कविता और कहानी
नारी (कविता-2)
माना एक नारी की जिंदगी उसकी कब होती है पर उसे भी अधिकार है अपने मन से जिंदगी जीने का खिलखिलाने का गुनगुनाने का, पर ये अधिकार उसे स्वयं लेना होगा देना सीखा है लेना भी सीखना होगा कर्तव्य के साथ सचेत होकर आगे बढ़ कर अपना अधिकार लेना होगा, इससे नहीं बदलेगा उसका बेटी/…
” नारी ” (कविता-1)
कोंख बसर में रख तूं पाला राम कृष्ण महावीर बुद्ध ; नानक ईशा कलाम विवेकानन्द मनीषी प्रबुद्ध! 🌹 पतिव्रत धर्म निभाने को पाहन रूप धरी अहिल्या ; सतीत्व को सत्यापित करने अग्नि परीक्षा से गुजरी सीता! 🌹 पति के स्वाभिमान की रक्षा में सती हो गयी हिमालय नन्दनी ; सबरी धीरज की सुकुमार हृदया नारी…
अयोध्या पर फैसला
न्यायालय के फैसले, का सम्यक सत्कार नहीं किसी की जीत ना, हुई किसी की हार राजनीति के खेल में, उलझ गए थे राम आशा है लग जाएगा, उस पर पूर्ण विराम इस न्यायिक प्रक्रिया में, शामिल थे जो लोग अभिनन्दन हर किसी का, जिस जिस का सहयोग पांचों पंचों को करूं, बारंबार प्रणाम दर्ज हुआ…
कौन सा अभिप्राय लेकर जिन्दगी जीने लगे
सम्पन्न हो तुम देख लो, वो फटे पट सीने लगे।। बहुत जर्जर हो गई थी , मेरे माँ की लूगरी। और कोई भी नही थी , धौत बस्त्र दूसरी ।। दूसरी होती नये परिधान में, वो खिलखिलाती। लोकलज्जा से विवस , डरकर न यूँ ही सहम जाती ।। लाज आखिर लाज है , चैतन्यता की…
आज का पत्रकार
पत्रकारिता को बेशर्मो ने जाने क्या बना दिया। चमचागिरी ने सभी को आज बहुत गिरा दिया।। वो पत्रकार जो आज बहुत चिल्ला रहे है। ना जाने किस नेता की कमर सहला रहे है।। बहुत ही पाक पेशा होता है पत्रकार का, चंद रुपयों की चाहत में उस पर दाग लगा रहे है। बहुत समय लगता…
नफरतों की क्यों खड़ी दीवार
नफरतों की क्यों खड़ी दीवार तेरे शहर में। ढूँढता मैं फिर रहा हूँ प्यार तेरे शहर में। गाँव जैसी बात होती ही नहीं है आपसी हो गया हूँ मैं तो बस लाचार तेरे शहर में। देखता हूँ मांगते हैं सब दुआ ही या दवा हैं सभी ही लग रहा बीमार तेरे शहर में। चीज़ हर…
झूठ का पौधा उगाया जा रहा है….
झूठ का पौधा उगाया जा रहा है सत्य से उसको सजाया जा रहा है बह रही थी जो हवा उपवन डुलाती आंधियाँ उसको बताया जा रहा है झूठ का पौधा उगाया जा रहा है सत्य से उसको सजाया जा रहा है…. कह रहे वो हो रहा जो भोर वह है दिख रहा जो…
आइए जलते हैं
आइए जलते हैं दीपक की तरह। आइए जलते हैं अगरबत्ती-धूप की तरह। आइए जलते हैं धूप में तपती धरती की तरह। आइए जलते हैं सूरज सरीखे तारों की तरह। आइए जलते हैं अपने ही अग्नाशय की तरह। आइए जलते हैं रोटियों की तरह और चूल्हे की तरह। आइए जलते हैं पक रहे धान की तरह।…
