
कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
भारत का चुनाव आयोग चर्चाओं मेें हैं, चुनाव आयोग से ज्यादा चर्चाओं में ज्ञानेश कुमार हैं जो मुख्य चुनाव अधिकारी हैं । जब से वे मुख्य चुनाव अधिकारी बने हैं तब से ही वे चर्चाओं मेें हैं । कुछ अधिकारियों की कार्यप्रणाली होती ही ऐसी है कि वे विवाद को जन्म देते रहते हैं । मुख्य चुनाव अधिकारी का इस तरह विवादों मेें आना भारत के लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है । पूरे विश्व में भारत के लोकतंत्र और यहासं की चुपाव प्रणाली के कसीदे पढ़े जाते रहे हैं । पर अब लगने लगा है कि विश्व पटल पर हम अपनी इस छवि को धूमिल करते जा रहे हैं । चुनाव आयोग देश पर,भारत के एक-एक नागरिक के भविष्य को तय करने वाली ससंद के प्रतिनिधियों के निष्पक्ष और ईमानदार निर्वाचन की जिम्मेदारी होती है । यूं भी भारत मेें चुनाव कराना इतना सरल कभी रहा ही नहीं, क्योंकि न केवल यहां की भौगोलिक परिस्थितियां, मौसमी परिस्थितियां और विशाल जनसमुदाय विश्व के अन्य देशों से बिल्कुल अलग है । संविधान में चुनाव आयोग को ढेर सारे अधिकार दिए भी गए हैं और कुछ वर्ष पूर्व मोदी सरकार ने भी उनके अधिकारों को बढ़ाया है, ऐसा इसलिए ताकि चुनाव आयोग निष्पक्ष रहकर काम कर सके । ढेर सारी पार्टियां और विभिन्न विचारधारा वाले नेता इनको कमांड करना चुनाव आयोग का काम । पर अब यही चुनाव आयोग चर्चाओं मेें आ चुका है । कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो कई वर्षों से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाते रहे हैं, पर जब से ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला है तब से राहुल गांधी ज्यादा मुखर हो गए हैं, ऐसा इसलिए भी की ज्ञानेश कुमार के कार्य करने का ढंग निश्पक्षता की परिभाषा को छूता दिखाई नहीं देता । बहुत सारे मनमाने निर्णय उनकी कार्यप्रणाली को संदिग्ध बनाते रहे हैं । एसआईआर भी उनमें से ऐसा ही निर्णय है जिसने जाने कितने मतदाताओं को मत देने से वंचित कर दिया है, जिनके नाम कटे वे सही कटे या गलत वह अलग विषय है, पर 13 करोड़ से उपर मतदाताओं के नाम कट जाना संदिग्ध तो बनाता है । बिहार विधानसभा चुनाव के ऐन पहले वहां एसआईआर हुआ और ढेर सारे वोटरों के नाम कट गए, फिर पष्चिम बंगाल मेें हुआ और लाखों वोटर नाम कट जाने से मतदान करने से वंचित रह गए । दिल्ली मेें एसआईआर की प्रकिया प्रारंभ हुई और लालकृष्ण आडवानी जैसे वरिष्ठ नेताओं को नोटिस मिला ? क्या ऐसा संभव है, एक स्वाभाविक प्रश्न आम मतदाताओं के मन मेें उठता ही है फिर उसे जब उन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता तो फिर राहुल गांधी द्वारा उठाए जा रहे सवालों मेें सच्चाई दिखाई देने लगती है । चुनाव आयोग के खिलाफ अविश्वास बनना लोकतंत्र की सबसे बड़ी पराजय है । सत्ताधारी भले ही चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर प्रश्न उठाने पर देष््रादा्रेही कह दें पर प्रश्नों के उत्तर तो खोजे जाने चाहिए । इस बार तो पूरा क्षमेला इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने खड़ा कर दिया । पत्रकार जब कोई रिपोर्ट छापता है तो वे किसी दल विशेष की खिलाफत करने के उद्देश्य से ऐसा नहीं करते बल्कि की जा रही गल्तियों को सामने लाने का काम करते हें । जिस रपिार्ट को अखबार ने छापा और जिन बिन्दुओं पर प्रश्न खड़े किए, उन प्रश्नों को विपक्षी दलों को तो अपने हिस्से