कुत्ते काट रहे हैं, भौंक रहे हैं, लोगों पर झपट रहे हैं। हर शहर में ऐसी घटनाएँ हो रही हैं। कुत्तों से पीड़ित लोगों ने अदालत में याचिका लगाई। अदालत ने आदेश दिया कि कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम में रखा जाए। यह नगर निगम की जिम्मेदारी है, लेकिन न पर्याप्त केंद्र हैं, न जगह और न ही रखरखाव के लिए पैसा। अदालत ने आदेश दे दिया, पर व्यवस्था कहाँ से आए?
डॉग लवर्स ने विरोध शुरू कर दिया। ये वही लोग हैं जो विदेशी नस्ल के कुत्ते पालते हैं, लेकिन देशी कुत्तों को शेल्टर होम में रखने का विरोध करते हैं। जब सरकार ने एक-एक देशी कुत्ते को गोद लेने की बात कही तो वे इसे सरकार की जिम्मेदारी से भागना बताने लगे।
यह दृश्य राजनीति से मिलता-जुलता है। चुनाव आते ही राजनीतिक दल पिछड़ी जातियों के उद्धार और आरक्षण की बातें करने लगते हैं। सरकारी अस्पतालों में गरीब मरते हैं तो जाँच कमेटियाँ बैठती हैं, अफसर निलंबित होते हैं और कुछ समय बाद सब सामान्य हो जाता है। गरीब सरकारी स्कूल में पढ़ता है, सरकारी अस्पताल में इलाज करवाता है और व्यवस्था की विफलताओं का शिकार होता है। लेकिन आरक्षण समाप्त करने का सवाल आते ही वोट बैंक सामने आ जाता है। अमीरों के पास निजी अस्पताल और स्कूल हैं; गरीब के पास सरकारी व्यवस्था ही सहारा है।
बात कुत्तों की हो रही थी। वे भूखे-प्यासे हैं, वाहनों और मशीनों के शोर से घबराते हैं, इसलिए कभी बच्चों तो कभी बड़ों पर झपट पड़ते हैं। अदालत ने दूसरा आदेश दिया कि कुत्तों की नसबंदी करके उन्हें उसी स्थान पर छोड़ दिया जाए। नसबंदी होने तक उन्हें शेल्टर होम में रखा जाए। इस पर भी विरोध शुरू हो गया। कोई उन्हें मारने की बात करता है, कोई प्राकृतिक जीवन का हवाला देता है, तो कोई मानता है कि कुत्तों में शनि और केतु का वास होता है तथा शनिवार को उन्हें भोजन कराने से ग्रह शांत होते हैं।
इसी बीच एक वर्ग को डर सताने लगा कि नसबंदी का इशारा कहीं उनकी ओर तो नहीं है! वे कभी पत्थर फेंकते, कभी बम चलाते और दूसरी ओर से उठते शोर को देखकर भयभीत हो जाते। कुत्तों के बहाने राजनीति, धर्म और जाति की बहस शुरू हो गई।
किसी ने कहा, जिन्हें कुत्तों से नफरत है, वे पाकिस्तान चले जाएँ। किसी ने बांग्लादेशियों का सवाल उठा दिया। किसी ने कहा कि विरोध करने वाले देशविरोधी हैं। दलितों ने अपने बाबा साहब और संविधान की बात की तो उन्हें चुप रहने की सलाह दी गई। फिर कहा गया कि विरोध करोगे तो धर्म परिवर्तन कर लोगे। कोई बोला, मुसलमान नहीं तो बौद्ध बन जाओगे। मंत्रीजी ने समझाया कि बौद्ध धर्म तो हिंदू धर्म की शाखा है, इसलिए अभी असली चुनावी राजनीति हिंदू-मुसलमान के नाम पर ही चलने दो।
कुत्तों की चर्चा फिर पीछे छूट गई। यही तो हमारी राजनीति है—मुद्दा कुछ होता है, बहस कहीं और पहुँच जाती है। धर्म, जाति और भाषा के नाम पर आदमी अपने ही जैसे आदमी से लड़ने लगता है।
कुत्तों की नसबंदी करके उन्हें छोड़ भी दिया जाए, लेकिन भूखे-प्यासे और बेघर कुत्ते जाएँ कहाँ? कोई शांत बैठे कुत्ते को भी लात मार देता है। अपने बचाव में भौंकना और काटना क्या उसका अधिकार नहीं?
