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ममता का साथ छोड़ते नेता

 कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
ओह ! टीएमसी ‘‘क्षणभंगुर जीवन’’ जैसी बरबाद हो गई । कोई भी क्षेत्रीय दल चुनाव हारने के उबाद भी इतने जल्दी खत्म नहीं होती  । अप्रेल माह मेे जोर-जोर से चिघाड़ रहे टीएमसी के नेता, जिस भाजपा कों कोस रहे थे अब उनकी तारीफ करते हुए उनके पाले में बैठे दिखाई दे रहे हैं । शर्म नहीं आती……राजनीति में केवल एक ही कालम नहीं होता वो ‘‘शर्म’’ का । आत्मा तो होती ही नहीं है कि जो उन्हें धिक्कारे और कहे ‘‘नेता जी जिस पार्टी के सिम्बल पर आप सांसद बने हैं……..पार्टी छोड़ते समय कम से कम उस सांसदी से भी स्तीफा दे देते…..’’ । भाजपा तो मजबूत पार्टी है यदि आप स्तीफा देकर उनकी पार्टी से फिर से चुनाव लड़ जाते हैं तो भी आप जीत ही जायेगंे तो पार्टी से स्तीफा दिया तो सांसदी से भी स्तीफा दे देते ? पर नहीं दिया किसी ने राजनीति नैतिक मुूल्यों को तो कभी का त्याग चुकी है । ममता बनर्जी और उनके भतीजे असहाय बने अपनी ही पार्टी को टूटते हुए देख रहे हैं । पहले नवनिर्वाचित विधायकों ने पार्टी छोड़ी फिर लोकसभा सांसदों ने और साथ में राज्यसभा सांसद भी साथ छोड़ गए पूरी बेशर्मी के साथ । यूनुस पठान  जैसे सांसद जो केवल ममता बनर्जी के बल पर ही चुनाव जीते हैं वरना उनको तो आज भी कोई नहीं जानता वे भी ममता बनर्जी को छोड़ कर चले गए । अब वे ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पर आरोप लगा रहे हैं, जो नेता महिना भर पहले तक ममता बनर्जी की तारीफों के पुल बांध रहे थे उन्हें अब ममता बनर्जी की खामियां दिखाई देने लगीं । ममता बनर्जी की सांसद महुआ मित्रा ने तो युसूफ पठान को बहुत खरखोटी सुनाई पर इससे क्या होता है, वहीं शत्रुघन सिन्हा ने साफ बोला कि वो ममता बनर्जी को किसी भी हाल में छोड़कर नहीं जायेगें । बहुत थोड़े नेता बचे हें ममता बनर्जी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं पर वो भी कब तक उनके साथ रहेगें कहा नही जा सकता । राजनीति का यह रूप किसी ने नहीं देखा था हांलाकि अब तो बार-बार देखने को लि रहा है । महाराष्ट्र मेें शिवसेना को भी ऐसे ही टूटते देखा था हमने, विधायकों को और सांसदों को पार्टी छोड़ते देखा था, फिर उन्हें केन्द्र की सत्ता का साथ मिला तो वे राजा बन गए । पर पष्चिम बंगाल मेें स्थिति और खराब हुई है, यहां जो बागी नहीं हुए वो जेल की सलाखों के पीछे पहुंच रहा है और जो बागी हो गया वो सत्ता सुख की ओर बढ़ रहा है । पश्चिम बंगाल मेें सत्त परिवर्तन के साथ ही पुलिस और सेना की उपस्थिति मेें ही टीमएससी के कार्यालयों को तोड़ने की प्रकिया भी होते देखी है और टीएमसी से जुड़े नेताओं के सरेराह जुलूस निकलते भी देखा है । ममता बनर्जी से लेकर अभिशेक बनर्जी पर भी एफ आइ आर हो चुकी है । टीएमसी के नता भयभीत हैं, हो सकता है कि ये बागी सांसद और विधायक भी ऐसे ही किसी भय से पार्टी से बगावत कर रहे होें । कभी शुभेन्दु अधिकारी भी ममता बनर्जी के खास हुआ करते थे, पर एक दिन लोूगों ने टीव्ही पर उनको रिष्वत लेते देखा औ केन्द्र क्षरा ममता बनर्जी पर आरोप लगाते सुना फिर कुछ दिनों बाद वे भाजपा में शामिल हो गए और आज वहां के मुख्यमंत्री भी हैं । जो आज खास है वो कल भी खास ही रहेगा यह परंपरा खत्म हो चुकी है । जब तक आपका उदय है तब तक सभसी आपके साथ हैं, कोई भी अस्त होते सूरज के सामने नहीं झुकता । राजनीति में सब कुछ ायज है । केन्द्र सरकार रिकार्ड बना रही है कितने लम्बे समय तक श्री मोदी जी प्रधानमंत्री रहे, कितना विकास हुआ और 207 को जो विजन है उसे किस तरह पूरा किया जा सके । इसके लिए केन्द्र की सरकार को सांसद चाहिए ताकि वे बहुमत के आंकड़े तक पहुंच सकें तो क्या केन्द्र की सरकार अब इस आंकड़े के पास पहुंच चुकी है । राज्यों मेें अपनी सरकार चाहिए ताकि वे राज्यसभा मेें अपने नेताओ को जिता कर भेज सकें और राज्यसभा मेें भी उनको बहुमत मिल सके । बहुमत होगा तो प्रस्ताव पारित करना आसान होगा, अभी तक जो विपक्ष बहुमत न होने के कारण केन्द्र सरकार को परेषान करता रहा है उसे अब केन्द्र सरकार के पास दोनों सदनों मेें बहुमत हो जाने के बाद केवल हल्ला करना ही शेष रह जाएगा जो वो करता भी है । कभी सदन को चलने ही कहां दिया है । टीएमसी के सांसद विपक्ष के साथ खड़े होकर भाजपा को कोसते थे और प्रधानमंत्री की मिमक्री करते थे अब जब वर्षाकालीन सत्र प्रारंभ होगा तो वे ही सासंद भाजपा के पक्ष मेें बोलते दिखेगें, सुनने वालों को अजीब लगेगा हो सकता है कि बोलने वाले सांसदों को भी शर्म आए….पर नहीं आती । आप पार्टी के राघव चडढा जैसे सांसद जिनका जन्म ही भाजपा के विरोध मेें हुआ था अब वे केन्द्र सरकार की तारीफों के पुल बांध रहे हैं । झुझलाए लो उनके पुराने वीडियों निकाल कर पोस्ट कर रहे हैं । यह राजनीति है यहां सब चलता है । विपक्ष भी कमजोर हुआ है यह भी सच है । टीएमसी के 29 सांसद थे, आप पार्टी के राज्यसभा के आठ सासंद कम होगें । विपक्ष सिमटता जा रहा है जिस राज्य मेे चुनाव हो रहे हैं वहां की मजबूत क्षेत्रीय पार्टियां हार कर घर बैठ रहीं हैं, तलिनाडु मेें भी सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके हार चुकी है, पर अभी उसके पास सांसद हैं, पर वे कांग्रेस से नाराज हैं, कांग्रेस ने तमिलनाडु मेें विजय की पार्टी को समर्थन दे दिया, कांग्रेस का भय था कि यदि तलिनाडु मेें विजय की पार्टी सत्ता तक नहीं पहुंच पाई तो केन्द्र सरकार वहां भी खेला कर सकी है, उसने समर्थन कर उनकी सरकार बनवा दी । डीएमके नाराज हो गई उसने इंडिया गठबंधन से दूरी बना ली । विपक्ष और कमजोर हो गया । विपक्ष मजबूत रहे या कमजोर भाजपा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, उनके पास हर परिस्थितियों से संघर्ष करने की रणनीति बनाने मेें माहिर नेता है जो रेत से भी तेल निकाल लेने में सक्षम हैं । कांग्रेस तो वैसे भी  हारी हुई बाजी पर दांव लगा रही है उसके पास खोने को कुछ नहीं बचा । पर इतना तो साफ है कि जब भी देष मेें क्षेत्रीय पार्टियां विलप्त होगीं तो कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी बचेगी जो मुकाबला करती दिखेगी । क्षेत्रीय पार्टियों का हारना कांग्रेस के लिए लाभदायक साबित होने लगा है । कॉकारोच पार्टी फ्लाप हो गई । तीन दिन में करोड़ों लाइक ले लेने वाली कागजी और सोशल मीडिया वाली पार्टी का यह हश्र तो होना ही था । लोगों ने कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगा ली थी उनको लग रहा था कि उनके लिए एक मंच मिल गया है पर यह उत्साह ज्यादा दिन नहीं चल पाया । आप पार्टी के गठन के समय भी ऐसा ही हुआ था, लोगों ने उम्मीदें लगा कर उसे सत्ता तक पहुंचाया भी पर वह भी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई । जिस तरह कॉकरोच पार्टी को समर्थन मिला था उससे एक बात तो साफ हो गई है कि आम मतदता एक नया मंच चाह रहा है पर नया मंच राजनीतिक परिदृष्य