Latest Updates

admin

साबरमती के संत

अब तो रह-रह के राजघाट कसमसाने लगा,मुझको साबरमती के संत तू याद आने लगा। गूंथ कर हार भ्रष्टाचार के गुलाबों का,तेरी तस्वीरों पै बेखौफ डाला जाने लगा। तेरे चित्रों से छपे कागजों के टुकड़ों पर,बड़े बड़ों का भी ईमान बेचा जाने लगा। पहले कातिल बने फिर धनी फिर मसीहा बने,ऐसे जन सेवकों का राजतिलक होने…

Read More

प्रेम भारद्वाज ‘ज्ञान भिक्षु’ अब बने हैं डां प्रेम भारद्वाज

प्रेम भारद्वाज ‘ज्ञान भिक्षु ‘ को USA के विश्वविद्यालय ग्लोबल इन्टरनेशनल विश्वविद्यालय, अमेरिका से मिली, De lit ,, Doctorate honorary causa and Honorary Doctorate ,,            In में Doctor of philosophy in       Social work अब बने हैं            डां प्रेम भारद्वाज  जिसे विश्वविद्यालय ने दिनांक 22 सितम्बर 2024…

Read More

आगमन संदेश प्रिय के

साँवरी भूरि धरा पर,  नथ सजा जौ की सुनहरी,  चाँद की बिछिया बना कर भेंटता फागुन ,  लाल दुल्हन की चुनर मे,  पीत स्वर मंगल-ध्वनि मे,  नील डोली की गति मे ,  घोलता फागुन,  चटक नारंगी पुहुप के,  सरस वंदनवार बनकर नव – वधु के आगमन पर डोलता फागुन ,  श्यामवर्णी कोकिला और,  हरित शुक…

Read More

प्रकाश शिन्दे की ‘आस-प्रयास’ दिखाती है कि दुनिया में अच्छे लोग भी हैं

(ग्वालियर हलचल सम्पादक प्रदीप मांढरे से ‘आस प्रयास’ नाटक के लेखक श्री प्रकाश शिंदे की विशेष वार्ता)प्रदीप मांढरे ग्वालियर हलचल ग्वालियर, 19 सितम्बर। 50 वर्षीय प्रकाश शिन्दे मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ग्वालियर में कार्यरत हैं। पिछले 10 साल से वह अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी के इलाज में दिन- रात एक कर रहे थे । दुर्भाग्य से…

Read More

संस्कारों का विकास

कुणाल के दोस्त का जन्मदिन था। वह सुबह से ही पापा के पीछे लगा हुआ था क्योंकि दोस्त के जन्मदिन में जाने के लिए अच्छा सा गिफ्ट भी तो चाहिए था ना। पापा उसे बाजार ले गए और एक साधारण सा गिफ्ट उसे दिलवा दिया। कुणाल को अच्छा नहीं लगा। इधर उसने देखा,पापा खूब सारी…

Read More

किंकर्तव्यमूढ़ समाज के चारों तरफ क्यों जमी है धुंध.!

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी हम वही देखते है जो हमें दिखाया जाता है जबकि वास्तविक चित्र अब भी धुंधला है और धूर्त नेता इस चित्र के आगे कुंडली मार बैठे है। आपको समाज का सबसे निकृष्ट व्यक्ति साबित करने में इन्हे केवल दो मिनट लगता है जबकि इनका वीआईपी कल्चर…

Read More

“राखी”

        राखी नाम की एक दुबली-पतली बीमार -सी ,साँवले रंग की एक लड़की,उम्र यही तेरह- चौदह की साल रही होगी । वह आठवीं कक्षा में पढ़ती थी । राखी कक्षा में बिलकुल पीछे बैठती थी। वह हमेशा चुपचाप बैठी रहती शायद इसी लिए उसकी कोई  सहेली भी नहीं बनी थी । हाँ अगर शिक्षिका कक्षा…

Read More

सौंदर्य

सौंदर्य केवल वस्तुओं में नहीं है सौंदर्य केवल मनुष्य में नहीं है सौंदर्य केवल प्रकृति में नहीं है सौंदर्य सर्वत्र व्याप्त भी नहीं है वास्तविक सौंदर्य देखने वाले की आँख में है इस प्रकार सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् की परिभाषा अमूल्य, अजान और अमान्य जान पड़ती है जो लोग खोजते हैं सौंदर्य को ईश्वर में जो लोग खोजते…

Read More

यूं तो जरा भी देर न लगी

भावनाओं को कविता का रूप दिया, लेकिन आज क्यों शब्द भी थम से गए, जब से प्रभु श्री राम का नाम लिया। कितनी पवित्र होगी वो स्याही, जो लिखेगी मेरे प्रभु श्री राम का नाम, उस कागज में भी जान आ जाएगी, जिसमें रघुवर के होंगे गुणगान। राम नाम जपता ये जग सारा, पर राम…

Read More

राष्ट्रमुकुट की प्रतीक्षा

कर कर के युग प्रतीक्षा थक जाऊंगी। क्या पता राष्ट्रभाषा कब बन पाऊंगी। मेरी आत्मा से वे चलचित्र बनाते, मेरे वाक्यों से अरबों रोज कमाते, मेरा अधरों पर नाम तक नहीं लाते, उस फिरंगिनी बोली को गले लगाते। सब देशों की प्रिय भाषा बन जाऊंगी, क्या पता राष्ट्रभाषा कब बन पाऊंगी। शिशुओं की मुझसे दूरी…

Read More