तभी एक आदमी बोला, “कुत्तों को अधिकार कब से मिलने लगे? भौंकना ठीक है, काटना नहीं। गरीब और कुत्ते एक ही श्रेणी में आते हैं। गरीब भीड़ में मरे, रैली की भगदड़ में मरे या अस्पताल में लापरवाही से—वह गरीब है। वह चिल्ला सकता है, रो सकता है, लेकिन पलटकर वार नहीं कर सकता। इतना गरीब हो तो मर क्यों नहीं जाते? सरकार और धरती पर बोझ क्यों बने रहते हो?”
“बस, बहुत हो गया!” प्रधानजी बोले। “गरीब है तो वोट है, वोट है तो सत्ता है। गरीब हैं, इसलिए अमीरों के कारखाने चलते हैं और हम प्रधान बने रहते हैं। मैं गरीब के विरुद्ध एक शब्द नहीं सुन सकता। हमारी सरकार बनाए रखिए, हम गरीब और कुत्ते के बीच जादुई अंतर दिखा देंगे। कुत्ते से ज्यादा गरीब आदमी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह वोटर है।”
बात फिर कुत्तों पर लौट आई। अदालत का आदेश था, मानना पड़ेगा, लेकिन व्यवस्था कहाँ थी? कुत्ता जानवर है, इसलिए इंसानों के कानून उस पर किस तरह लागू होंगे, यह भी बहस का विषय बन गया। गाय को माता कहा जाता है, लेकिन सड़कों पर झुंड बनाकर बैठी गायों की जिम्मेदारी कौन लेता है? मालिक को पता होता है कि गाय सड़क पर बैठी है, पर दूध देना बंद कर दे तो उसे घर लाकर खिलाने-पिलाने में उसे घाटा दिखाई देता है। दूध देगी तो सेवा होगी, नहीं देगी तो सड़क ही उसका ठिकाना!
धर्म हो, जाति हो, प्रदेश हो, भाषा हो, गाय हो या भगवान—यहाँ तक कि संतान के जन्म में भी भेदभाव है। बेटी पैदा हो तो कई घरों में चेहरे उतर जाते हैं, बेटा हो तो मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं। दिखावे के लिए बेटी के जन्म पर भी उत्सव होता है, लेकिन भीतर की खुशी में अंतर दिखाई दे जाता है। असल समस्या आदमी की नीयत में है, अन्यथा बेटा-बेटी में फर्क ही क्यों हो?