में लेना ही था, क्योंकि वे विपक्षी दल हैं और सरकार को घेरना उनका काम है । पर इस बार प्रश्न चुनाव आयोग जैसी संस्था पर खड़े किए गए तो विवाद बढ़ गया । चुनाव आयोग तीन सदस्यी होता है ताकि कोई भी निर्णय कोई एक अकेला न ले सके, पहले तो केचल एक ही मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे, ठीएन शेषन सभी को आज भी याद है जिन्होने चुनाव आयोग को प्रदत्त शक्तियों को सही ढंग से परिभाषित कर उन पर अमल किया तो सारे दलों को पसीन निकल आया । पर प्रश्न उन पर कभी नहीं उठे आज भी लोग उनके द्वारा किए गए सुधारों को याद करते हैं । ज्ञानेश कुमार ने भी चुनाव आयोग को संविधान द्वारा प्रदत्ता अधिकारों का प्रयोग करने का काम किया पर उनका हर एक कार्य प्रश्नों के घेरे मेें आ गए । ऐसा आरोप है कि ज्ञानेश कुमार अपने दो अन्य साथियों को विश्वास मेें लिए बगैर निर्णय लेते रहे जिसमेें एसआईआर का निर्णय भी शामिल है जिसमें अभी तक 14 करोड़ मतदाताआंें के नाम काटे जाने की जानकारी सामने आ रही है । तीन चुनाव अधिकारी होने का मतलब है कि निर्णय बहुमत से हो मतलब कम से कम दो आयुक्तों को निर्णय के साथ रहना ही होगा, पर रिपोर्ट के अनुसार ऐसा हुआ ही नहीं । अब भले ही तीनों चुनाव आयुक्त मिलकर प्रेस वार्ता कर बता रहे हों कि ‘‘हम साथ-साथ हैं’’ पर अब तो बाजी हाथ से निकल ही चुकी है और विपक्ष के पास पहुंच चुकी है और विपक्ष भी राहुल गांधी जैसा जो पहले से ही मुखर होकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं । पश्चिम बंगाल मेें भी टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी भी चुनाव होने के पहले से ही और चुनाव हो जाने के बाद भी चुनाव आयोग को कठघरे मेें खड़ा करती रही हैं । चुनाव आयोग ने उनकी पार्टी को भी विभाजित कर दिया, चुनाव आयोग का यह निर्णय भी संदिग्ध माना जा सकता है, एक पार्टी से कुछ लोग अलग होकर दूसरी पार्टी बना लें तो उसको वास्तविक पार्टी का दर्जा कैसे दिया जा सकता है और मूल पार्टी से उसके अधिकार कैसे छीने जा सकते हैं , ऐसा ही महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे की पार्टी के साथ भी हुआ, अपनी मूल पार्टी से अलग होने वाले किसी सांसद या विधायक की सदस्यता गई नहीं बल्कि उन्हें नई पार्टी के रूप मेें मान्यता भी मिल गई ? प्रश्न तो उठने ही थे तो उठे । अब जब उन सभी पार्टियों को अखबार मेें छपी रिपोर्ट का सहारा मिल गया तो वे मुखर हो गए । केन्द्र मेें सत्तरूढ़ दल के नेता भले ही सफाई दे रहे हों पर परिस्थितियों को संदेह के वातावरण से निकाल पाना इतना आसान दिख भी नहीं रहा है । सोशल मीडिया ने प्रचार और प्रसार को सरल बना दिया है तो अब ये सारी बातें आम लोगों तक पहुंचती जा रही हैं । आम व्यक्ति बहुत ही गहरा विश्लेषण करना न जानता हो पर अपने काम की बातें वह समझ लेता है । चुनाव आयोग मेें कुछ तो गड़बड़ है इस बात को दूरदराज के क्षेत्रों मेें रहने वाला अशिक्षित मतदाता भी महसूस करने लगा है याने उसके मन मेें भी संदेह ने जन्म ले लिया है । यह स्थिति भारत के लोकतंत्र और चुनाव आयोग दोनों के लिए अच्छा नहीं है । अब जब भी चुनाव के परिणाम आयंेगें वे भले ही ईमादारी के परिणाम हों पर एक प्रश्न चिन्ह हर एक के मन मेें उठता ही रहेगा, वहीं विश्व पटल पर भी इसकी छवि धूमिल होती दिखाई देगी । सरकार के हित मेें भी यह उचित नहीं है । सरकार केवल राहुल गांधी को बुरा-भला कह कर आरोपों को ढंकने का काम रही है और चुनाव आयोग केवल एकजुटता दिखाकर आरोपों के बेबुनियाद साबित करने मेें लगा है । ठोस सबूत कोई प्रस्तुत नहीं कर पा रहा है । अखबार मेें प्रकाशित रिपोर्ट को सही ढंग से झुठा साबित नहीं कर पा रहा है । ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजनीतिक दलों को एकजुट होना अलग बात है पर आम मतदाता तक भ्रम या आरोप का फैल जाना विशेष बात है । क्या वाकई ज्ञानेश कुमार ने मनमर्जी से निर्णय लिए और अपरिवक्व फैसले लिए ? क्या वाकई चुनाव आयोग किसी को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रहा है या वह ईमानदारी से चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाना चाहता है ? फिलहाल तो क्लीयर कुछ नहीं है जो है वह अंधेरे में तीर चलाने जैसा है उसमेें भी सबसे ज्यादा अश्चर्यजनक भाजपा के मंत्रियों द्वारा सफाई देना है, क्योंकिं आरोप भाजपा पर नहीं लगे आरोप चुनाव आयोग पर लगे तो भाजपा को सफाई देने की कोई जरूरत थी ही नहीं, सफाई केवल चुनाव आयोग देता और भाजपा मौन बनी रहती । पूरे देश मेे कांग्रेस का प्रदर्शन चल रहा है और युवाओं के संगठन के नाम से चर्चित होने वाली कॉकरोच जनता पार्टी भी ताल ठोक कर मैदान मेें उतर चुकी है, उसने दो अक्टूबर तक समय निर्धारित किया है यदि तब तक ज्ञानेश कुमार स्तीफा नहीं देते तो वे ताल ठोक कर मैदान मेें आ जायेगें जो सरकार के लिए ज्यादा कठिन होगा । अभी कुछ महिनों पूर्व ही कॉकरोच पार्टी ने जिस तरह से केन्द्र सरकार को झुकाकर धर्मेन्द्र प्रधान से स्तीफा लिया उससे उसके हौसले भी बुलंद हैं और उनका आन्दोल कैसा होता है उससे भी सरकार परिचित है । कॉकरोच जनता पार्टी ने राजनीतिक पार्टी न बनकर युवाओं के संगठन के रूप में ही अपने आपको बनाए रखने का निर्णय लिया है तो उनका आन्दोलन युवाओं का आन्दोलन बन जाता है जो भारत के भविष्य के रूप मेें माना जाता है । युवा यदि आक्रोषित होगें तो उनको सम्हाल पाना कठिन होता है, ऐसा अभी दिल्ली के जंतर-मंतर पर उनके द्वारा किए गए आन्दोलन से समझ में आ चुका है । विपक्ष एकजुट है, कॉकरोच पार्टी की चेतावनी है तो क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार स्तीफा देगें ? यदि नहीं दिया तो केन्द्र सरकार इस पूरे विरोध को झेल पायेगी ? उसके पास विकल्प क्या है ? केवल प्रेसवर्ता कर आरोपों को झुठला देना विकल्प नहीं माना जा सकता, ठोस विकल्प चाहिए जो जनता के सामने रखे जाने चाहिए ताकि सभी को पता चल जाए कि अखबार की रिपोर्ट झूठी है और राहुल गांधी सहित जो भी विपक्ष के नेता आरोप लगा रहे हैं वे सारे गलत हैं ? केवल राहुल गांधी को और विपक्षी नेताओं को कोसने से काम नहीं चलेगा । एक याचिका माननीय सुप्रीम कोर्ट में भी दाखिल हो चुकी हैे, यदि उस पर सुनवाई होती है और सुप्रीमकोर्ट भी आरोपों को सच मान लेती है तब क्या होगा ? कुछ ही महिनों के बाद उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्यों मेें चुनाव होना है वे चुनाव अविश्वास के साये मेें न हों इस बात का भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है । बहरहाल यह मुद्दा केन्द्र की सत्ता के भारी प्रयासों के बावजूद थम नहीं रहा है । वैसे सभी को इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए की विश्व पटल पर न तो भारत के लोकतंत्र की और न ही सत्ता की छवि खराब हो । देश पहले है, चुनाव की हार जीत बाद मेें । चुनाव आयोग भी अपनी निष्पक्षता को सिद्ध करने का प्रयास करे ।
