“नव्य भारत”
ये गण का तंत्र, कैसा हो गया मन का मंत्र, हरेक जप रहा नव्य भारत ऐसा हो कि सारा गणतंत्र जागरूक… अन्तर्मन दहके ज्वाला सा मुख मचा हाहाकर.. सेंध लगा नियमों में लोकतंत्र के नाम मजाक बनाया समेटा था बहुत जा रहा बिखर – बिखर हर कोई सोच रहा अपनी – अपनी… नव्य भारत ऐसा…
