“जो कलम से सृष्टि के कर्मों का लेखा लिखते हैं, क्या वे केवल एक जाति के आराध्य हो सकते हैं?”
भारतीय संस्कृति में पूजा, केवल देवी-देवताओं की आराधना नहीं, बल्कि अपने कर्म, साधन और दायित्व के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम भी है। यहाँ हल पूज्य है, शस्त्र पूज्य है, पुस्तक पूज्य है और औज़ार भी। भारतीय चिंतन ने सदैव यह संदेश दिया है कि जिस साधन से जीवन चलता है, उसका सम्मान ही सच्ची उपासना है।
इसी संदर्भ में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है—क्या भगवान चित्रगुप्त की पूजा केवल कायस्थ समाज तक सीमित रहनी चाहिए, अथवा प्रत्येक उस व्यक्ति को करनी चाहिए जिसकी आजीविका लेखन, ज्ञान, अभिलेखन, न्याय, प्रशासन और लेखा-जोखा जैसे कार्यों से जुड़ा है?
पद्मपुराण सहित अनेक पुराणों में वर्णित है कि जब ब्रह्माजी ने अनुभव किया कि प्रत्येक जीव के कर्मों का सूक्ष्म और निष्पक्ष लेखा रखना आवश्यक है, तब उन्होंने अपनी काया से एक दिव्य पुरुष को प्रकट किया। यही भगवान चित्रगुप्त कहलाए।
‘चित्र’ अर्थात सम्पूर्ण चित्र या विवरण और ‘गुप्त’ का तात्पर्य सुरक्षित या गोपनीय माना जाता है। अर्थात् जो प्रत्येक जीव के कर्मों का सूक्ष्म एवं गोपनीय लेखा सुरक्षित रखें। इसलिए उन्हें धर्मराज के सहायक और कर्मफल के दिव्य लेखाधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
वे केवल किसी समुदाय विशेष के देवता नहीं, बल्कि सत्य, निष्पक्षता, उत्तरदायित्व और न्यायपूर्ण लेखांकन के प्रतीक हैं।
‘कायस्थ’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘काय’ (शरीर) तथा ‘स्थ’ (स्थित) से मानी जाती है। पुराणों के अनुसार चित्रगुप्त ब्रह्मा की काया से प्रकट हुए, इसलिए उनके वंशज ‘कायस्थ’ कहलाए।
हालाँकि इतिहासकारों एवं धर्मशास्त्रों में कायस्थों की उत्पत्ति और वर्णगत स्थिति को लेकर भिन्न-भिन्न मत मिलते हैं। कहीं उन्हें पृथक समुदाय माना गया, कहीं क्षत्रिय, कहीं ब्राह्मणों के निकट तथा कहीं प्रशासनिक वर्ग के रूप में वर्णित किया गया। इस कारण इस विषय पर एकमत निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है।
इतना निर्विवाद है कि भारतीय इतिहास में कायस्थ समाज ने प्रशासन, न्याय, अभिलेख, राजस्व, कूटनीति, साहित्य और शासन व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। चित्रगुप्त पूजा की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी करते रहने में कायस्थ समाज के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता।
वैदिक साहित्य में चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—का उल्लेख मिलता है। अनेक विद्वानों का मत है कि आरम्भिक काल में यह व्यवस्था जन्म से अधिक कर्म और योग्यता पर आधारित थी। समय के साथ सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन आया और व्यवस्था जन्माधारित होती चली गई।
राज्य जैसे-जैसे विस्तृत होते गए, शासन व्यवस्था जटिल होती गई। कर व्यवस्था, भूमि अभिलेख, न्यायिक निर्णय, राजकीय पत्राचार, संधियाँ, राजस्व और प्रशासन के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता हुई जो लेखन, गणना और अभिलेखन में दक्ष हों। इस प्रकार एक विशिष्ट प्रशासनिक वर्ग विकसित हुआ जिसने भारतीय इतिहास में शासन की रीढ़ का कार्य किया।
यदि हम भारतीय परम्पराओं पर दृष्टि डालें तो पाएँगे कि अधिकांश पूजाएँ किसी जाति की सीमाओं में बँधी नहीं हैं।
विश्वकर्मा जयंती पर केवल विश्वकर्मा समाज ही नहीं, बल्कि कारखानों में कार्यरत श्रमिक, अभियंता, तकनीशियन, मैकेनिक, मशीन ऑपरेटर, उद्योगपति तथा वाहन चालक तक अपने औज़ारों और मशीनों की पूजा करते हैं।
विजयादशमी पर सैनिक, पुलिसकर्मी तथा सुरक्षा बल शस्त्र पूजा करते हैं। उनके लिए शस्त्र केवल हथियार नहीं, सुरक्षा व कर्तव्य के प्रतीक हैं।
बसंत पंचमी पर विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, कलाकार और संगीतज्ञ माँ सरस्वती की आराधना करते हैं। किसी से यह नहीं पूछा जाता कि वह किस जाति का है।
आषाढ़ अमावस्या, अक्षय तृतीया अथवा अन्य स्थानीय परम्पराओं में किसान अपने हल, बैल, ट्रैक्टर, कृषि उपकरण और धरती माता का पूजन करते हैं। यह पूजा सम्पूर्ण कृषक समाज की होती है।
धनतेरस पर चिकित्सक, आयुर्वेदाचार्य और अनेक स्वास्थ्यकर्मी भगवान धन्वंतरि का स्मरण करते हैं क्योंकि वे आरोग्य और चिकित्सा के आदिदेव माने जाते हैं।
दीपावली पर व्यापारी वर्ग अपने बही-खातों की पूजा करता है। आधुनिक डिजिटल युग में कम्प्यूटर, लैपटॉप और कार्यालयों की भी विधिवत पूजा की जाती है। यह परम्परा बताती है कि भारतीय संस्कृति साधनों में भी ईश्वर का अंश देखती है।
उपरोक्त उदाहरण इंगित करते है- साधन और कर्म के प्रति श्रद्धा।
तब चित्रगुप्त पूजन पर संकीर्णता क्यों?
