दो जून की रोटी
दो जून की रोटी जहां में, मिलती सखी सबको नहीं। दिन रात बहता है पसीना, तब हाथ आ पाती कहीं। मँहगाई का आलम ये है, बढ़ती ही देखो जाती। मजदूरी जितनी भी मिलती, पूरी वह कब हो पाती। जिनपर काम नहीं है कोई, कैसे उनका दिन कटता। दिन में भी तारे दिखते है, मुश्किल से…
