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रिजिम चेंज की व्यवस्था में लगे दरबारी, संकट में सन्मार्ग….

रिजिम चेंज की व्यवस्था में लगे दरबारी, संकट में सन्मार्ग….
पंकज सीबी मिश्रा राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
बताओ रिजिम कैसे चेंज होगी ? ब्राह्मणवाद मिटाने से, मनुवाद जलाने से, सवर्ण गरीबों को सताने से या लोकतंत्र हथियाने से ! बताओ पक्ष और विपक्ष वालों कैसे बदलेगा रिजिम ! और क्या भरोसा की नए रिजिम में लूटेरे नहीं होंगे ! युवाओं के अँधकारमय भविष्य का, महंगाई और विषवाद का , धर्म के बाजार का हिसाब माँगने वाले हम सबको यह बताओ…. चुनाव तो 2029 में हैं तो रिजिम चेंज 2026 में क्यों ! यह टूल किट को दी गई सुपारी है जो मीडिया के एंकरों पत्रकारों और यहां तक की भाजपा के नेताओं को भी पता है पर सब आनंद में आनन फानन मना रहें। किसी सवाल को विपक्षी ऐसे पूछते हैं जैसे यह कोई यक्ष प्रश्न हो। उन्हें कोई बताए कि यह जो पूरा जन आंदोलन चल रहा है वह महंगाई, बेरोजगारी, गौमाता और युवाओं के मुद्दे है ही नहीं इसलिए नवंबर की रामलीला हो याँ रामलीला मैदान की रैली दोनों नीरस लगेंगे। अर्नब तूफ़ान से तबाही आई और उससे पहले एयर शो हुआ, प्रधानमंत्री मोदी गए तो विपक्ष लगा फूफकारने ! विपक्ष ना हुआ बनारस वाले पगलैट मिश्रा जी हो गए जो लाल टोपी पहन के कुछ भी अकते बकते है। यह लोकतांत्रिक दबाव बनाने के लिए ही विपक्ष की ओझी मानसिकता है ऐसा हम नहीं भाजपा के मिडिया मैन कहते है। वो यह भी कहते है कि वोट चोरी बंद कीजिए और यह तब माना जायेगा जब सत्ता उन्हें सौप दिया जाय। वो कहते है पेपर लीक रोकिए पर उनकी आंतरिक मांग है इसके पीछे की पेपर को आरक्षण के आधार पर सेट कीजिये। अंकिता भंडारी और दूसरी ऐसी तमाम लड़कियों महिलाओं को न्याय दीजिए पर बिना जाँच के नहीं। जिनके साथ 12 साल में फर्जी एससी एसटी एक्ट में अन्याय अत्याचार हुए हैं उन्हें तत्काल फांसी दीजिये बिना जाँच के यही चाहते है रेजिम चेंज वाले।
सरकार से इतना कहूंगा कि रोजगार के अवसर पैदा कीजिए नौकरी दीजिए ताकि यह जो बाजारों में मंदी छाई है वह दूर हो सके। लोगों की जेब में जब पैसा आएगा तो वह बाजार जाएंगे। रैली से व्यापारियों का धंधा रुकता नहीं। फुट फाल होने से बढ़ता है।बाजार और मैनेजमेंट का सिद्धांत है कि मार्केट में जितने ज्यादा फुट फाल होंगे मतलब लोग आएंगे उतना ही व्यापार बढ़ेगा। वीरान बाजार व्यापार नहीं बढ़ाते हैं। हैडलाइन मैनेजमेंट बंद कीजिए…और अगर यह सब नहीं कर सकते तो जाइए। दोबारा चुनाव होगा।रीजिम चेंज होगी। यही है और क्या? 12 साल में अगर आपने कुछ काम नहीं किया। तो आपको जाना पड़ेगा। जनता यही दबाव बना रही है। रिजिम चेंज का मतलब सरकार बदलना ऐसे ही होता है। सरकार पर दबाव बनाना ताकि वह या तो काम करें या इस्तीफा देकर चली जाए। ऐसा नहीं होता है जैसा इन लोगों ने किया था। इस मीडिया को बताओ कि 25 जून 1975 को इसी रामलीला मैदान में जिसकी मोदी के सत्ता की सत्ता से भारी तकलीफ हो रही है बीजेपी के सारे बड़े नेताओं वाजपेयी आडवाणी की मौजूदगी में जयप्रकाश नारायण ने भारत की सेना से कहा था की सरकार के आदेश मानना बंद कर दो। यह था सेना को भड़काना नहीं रेजिम चेंज का आह्वाहन था। देशद्रोह नहीं तानाशाही पर वार था । और संवैधानिक तरीके से सैनिक विद्रोह के जरिए रीजिम चेंज करने का एक प्रसंग । यह समय वह नहीं है जो राहुल गांधी कह रहे हैं कि आरोपी नंबर चार का इस्तीफा करवा दो आंदोलन आधे मिनट में खत्म हो जाएगा। मगर फिलहाल आंदोलन खत्म होगा रिजिम फिर भी बचे रहेगी उनकी । क्योंकि ज्ञानेश कुमार आरोपी नहीं आरोपी समुचा विपक्ष है जो सवर्णो कि सुनता नहीं, आरक्षण पर बोलता नहीं, महंगाई पर धरना नहीं करता और सनातन को भला बुरा बोलता है। रिजिम चेंज हो जाएगी। शांतिपूर्वक, लोकतांत्रिक, संवैधानिक तरीके से। उधर पवन पेड़ा सहित अनेक कांग्रेसी प्रवक्ता मिडिया में तब आकर कह रहे थे की उनका बाप