कुत्ते वफादार होते हैं, लेकिन गद्दारों की दुनिया में वफादारी और ईमानदारी से जीने वालों की हालत भी आवारा कुत्तों जैसी हो गई है। लोग अपने बूढ़े माता-पिता को वृद्धाश्रम छोड़ देते हैं, जबकि कुत्तों को शेल्टर होम में रखने की बात हो रही है, जो पर्याप्त संख्या में हैं ही नहीं।
देशी कुत्ते बिना किसी लोभ के अपनी गली को अपना क्षेत्र मानते हैं, अनजान लोगों पर भौंकते हैं और कभी-कभी चोरों से भी सतर्क करते हैं। बदले में वे थोड़ा-सा स्नेह और भोजन पाने के हकदार तो हैं। मगर उन्हें यह हक भी सहजता से नहीं मिलता। विदेशी नस्ल के कुत्ते घरों में सम्मान पाते हैं, जबकि देशी कुत्ते सड़कों पर उपेक्षित रहते हैं। यह वैसा ही रवैया है, जैसा अंग्रेजी के सामने हिंदी को शर्मिंदा करने का प्रयास। हम अंग्रेजों का विरोध करते हैं, लेकिन उनकी सभ्यता-संस्कृति को श्रेष्ठ मानने का दिखावा भी करते हैं। यही दोहरापन कभी अपनी पसंद और कभी अपने सामाजिक व्यवहार में दिखाई देता है।
गरीब की बेटी, बहन और पत्नी भी सम्मान की हकदार हैं, लेकिन अमीर और ताकतवर की विकृत मानसिकता उन्हें वस्तु समझती है। गरीबी उन्हें शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने से रोकती है। गरीब की बेटियाँ खरीदी-बेची जाती हैं, महिलाओं का शोषण होता है और न्याय की राह में उनकी आर्थिक विवशता दीवार बन जाती है।
महिलाओं के पक्ष में बने कानूनों का दुरुपयोग भी हुआ है। झूठे दहेज मुकदमों और वसूली के मामलों ने कुछ पुरुषों में भय पैदा किया है। लेकिन ऐसे मामलों के बहाने सदियों से महिलाओं पर हुए अत्याचारों को कैसे भुलाया जा सकता है? दहेज के लिए जलाना, प्रताड़ित करना, मारना और उनके अधिकार छीनना क्या कम गंभीर अपराध हैं? जिसको ताकत मिली, उसने उसका दुरुपयोग किया। समाधान किसी एक वर्ग को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि न्याय को निष्पक्ष बनाना है।
गरीब को झूठे मुकदमे में फँसाया जा सकता है, पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया जा सकता है और उसके घर पर बुलडोजर चलाया जा सकता है। उसके पास जमीन कहाँ? वह शहर के बाहर किसी खाली जगह पर झोपड़ी बना लेता है और फिर उसे अवैध बताकर उजाड़ दिया जाता है। जाति और धर्म का खेल इसी तरह गरीब की जिंदगी को और कठिन बना देता है।
अपराधी की कोई जाति नहीं होती—यह कहा जाता है, लेकिन कार्रवाई में जाति और राजनीतिक संबंधों की चर्चा क्यों होती है? एक अपराधी मारा जाए तो लोग संतोष करते हैं, दूसरे के समर्थकों पर कार्रवाई हो तो सवाल उठते हैं। सरकार बदलते ही बचाने और निशाना बनाने वालों के नाम बदल जाते हैं। फिर भी कहा जाता है कि राजनीति में जाति-धर्म नहीं देखा जाता।
देश के प्रधान स्वयं को एक सौ चालीस करोड़ लोगों का प्रतिनिधि बताते हैं और अपनी जातिगत पृष्ठभूमि का उल्लेख भी करते हैं। ऐसे में जाति की दीवारें कैसे टूटेंगी, जब राजनीति में पहचान को बार-बार उभारा जाता है? कुत्तों की आबादी, उनकी भूख-प्यास और उन्हें लात मारकर भगाने वालों से मेरा सवाल है—क्या हम गरीब कुत्ते हैं? क्या आदमी और कुत्ते में कोई अंतर शेष नहीं रहा?
क्या राजनीति की बिसात पर आदमी कुत्ते की तरह भूख, प्यास और अपमान सहता रहेगा? धरती को सरहदों में क्यों बाँटा गया? गरीब कब तक अपने अधिकारों से वंचित और शोषित रहेगा?
प्रधानजी की विदेशों में बड़ी प्रतिष्ठा है, लेकिन देश के लोग उन पर पूरा विश्वास क्यों नहीं कर पा रहे हैं?
