हमारी मातृ भाषा है हमारी जान है हिन्दी।
सदा हम पूजते इसको हमारा मान है हिन्दी।।
सुता यह देववाणी की बड़ी भाषा सभी से है।
लिए भण्डार शब्दों का विपुल ये ज्ञान है हिन्दी।।
करो सम्मान सब इसका उठाके शीश को अपने।
सुनो हिन्दी कहो हिन्दी हमारी शान है हिन्दी।।
सहज सा रूप है इसका लिए ये भाव की सरिता।
मधुर लगती हमें हरदम सुनाती तान है हिन्दी।।
विदेशी छोड़ दो भाषा सबल हिन्दी हमारी है।
लिखो हिन्दी पढ़ो हिन्दी सुगम सी गान है हिन्दी।।
बनाना राष्ट्रभाषा है सभी मन में इसे धर लो।
हमारे देश को जैसे मिली वरदान है हिन्दी।।
कहानी और कविता की अनेकों धर्म ग्रंथों मय।
हजारों ग्रंथ की लगती अतुल ये खान है हिन्दी।।
सजा उपवन दिखे इसका अनेकों रूप रंगों से।
कहे सब आज धरती पर बनी पहचान है हिन्दी।।
डाॅ सरला सिंह ‘स्निग्धा’
दिल्ली