भी बदल गया है जिनका बाप है ही नहीं। राजनीति में युवराज के सवारी भैंसा ने मोदी के बाप पर बात की , वह उनके वैचारिक बाप के विषय में था यह कहां युवराज के मंत्री ने । लेकिन तब तक बात यूपी स्नातक चुनाव पर आ गई । पिछले कई दिनों से इस मंच पर पूर्वांचल का हाल बेहाल है कहा जा रहा । भाजपा की क्या हालत है उस पर विश्लेषण कर रहे हैं तो क्या समीकरण है वो सुनिए ? कितना बिगड़ा है हाल समझिये ? क्या असर होगा विश्लेषण पढ़िए ? हर पहलू पर सोचिये, वाराणसी में क्या हुआ ? गोरखपुर में क्या हुआ ? इसका आकलन ठीक से करिएगा तब तस्वीर साफ होगी क्यूंकि रेजिम वाराणसी में चेंज नहीं हुई। बात अगर स्नातक चुनाव परिणाम की करें तो गोरखपुर ही कर लेते हैं। वहां गजब संघर्ष चला । ऐसा होना नहीं चाहिए था। इससे दो तीन बाते बड़ी साफ है। एक तो यह समीकरण बिखर रहा हैं। यदि गोरखपुर में ऐसा है तो पूरब के बाकी हिस्सों में क्या हाल होगा ! दूसरा, जमीन पर संदेश ठीक नहीं है। क्यूंकि सवर्ण वर्ग नाराज है भाजपा से। इससे अलग कहानी वाराणसी की नहीं है। वहां पीएम ने रोड शो भी किया था। इसके बाद भी यदि हालात इस कदर बिगड़े की आठ विधायक और तीन मंत्री मिलकर भी एमएलसी चुनाव नहीं जितवा सकें। तो अब विधान सभा चुनाव में क्या होगा? बहुत कुछ है जो पूरब से लेकर पश्चिम तक चल रहा है। वाराणसी बहुत बड़ा संदेश दे रहा है। अब कहा जायेगा कि उम्मीदवार का चयन ठीक नहीं हुआ। इससे बात नहीं बनेगी। यदि छोटे चुनाव में ये हाल तो आगे का क्या कहा जाएं। जाहिर है बहुत कुछ दुरुस्त करना है अन्यथा भाजपा का सियासी संकट बहुत बड़ा है। तो भाई कांग्रेसियों की तरह सबके एक से अधिक बाप नहीं होते। कांग्रेसियों के बायोलॉजिकल बाप अलग और आइडियोलॉजिकल बाप अलग होते होंगे, सबके नहीं होते। हो सकता है कि इनके कामर्सियल बाप भी होते हो, इलेक्ट्रिकल बाप भी होते हों, अनऔफिशियल बाप भी होते हों, रेडिकल बाप भी होते हों, एंटी नेशनल बाप भी होते हों, इंटरनेशनल बाप भी होते हों। खैर इस मल्टीपैटर्नल कल्चर को कांग्रेस अपनी खदान में डाल ले, हमको क्या। समाजवादी पार्टी ने गजब कर दिया.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से शिक्षक स्नातक सीट (पटक के) जीत ली.. वो भी दोबारा..सपा का टेंपो हाई है.. क्या ये यूपी की राजनीति में बड़े उलटफेर के संकेत हैं ! देखिए न, भाजपा छोड़कर सपा ज्वाइन करने वालों की कतार लगी है..और भाजपा यूजीसी मुद्दे पर ट्रोल है। बीते कुछ दिनों से लगभग रोज भाजपा के बड़े-बड़े नेता सपा की साइकिल पर सवार हो रहे हैं। वाराणसी शिक्षक एमएलसी सीट का परिणाम आया तो फिर से मोदी जी का जादू कुछ टूटता दिखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र से सपा के लाल बिहारी यादव जीत गए। ऊपर ब्रैकेट में लिखा है न “पटक के जीत लिए। बनारसी अंदाज में अईसे ही बोलते हैं। लाल बिहारी यादव को 10,958 वोट मिले जबकि भाजपा प्रत्याशी प्रमोद कुमार मिश्रा 6,060 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे.. इस सीट पर लाल बिहारी यादव दोबारा जीते हैं.. इससे पहले 2020 में भी लाल बिहारी यादव यहां से जीते थे तब भी उन्होंने प्रमोद कुमार मिश्रा को हराया था। तब प्रमोद कुमार मिश्रा ओमप्रकाश शर्मा गुट से लड़े थे.. उन्हें 6,830 वोट मिले थे। भाजपा से चेतनारायण सिंह चुनाव लड़े थे जो तीसरे नंबर पर रहे थे। अबकी बार भाजपा ने प्रमोद कुमार मिश्रा को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा और प्रमोद जी बेचारे पिछली बार से भी 770 कम वोट पाए। सपा प्रत्याशी लाल बिहारी यादव ने पिछली बार 936 वोट से जीत दर्ज की थी.. अबकी बार उनकी जीत का अंतर बढ़कर 4898 वोट हो गया। यूपी की हवा बदल रही है क्या भइया ! कृपया सारे राजनेता शुचितापूर्ण भाषा का उपयोग करें। न आती हो तो मेरी पोस्टों को पढ़कर सीखें फिर भी नहीं समझ में आये तो बिहार वाले अनंत सिंह से सीख लो।

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