यदि औज़ारों की पूजा जाति से ऊपर हो सकती है, यदि ज्ञान की आराधना सब कर सकते है, यदि शस्त्र और कृषि की अर्चना सर्वसामान्य हो सकती है, तो फिर कलम, दवात और लेखा के देवता भगवान चित्रगुप्त की वंदना केवल एक जाति तक सीमित क्यों रहनी चाहिए?
आज दवात की जगह कम्प्यूटर ने ले ली है, ताड़पत्रों का स्थान डिजिटल अभिलेखों ने ले लिया है, काग़ज़ की फ़ाइलों के स्थानापन्न डिजिटल डाटाबेस और क्लाउड हो गए है। पर मूल कार्य वही है—लेखन, अभिलेखन और उत्तरदायित्व।
आज जब शिक्षक अंकपत्र तैयार करता है, न्यायाधीश निर्णय लिखता है, अधिवक्ता वाद तैयार करता है, पत्रकार समाचार लिखता है, लेखक साहित्य रचता है, चार्टर्ड अकाउंटेंट लेखा तैयार करता है, बैंक अधिकारी वित्तीय अभिलेख सँभालता है, सरकारी कर्मचारी प्रशासनिक फाइलें तैयार करता है, वैज्ञानिक शोधपत्र लिखता है, प्रोग्रामर कम्प्यूटर कोड लिखता है, शोधार्थी अपना शोध प्रबंध लिखता है—तो वे सभी किसी न किसी रूप में लेखन और अभिलेखन की उसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे होते हैं जिसके प्रतीक भगवान चित्रगुप्त हैं।
आज कलम केवल स्याही तक सीमित नहीं है। की-बोर्ड भी कलम है, डिजिटल टैबलेट भी कलम है, कम्प्यूटर स्क्रीन भी आधुनिक दवात का स्वरूप है।
पूजा किसी जातीय अधिकार का विषय नहीं, बल्कि कर्तव्य के प्रति श्रद्धा का उत्सव है। यदि इसे किसी जातीय आधार पर देखा जाए तो यह समाज की संकीर्णताओं में जकड़ी मिलेगी।
भगवान चित्रगुप्त हमें यह शिक्षा देते हैं कि प्रत्येक कर्म का लेखा होता है; और उसका परिणाम उसमें निहित है। सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व से बड़ा कोई धर्म नहीं।
जो व्यक्ति अपने लेखन में सत्यनिष्ठ है, अपने लेखे में पारदर्शी है, अपने निर्णयों में निष्पक्ष है और अपने दायित्व के प्रति ईमानदार है, वही वस्तुतः चित्रगुप्त की आराधना कर रहा है।
चित्रगुप्त पूजा की परम्परा का संरक्षण और संवर्धन करने का श्रेय निस्संदेह कायस्थ समाज को जाता है। इस सांस्कृतिक धरोहर को पीढ़ियों तक जीवित रखने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
किन्तु यदि भगवान चित्रगुप्त को कर्म, लेखन, न्याय, अभिलेखन और उत्तरदायित्व का सार्वभौमिक प्रतीक माना जाए, तो उनकी आराधना का अधिकार और प्रेरणा उन सभी तक पहुँचनी चाहिए जो कलम, पुस्तक, लेखा, अभिलेख, न्याय और ज्ञान के माध्यम से समाज की सेवा करते हैं।
शायद समय की यही माँग है कि चित्रगुप्त पूजा को किसी जातीय सीमा में बाँधने के स्थान पर कर्म की पवित्रता, सत्यनिष्ठा और ज्ञान-संस्कृति के महापर्व के रूप में देखा जाए। तब यह पूजा केवल एक समुदाय का उत्सव नहीं रहेगी, बल्कि प्रत्येक कलमधारी, प्रत्येक लेखक, प्रत्येक शिक्षक, प्रत्येक न्यायप्रिय व्यक्ति और प्रत्येक उत्तरदायी नागरिक का सांस्कृतिक उत्सव बन सकेगी।
गोपाल कृष्ण श्रीवास्तव ‘जीके’
