पिता भी करना चाहता है अपने बेटे को स्पर्श, बिल्कुल माँ की तरह,
चूमना चाहता है मस्तक को, बिल्कुल माँ की तरह।
अपनी गोद में बैठाकर, सहलाना चाहता है बालों को, बिल्कुल उसकी माँ की तरह।
लेकिन समाज ने बाँध दिया पिता को कुछ ऐसी उलझनों में,
कि वो समय ही न दे पाए, संतान से बंधने में।
उसे दी ज़िम्मेदारी की, संतान का भावी भविष्य देखो,
उसे धारण करवायी निष्ठुरता, नीरसता और बाहर देखो।
और माँ को मिलता रहा सम्मान भावनाओं में,
पिता को मिला एक उम्र भर अपमान असफलताओं में।
पिता अपने बच्चों के स्पर्श को तरसता ही रहा,
उम्र भर सूखी आँखों, मुरझाए मन में रोता ही रहा।
सुनता भी रहा, सहता भी रहा और चलता भी रहा,
हृदय में धुनी रमा, आजीवन जीवन की दे आहुति जलता भी रहा। हृदय में बसा परिवार,
आँखों में रचा संसार, खुश होता भी रहा।
लेकिन एक वात्सल्यमय स्पर्श को, ताउम्र पिता तरसता ही रहा।
पिता का स्पर्श : अम्ब्रीश श्रीवास्तव
