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दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने की ओर भारत – महेन्द्र तिवारी

भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर वैश्विक संस्थाओं का दृष्टिकोण तेजी से बदल रहा है। कुछ समय पहले वैश्विक अनिश्चितता, ऊँची ऊर्जा कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव के कारण विकास दर के अनुमान घटाए गए थे, लेकिन अब कई संस्थाएं वित्त वर्ष 2027 के लिए अपने अनुमान बढ़ा रही हैं। प्रमुख रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया है। निवेश, घरेलू खपत और विनिर्माण क्षेत्र की मजबूती को इसका प्रमुख आधार माना जा रहा है।

यह बदलाव केवल आंकड़ों का संशोधन नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक क्षमता का संकेत है। जब अनेक बड़ी अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, महंगाई और व्यापारिक अनिश्चितता से जूझ रही हैं, तब भारत की तेज विकास गति उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रमुख विकास केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।

सकल घरेलू उत्पाद किसी देश की आर्थिक गतिविधियों का व्यापक मापदंड है। विकास दर बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि हर नागरिक तुरंत समृद्ध हो जाएगा, बल्कि यह उत्पादन, निवेश, रोजगार और आय सृजन की क्षमता में वृद्धि का संकेत देता है। इसी कारण वैश्विक निवेशक और रेटिंग एजेंसियां इसे अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण कसौटी मानती हैं।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी मजबूत घरेलू मांग है। लगभग 140 करोड़ की आबादी विशाल उपभोक्ता बाजार उपलब्ध कराती है। वैश्विक निर्यात में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू खपत अर्थव्यवस्था को स्थिरता देती है। शहरी उपभोग, खुदरा बिक्री, आवास और सेवा गतिविधियों में सुधार ने भी आर्थिक गति को सहारा दिया है।

विनिर्माण क्षेत्र भी विकास का महत्वपूर्ण आधार बन रहा है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, सेमीकंडक्टर परियोजनाओं और औद्योगिक गलियारों पर जोर दिया गया है। इससे अनेक वैश्विक कंपनियां भारत को केवल बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन केंद्र के रूप में देखने लगी हैं। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, ऑटोमोबाइल पुर्जों और रक्षा सामग्री के निर्माण में विस्तार रोजगार और निर्यात के लिए महत्वपूर्ण है।

पहली तिमाही में भारत की आर्थिक वृद्धि लगभग 7.8 प्रतिशत रही, जिसने अधिकांश अनुमानों को पीछे छोड़ दिया। निवेश, निर्माण और सेवा क्षेत्र की मजबूती ने इसमें योगदान दिया। इसी प्रदर्शन के बाद मूडीज़ सहित कई संस्थानों ने भारत की आर्थिक वृद्धि के अनुमान संशोधित किए।

सार्वजनिक पूंजीगत व्यय भी विकास का महत्वपूर्ण आधार है। सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डे, जलमार्ग और डिजिटल अवसंरचना में लगातार निवेश हो रहा है। इसका उद्देश्य केवल रोजगार पैदा करना नहीं, बल्कि उत्पादकता बढ़ाकर निजी निवेश के लिए मजबूत आधार तैयार करना है।

सेवा क्षेत्र भारत की प्रमुख आर्थिक शक्ति बना हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाएं, पर्यटन, स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल सेवाओं में लगातार विस्तार हुआ है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं ने नई आर्थिक गतिविधियों को जन्म दिया है और वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका मजबूत की है।

कृषि क्षेत्र में संभावनाओं के साथ चुनौतियां भी हैं। सिंचाई, कृषि उत्पादकता और तकनीक आधारित खेती पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन कमजोर मानसून और मौसम संबंधी परिस्थितियां खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। खाद्य महंगाई का असर ग्रामीण आय और उपभोग पर पड़ सकता है। इसलिए आर्थिक विकास के साथ कृषि स्थिरता भी महत्वपूर्ण है।

भारत के सामने वैश्विक जोखिम भी बने हुए हैं। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए महंगा तेल परिवहन, उर्वरक और उत्पादन लागत पर दबाव डाल सकता है। हालांकि आयात स्रोतों में विविधता और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार ऐसे जोखिमों से आंशिक सुरक्षा देते हैं।

राजकोषीय अनुशासन भी आर्थिक विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण आधार है। वैश्विक संस्थाएं विकास दर के साथ सरकारी कर्ज, राजकोषीय घाटे और ऋण चुकाने की क्षमता का भी आकलन करती हैं। सरकार द्वारा घाटे को धीरे-धीरे कम करने की दिशा में प्रयास निवेशकों के विश्वास को मजबूत कर सकते हैं।

निजी निवेश में बढ़ती सक्रियता भी सकारात्मक संकेत है। बैंकिंग प्रणाली की बेहतर स्थिति, घटते फंसे ऋण, ऋण उपलब्धता और औद्योगिक क्षमता विस्तार ने नए निवेश को प्रोत्साहित किया है। निजी निवेश बढ़ने से रोजगार, आय और उत्पादन की सकारात्मक श्रृंखला मजबूत हो सकती है।

रोजगार इस पूरी आर्थिक कहानी का महत्वपूर्ण पक्ष है। उच्च विकास दर तभी व्यापक अर्थ रखेगी जब उसका लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचे। विनिर्माण, निर्माण, पर्यटन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन कौशल विकास, श्रम उत्पादकता और छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करना भी आवश्यक है। भारत की युवा आबादी तभी बड़ा अवसर बनेगी, जब उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार मिलेंगे।

भारतीय अर्थव्यवस्था की विविध संरचना भी उसकी ताकत है। कृषि, उद्योग और सेवा तीनों क्षेत्रों की भागीदारी अर्थव्यवस्था को अपेक्षाकृत स्थिर बनाती है। किसी एक क्षेत्र में कमजोरी आने पर दूसरे क्षेत्र विकास को सहारा दे सकते हैं।

फिर भी वैश्विक व्यापार में मंदी, कमजोर निर्यात मांग, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य महंगाई जैसी चुनौतियां बनी रहेंगी। विकास दर को बनाए रखने के लिए सरकारी निवेश के साथ उत्पादकता, अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास और वित्तीय सुधारों पर भी ध्यान देना होगा।

भारत की आर्थिक क्षमता को लेकर वैश्विक विश्वास निरंतर बढ़ रहा है। यह निवेश, डिजिटल परिवर्तन, अवसंरचना विकास और व्यापक आर्थिक स्थिरता के प्रयासों का परिणाम है। यदि घरेलू मांग, विनिर्माण और राजकोषीय अनुशासन मजबूत बने रहते हैं, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक विकास का प्रमुख केंद्र बन सकता है। साथ ही यह जरूरी होगा कि विकास का लाभ किसान, श्रमिक, गांव, छोटे उद्यमी और मध्यम वर्ग तक व्यापक रूप से पहुंचे। यही समावेशी विकास भारत की आर्थिक प्रगति को अधिक टिकाऊ और संतुलित बना सकता है।

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