एक आदमी ने उनसे पूछा, “पहले आप कुत्तों के बारे में बताइए।”
प्रधानजी हँसे, “मैं सिर्फ इंसानों की बात कर सकता हूँ। कुत्ते हमारे वोटर नहीं हैं। समझ लीजिए, जो हमारे वोटर नहीं हैं, वे कुत्ते हैं। लोग हमें गालियाँ देते हैं तो हम उनके वोटरों को डराते हैं। विपक्ष भी इसी धंधे में है, इसलिए सीधे उनसे लड़ने के बजाय उनके वोटरों पर चोट करते हैं, ताकि हमारे वोटरों को सुख का आभास हो।”
वे आगे बोले, “हम गरीबों को राशन, गैस सिलेंडर, आवास और दूसरी सुविधाएँ देते हैं, खातों में पैसे भेजते हैं, फिर भी वे दूसरी पार्टी को वोट देते हैं। तब हम गुस्से में मस्जिदों के नीचे मंदिर तलाशने लगते हैं। विपक्ष हमारे वोटरों पर पत्थर फेंकता है तो हम कठोर कदम उठाते हैं। हमें कुत्तों से क्या लेना-देना?”
उस आदमी ने कहा, “आदमी को कुत्ता कहना उसका अपमान है।”
प्रधानजी बोले, “नहीं, आदमी को कुत्ता कहना कुत्तों का अपमान है। काश, आदमी कुत्ता होता तो हमारी सुविधाएँ पाकर वफादार रहता! लेना हमसे और वोट किसी और को देना—इतने रंग तो गिरगिट भी नहीं बदलता।”
“तो कुत्तों के विषय में आपका क्या कहना है—नसबंदी, कैद और सुरक्षित स्थान?”
प्रधानजी बोले, “नसबंदी तो उनकी होनी चाहिए जो कुत्तों की तरह…” वे रुके, फिर बोले, “जो दूसरे देश से गैरकानूनी तरीके से हमारे देश में घुसे हैं, उन्हें वापस भेजना चाहिए। विपक्ष अपनी सरकार बनाने के लिए उन्हें शरण देता है।”
उस आदमी ने पूछा, “मैं तो देशी कुत्तों की बात कर रहा हूँ।”
प्रधानजी बोले, “देशी कुत्तों को वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए। जिस दिन ऐसा हुआ, उनके दिन बदल जाएँगे।”
“क्या यह संभव है?”
“राजनीति में सब संभव है। एक प्रदेश में गौमांस प्रतिबंधित नहीं, दूसरे में गाय माता है। सब राजनीति का खेल है।”
उस आदमी ने कहा, “आप चाहते हैं कि लोग कुत्ते बने रहें और आपको वोट देते रहें, ताकि आप सारे मसले हल करने का आश्वासन देते रहें।”
प्रधानजी नाराज हो गए। “तुम हर बात में कुत्तों को क्यों ले आते हो? देशहित में कुत्ते जरूरी हैं। हमारी सरकार के अलावा चीन, पाकिस्तान और देश के अंदर के गद्दारों से कौन निपटेगा? जो हमें वोट देते हैं, वही देशभक्त हैं। जो नहीं देते, उनके बारे में प्रश्नचिह्न रहेगा।”
फिर उन्होंने पूछा, “क्या देश में महँगाई है?”
“हाँ,” उस आदमी ने कहा।
“क्या बेरोजगारी है?”
