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तुमने लड़ना क्यों छोड़ दिया? – अम्ब्रीश श्रीवास्तव

माँ अक्सर कहा करती थीं,
जहाँ प्रेम होता है, वहीं लड़ाई भी होती है।”

बचपन में मुझे यह बात समझ नहीं आती थी। लगता था कि प्यार और लड़ाई तो एक-दूसरे के दुश्मन हैं। लेकिन तुम्हारे साथ रहते-रहते समझ आया कि माँ कितनी सही थीं।

याद है, तुम हर छोटी-छोटी बात पर मुझसे लड़ जाया करती थीं।

गीला तौलिया अगर मैं पलंग पर छोड़ देता, तो तुम्हारा चेहरा तुरंत लाल हो जाता।

“कितनी बार कहा है, तौलिया सूखने डाल दिया करो!”

मैं हँस देता, और तुम और ज़्यादा नाराज़ हो जातीं।

जब मैं अपने मोज़े टेबल के नीचे छुपा देता, तुम पूरे घर में ढूँढ़ती फिरतीं और फिर उन्हें मेरी तरफ़ फेंकते हुए कहतीं,

“तुम इंसान हो या चलता-फिरता तूफ़ान?”

झूठे बर्तन सिंक तक ले जाने में मुझे जैसे सदियाँ लग जाती थीं, और तुम्हें मुझसे लड़ने का एक और बहाना मिल जाता था।

दिन में पाँचवीं बार चाय माँगने पर तुम कहतीं,

“एक दिन मैं घर छोड़कर चली जाऊँगी, तब खुद बना लेना चाय!”

और मैं मुस्कुराकर कहता,

“तुम कहीं नहीं जाओगी।”

मेरा बिखरा हुआ कमरा, बाथरूम का गंदा फ़र्श, बिस्तर पर पड़े कपड़े, आधी खुली अलमारी…

तुम हर चीज़ पर लड़ती थीं।

और अजीब बात यह है कि तब मुझे तुम्हारी लड़ाई से चिढ़ होती थी।

लेकिन आज…

आज वही लड़ाइयाँ मुझे सबसे ज़्यादा याद आती हैं।

क्योंकि अब तुम लड़ती नहीं हो।

अब मैं गीला तौलिया पलंग पर छोड़ देता हूँ, और कुछ देर बाद देखता हूँ कि वह अपनी जगह पर टंगा हुआ है।

मोज़े टेबल के नीचे पड़े रहते हैं, और अगले दिन धुले हुए अलमारी में रखे मिलते हैं।

झूठे बर्तन मैं जहाँ छोड़ दूँ, तुम चुपचाप उठा देती हो।

बार-बार चाय माँगूँ, तो बिना कुछ कहे बना देती हो।

बाथरूम गंदा छोड़ दूँ, तो तुम बिना शिकायत साफ़ कर देती हो।

और सबसे ज़्यादा तो मुझे तब दर्द होता है…

जब देर रात घर लौटता हूँ।

पहले तुम्हारे दस मिस्ड कॉल होते थे।

दरवाज़ा खुलते ही सवालों की बरसात शुरू हो जाती थी।

“इतनी देर क्यों हुई?”

“फोन क्यों नहीं उठाया?”

“खाना ठंडा हो गया है!”

और मैं झूठ-मूठ नाराज़ होकर कहता,

“तुम्हें हर बात पर लड़ना ज़रूरी है क्या?”

लेकिन अब…

अब कोई कॉल नहीं आता।

कोई सवाल नहीं होता।

कोई नाराज़गी नहीं होती।

मैं आधी रात को घर आऊँ या सुबह, तुम बस इतना पूछती हो,

“खाना खा लोगे?”

और फिर अपने काम में लग जाती हो।

तुम्हारी इस ख़ामोशी ने मुझे उन सारी लड़ाइयों से ज़्यादा घायल किया है।

क्योंकि अब लगता है कि तुमने शिकायत करना छोड़ दिया है।

और इंसान शिकायत उसी से करता है, जिससे उम्मीद होती है।

जिससे अपनापन होता है।

जिससे प्रेम होता है।

परायों से कौन लड़ता है?