में सफल होता दिखाई नहीं देता । कॉकरोच पार्टी ने नीट परीक्षा को मुद्दा बनाया, नीट परीखा के पपेर लीक होने के मामले मेें पूरे देश मेेें आक्रोश तो दिखा पर हल नहीं दिखा । कांग्रेस ने इस मुद्दे को बहुत हवा दी पर नतीजा कुछ नहीं निकल पाया । बच्चे तो निराष हैं ही एक छात्रा ने अपने आपको यह कह कर खत्म कर लिया कि अब वह फिर से परीक्षा की तैयारी नहीं कर पा रही हैं । नीट परीक्षा बहुत कठिन परीक्षा होती है, बच्चे सालों और कई-कई घंटे मेहनत करते हैं, तब वे थोड़ी सी उम्मीद बांध पाते हैं फिर परीक्षा कैंसिल हो जाती है, अब उनको फिर से उतनी ही तैयारी करनी होगी, स्वाभाविक है कि उनका मनोबल टूटता है, उनकी हताशा बढ़ती है और निराशा उन्हें डिप्रेशन तक ले जाती है । अब 21 जून को फिर से नीट परीक्षा होगी । शासन ऐसे इंतजाम कर रहा है कि इस बार परीक्षा निर्वघ्न सम्पन्न हो जाए पर इससे उन बच्चों का मनोबल वापिस नहीं आ पा रहा है जो पिछली परीक्षा मेें बेहतर अंक पा लेने का आत्मविश्वास दिख रहे थे । परीक्षा तो परीक्षा ही होती है । इस बार सीबीएससी ने भी छात्रों के साथ खेला कर दिया । उनकी उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन सही नहीं करा पाए तो लाखों छात्रों के सामने अंधियारा छा गया । बहुत हो हल्ला मचा भी पर परिणाम कुछ नहीं निकल पाया । छात्रों के भविश्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है । छात्र के सामने चुनौती है, उच्च शिक्षा के लिए कांपटीशन बढ़ता जा रहा है । अभिभावक यह ही सोचकर छोटी कक्षाओं से बच्चों पर बोझ डालते हैं और लाखों रूप्या खर्च करते हैं ताकि उच्च शिक्षा की पढ़ाई उनके लिए आसान हो जाए पर वो हर साल और कठिन होती जा रही है । बेहतर परसेन्टेज लाने के बाद भी बच्चों को निश्चत नहीं होता कि वे बहुत अच्छे शिक्षा संस्थान में प्रवेश पा ही जायेगें । प्रतिस्पर्धा बढ़ चुकी है और बच्चे मेहतन करते हुए निराशा के श्किार हो रहे हैं । राजनीति अपनी जगह पर देष््रा का भविष्य अपनी जगह । छात्र जीवन केवल पढ़ने के लिए होना चाहिए, वे पढ़े ताकि उनका भविष्य बेहतर बने और देश का भी । बेरोजगारों की संख्ष्स बढ़ रही है और ये बेरोजगार ही कॉकरोच जैसी पार्टी में मुच खोज रहे हैं । बढ़ तो महंगाई भी रही है । ईधन जब भी महंगा होता है बाकी वस्तुओं पर मंहंगाई अपने आप बढ़ जाती है । गैस सिलेण्डर से लेकर पेट्रोल-डीजल लगातार मंहगे हो रहे हैं तो बाकी सामान भी महंगे होते जा रहे हैं। मंहगाई का रोना केवल राजनीतिक दल ही रो रहे हैं जो प्रभावित हो रहे हैं वे असहाय बने हुए हैं । ‘‘आमदनी अठ्ठनी और खर्चा रूपैया’’ के भार तले वो बैचेन है । दो जून की रोटी तो खानी ही पड़ेगी तो उसके लिए जुगाड़ बिठाना मेहनत का काम है । गरीबों को तो सरकार दे रही है और अमीरों को फर्क नहीं पड़ रहा है, परेशान है तो केवल मध्यमवर्गीय व्यक्ति, जिसके पास आमदनी तो आज भी अठ्ठनी ही है पर खर्चा रूपैया से आगे बढ़ चुका है । वह गैस की जुगाड़ करता है तब तक पेट्रोल मंहगा हो जाता है, फिर बाकी वस्तुएण्ं महंगी हो जाती हैं, वह घर से बाजार जाते समय जो बजट बनाकर निकलता है, दुकान तक पहुंचते-पहुंचते वह बजट जरा सा होकर रह जाता है । मध्यमवर्गी पिस रहा है, उसके पास आय सीमित है और वह सीमित ही रहने वाली है पर खर्चा असीमति होने लगा है । उसे भी तो राहत चाहिए, सरकार कोई ऐसी योजना भी तो लाए जो मध्यवर्गीय परिवारों के लिए हो । 

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