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Guru Teg Bahadur Singh’s Sacrifice-A Historical Foundation for the Global Human Rights Struggle Against Religious Intolerance

Guru Teg Bahadur Singh’s message of martyrdom was not limited to India;over time, it became the cornerstone of the global human rights movement. The international observance of Guru Teg Bahadur Singh’s 350th martyrdom year in 2025 is of immense historical,cultural, and political significance-Advocate Kishan Sanmukhdas Bhawnani, Gondia, Maharashtra Gondia – The global observance of Guru…

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हम अपना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कब, क्यों फहरायें ?

                                      देवेन्द्र कुमार पाठक तिरंगा तीन रंगों से बना है.केसरिया,सफेद औऱ हरा. इसके बीच  में अशोक चक्र है, जिसमें चौबीस तीलियाँ हैं. जब तिरंगा खुली हवा में आकाशीय ऊँचाई पर फहराया जाता है, तब हमारी यह संकल्प भावना होती है कि हम  सब देशवासी चौबीस घण्टे,यानी दिन-रात देश की प्रगति के लिये पूरी निष्ठा और…

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आशंकाओं के भंवरजाल में नव वर्ष का उत्सव

इस एक जनवरी को उदित हुए सूरज के लाल रंग में उच्छवास नहीं है । घर की दीेवाल पर टंगें नए कैलेण्डर की चमक में भी आकर्षण नहीं है । शेष बचे पेड़ों की शाखाओं पर चिड़ियां तो चहक रहीं हैं पर इन पक्षियों की चहक मंे भी उत्साह नहीं सुनाई दे रहा है ।…

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अक्षय तृतीया (आखा तीज)

 मंजुलता वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को ‘अक्षय तृतीया’ या ‘आखातीज’ कहते हैं। ‘अक्षय’ का शाब्दिक अर्थ है- जिसका कभी नाश (क्षय) न हो अथवा जो स्थायी रहे। अक्षय तृतीया तिथि ईश्वर की तिथि है। इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था इसलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई…

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शिक्षित वर्ग में जातीय पूर्वाग्रह का स्थायित्व

संविधान ने समानता और सामाजिक न्याय के आदर्शों को स्थापित किया, परंतु भारतीय समाज में जाति चेतना अभी भी गहराई से विद्यमान है। शिक्षित और शहरी वर्गों में यह चेतना प्रत्यक्ष भेदभाव के बजाय सूक्ष्म रूपों में प्रकट होती है—जैसे रोजगार, विवाह और सामाजिक नेटवर्क में। आर्थिक प्रगति और आधुनिकता ने जाति को कमजोर किया…

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साबरमती के संत

अब तो रह-रह के राजघाट कसमसाने लगा,               मुझको साबरमती के संत तू याद आने लगा। गूंथ कर हार भ्रष्टाचार के गुलाबों का, तेरी तस्वीरों पै बेखौफ डाला जाने लगा। तेरे चित्रों से छपे कागजों के टुकड़ों पर, बड़े बड़ों का भी ईमान बेचा जाने लगा। पहले कातिल बने फिर…

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आखिर क्यों बदल रहे हैं मनोभाव और टूट रहे परिवार?

भौतिकवादी युग में एक-दूसरे की सुख-सुविधाओं की प्रतिस्पर्धा ने मन के रिश्तों को झुलसा दिया है. कच्चे से पक्के होते घरों की ऊँची दीवारों ने आपसी वार्तालाप को लुप्त कर दिया है. पत्थर होते हर आंगन में फ़ूट-कलह का नंगा नाच हो रहा है. आपसी मतभेदों ने गहरे मन भेद कर दिए है. बड़े-बुजुर्गों की…

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आजादी के सही मायने, संसद में हंगामा करने वालों से समझिए.

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी             स्वतंत्रता दिवस हर वर्ष मनाते है और प्रतिवर्ष एक नई स्वतंत्रता खुद के लिए जोड़ लेते है। इस वर्ष भी एक स्वतंत्रता हमने बड़ी सरलता से प्राप्त कर ली और वह है संसद में हंगामा करना और सिटिंग चेयर पर्सन को अपमानित करना। इस प्रकार…

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चुनावी समीकरणों में उलझा मतदाता

                                                                                                   कुशलेन्द्र श्रीवास्तव          पतझड़ में तो पेड़ों से पत्ते झरते हैं ताकि नए पत्ते आ सकें । ये नए पत्ते नया स्वरूप् देते हैं पेड़ों को भी और वातावरण को भी । पर सम्पूर्ण भारत में नैतिक मूल्यों के पतन का दौर चल रहा है । जिन बच्चों के हाथों में किताब होना चाहिए,…

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भारत में बाल तस्करी : डॉ० पूजा सिंह

भारत में बाल तस्करीबाल तस्करी एक गंभीर अपराध है जिसमें बच्चों को उनके मूल स्थान से जबरन या धोखा देकर ले जाया जाता है और फिर उनका शोषण किया जाता है। यह शोषण कई रूपों में होता है, जिसमें वेश्यावृत्ति, अंग तस्करी, यौन शोषण, बलात श्रम, दासता आदि शामिल हैं। इस समस्या का सामना केवल…

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