विधा- कुंडलिया छ्न्द
प्रभुवर के दरबार में, मचा शोर चहुंँओर।
मर्यादा भूले सभी, देखो चन्दा चोर।
देखो चन्दा चोर,अजब हिम्मत दिखलाई।
भूल गए हर ज्ञान, बड़ों ने जो सिखलाई।
लालच में वह देख, दिखे कब उनको रघुवर।
पायेंगे वह दंड, सजा देंगे अब प्रभुवर।।
माया ने पागल किया, भूल गए प्रभु नाम।
उनके ही दरबार में, चोरी का कर काम।
चोरी का कर काम, दिखाई कैसी करनी।
आयेगा अब वक्त, पड़ेगी करनी भरनी।
कैसा उनका मोह, लोभ आंँखों पर छाया।
प्रभुवर को दी छोड़, पकड़ बैठे वह माया।।
डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’
दिल्ली