परायों की गीली तौलिया कौन उठाता है?

परायों के लिए कौन रात भर जागता है?

परायों की चिंता कौन करता है?

शायद इसलिए आजकल डर लगता है।

बहुत डर।

कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने मुझसे उम्मीद करना छोड़ दिया है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरी आदतें तुम्हें अब परेशान नहीं करतीं, क्योंकि अब मैं तुम्हारे लिए उतना मायने ही नहीं रखता?

कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे बीच का प्रेम धीरे-धीरे चुप्पियों में बदल गया है?

कल रात बहुत देर तक मैं तुम्हें सोते हुए देखता रहा।

मन में एक ही सवाल घूमता रहा।

वही सवाल जो महीनों से मेरे सीने में अटका हुआ है।

मैंने धीरे से तुम्हारा हाथ पकड़कर पूछा,

सुनो… एक बात बताओ।”

तुमने आँखें खोलीं।

क्या?”

मैंने काँपती आवाज़ में कहा,

तुमने लड़ना क्यों छोड़ दिया?”

कुछ पल के लिए कमरा बिल्कुल शांत हो गया।

फिर तुम्हारी आँखों में नमी उतर आई।

तुम मुस्कुराईं, मगर वह मुस्कान पहले जैसी नहीं थी।

तुमने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर कहा,

क्योंकि मैं थक गई हूँ…”

मैं चौंक गया।

तुम आगे बोलीं,

पहले मैं लड़ती थी क्योंकि मुझे भरोसा था कि मेरी हर शिकायत तुम्हारे लिए मायने रखती है। मुझे लगता था कि तुम बदल जाओगे, मेरी बात सुनोगे।”

तुम्हारी आवाज़ भर्रा गई।

लेकिन जब सालों तक वही बातें दोहराती रही और कुछ नहीं बदला, तो एक दिन समझ गया कि लड़ने से कुछ नहीं होगा।”

मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

तुमने आँखों से गिरते आँसू पोंछे और कहा,

प्रेम खत्म नहीं हुआ है… बस वह लड़ते-लड़ते थक गया है।”

उस एक वाक्य ने जैसे मेरे भीतर सब कुछ तोड़ दिया।

उस रात पहली बार समझ आया कि प्रेम का सबसे खतरनाक अंत झगड़ा नहीं होता।

नफ़रत भी नहीं होती।

प्रेम का सबसे दर्दनाक अंत होता है — उदासीनता।

जब कोई इंसान लड़ना छोड़ देता है।

मनाना छोड़ देता है।

रोकना छोड़ देता है।

सवाल पूछना छोड़ देता है।

क्योंकि तब वह रिश्ता नहीं छोड़ता…

वह उम्मीद छोड़ देता है।

और उम्मीद के बिना प्रेम सिर्फ़ एक आदत बनकर रह जाता है।

आज भी कभी-कभी जानबूझकर गीला तौलिया पलंग पर छोड़ देता हूँ।

मोज़े टेबल के नीचे फेंक देता हूँ।

चाय के लिए पाँच बार आवाज़ लगा देता हूँ।

फिर तुम्हारी तरफ़ देखता हूँ…

इस उम्मीद में कि शायद तुम फिर से नाराज़ होकर कहो,

तुम कभी नहीं सुधरोगे!”

क्योंकि अब समझ आया है…

तुम्हारी लड़ाइयाँ मुझे बदलने के लिए नहीं थीं।

वे इस बात का प्रमाण थीं कि मैं तुम्हारी दुनिया में अभी भी शामिल हूँ।

इसलिए आज भी दिल से बस एक ही दुआ निकलती है—

अगर प्रेम बचा हो, तो एक बार फिर मुझसे लड़ लेना।

क्योंकि तुम्हारी नाराज़गी में जितना अपनापन था, उतना तुम्हारी ख़ामोशी में कभी नहीं मिला।

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