“हाँ।”
प्रधानजी गुस्से में बोले, “सब मुफ्त में मिल रहा है, फिर महँगाई और बेरोजगारी किस बात की? इसके बाद भी कोई सवाल करेगा तो सीबीआई, पुलिस, बुलडोजर और ईडी की कार्रवाई के लिए तैयार रहे।”
उस आदमी ने कहा, “मैं तो कुत्तों के विषय में पूछ रहा था।”
प्रधानजी बोले, “तुम जानकर नासमझ बन रहे हो। क्या कुत्तों के पक्ष में बोलकर जेन-ज़ी आंदोलन लाकर सरकार गिराना चाहते हो? तुम्हारी हालत कुत्ते जैसी कर दी जाएगी।”
घबराया हुआ आदमी प्रधानजी को अच्छा लगता था। उनकी पहली कोशिश यही होती कि सामने वाला डर जाए। फिर वे अपने सारे काम गिनाते, औकात में रहने को कहते, नारे लगाने और चुप रहने की सलाह देते। कितना बोलना है, कब बोलना है और क्या सोचना है—सब तय करने की कोशिश करते।
कुत्तों के विषय में उन्होंने कहा, “वे हरे रंग के नहीं होते, इसलिए हिंदू हैं और बाबा भैरव के अवतार हैं। हमसे ज्यादा सम्मान उन्हें कौन देगा? बिल पास होते ही कुत्तों को प्रशिक्षण देकर सेना और पुलिस में भर्ती करेंगे। तब तक उन्हें भौंकने और काटने दो। हिंदू समाज उन्हें आदर देता है और देता रहेगा। जिस दिन कुत्तों को समझ आ गया कि वे हिंदू हैं, उनके दिन बदल जाएँगे। जैसे हमने विकलांग को दिव्यांग कहा, वैसे ही कुत्तों को नया नाम देकर उनका जीवन बदल देंगे।”
उस आदमी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। तभी प्रधानजी ने कहा, “बोलो, भारत माता की जय! बोलो, जय श्रीराम!”
उसे इन नारों से कोई आपत्ति नहीं थी। वह बचपन से ही घर और स्कूल में इन्हें बोलता आया था। लेकिन अब इन नारों के साथ दबाव, गुस्सा और दूसरों को नीचा दिखाने की भावना जुड़ गई थी। ऐसा लग रहा था कि अपनी निष्ठा सिद्ध करने के लिए बोलना अनिवार्य है। आस्था के सहज भाव की जगह भय और घृणा ने ले ली थी।
वह आदमी सोच रहा था कि धर्म और जाति में बाँटने वाले यही लोग चुनाव के समय एकता की बात करते हैं। गरीब को गरीब कहते हैं, फिर उसे वोटर बताते हैं, और जरूरत पड़ने पर कुत्ता भी बना देते हैं।
अचानक उसके गाल पर तमाचा पड़ा। हथकड़ी लग चुकी थी।
“यह बहुत प्रश्न करता है, उत्तर नहीं देता। न जय बोलता है, न हमारे नारे लगाता है। इसे कुत्ता बना दो!”
कुछ समय बाद वह आदमी कुत्तों के झुंड के बीच, फटे कपड़ों में कचरे के ढेर के पास मिला। उसकी नौकरी जा चुकी थी, घर तोड़ दिया गया था और उसकी पत्नी बलात्कार की पीड़ा तथा अपमान से टूटकर बच्चों सहित जहर खाकर मर चुकी थी। गद्दार कहे जाने के अपमान ने पूरे परिवार को तबाह कर दिया था। धीरे-धीरे वह आदमी कुत्तों के बीच रहकर भौंकने लगा।
उसे इतनी-सी बात समझ नहीं आई कि सरकार जिसे चाहे कुत्ता बना सकती है और चाहे तो कुत्ते पर दाँव लगाकर उसे मंत्री बना सकती है। कुत्ते के दिन बदल सकते हैं, गरीब के नहीं। गरीब को केवल सपने देखने की छूट है, ताकि वह भौंक न सके।
प्रधानजी ने फिर कहा, “देश में सब ठीक है। कुत्ते भी हमारे अपने हैं। बस उन्हें अपनी उपयोगिता समझनी होगी।”
और वह आदमी सोचता रहा—क्या आदमी और कुत्ते में सचमुच कोई अंतर शेष रह गया है? क्या गरीब हमेशा भूख, प्यास और अपमान के साथ जीने को अभिशप्त रहेगा? क्या राजनीति में आदमी की पहचान केवल उसके वोट से तय होगी?
देवेंद्र कुमार मिश्रा, जबलपुर–482004
मध्य प्रदेश
