिन्न राज्यों मेें भी पेपरलीक हुए हैं, यह बिल उन राज्य सरकारों को भी कार्यवाही करने का अवसर देगा । इस आन्दोलन के बाद उम्मीद की जा सकती है कि पपेरलीक की घटनाओं पर विराम लगेगा । हजारों छात्रों के भविष्य के साथ होने वाला खिलवाड़ बंद होगा । भारत मेें वैसे भी बेरोजगार युवाओं की संख्या मेें वृद्धी हो रही है, रोजगार के अभाव मेें युवा पीढ़ी डिप्रेशन सा महसूस करती है । बढ़ती महगाई और घटती आमदनी ने मध्यमवर्गीय परिवारों को परेशान कर रखा है । अब इस व्यवस्था को सुधारने का समय भी आ गया है ।
