अपनी विचार धारा
दूसरों पर थोपते -थोपते
मर जाता है आदमी!
आखिर !मरने के लिए आये है
तो मर जाते हैं,
छोड़कर अपनी विचार धारा
वो !विचार धारा
सुलगती रहती है समाज में
अंधी होकर
क्योंकि ढोने वाले
एक्का दुक्का
पैदा होते रहते हैं
युगों युगों से
और मृत तस्वीर पर
चढाते रहते हैं फूल
उस विचार धारा को जिंदा रखने के लिए।
लेकिन दूसरे विचार धारा को नहीं मानते
चाहे उत्तम हो या निम्न
और लड़ते रहते
और लड़ते रहते
अपने मर जाने तक।
भीम प्रसाद प्रजापति
