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हिंदी भाषा और साहित्य मनुष्यता की सेतु

   भारत पिंड से ब्रह्मांड तक मानव कल्याण की धारणा से बढ़ने वाला देश है। यदि हम पश्चिम की भाषा में सोचेगें तो भारत की आत्मा को कभी जान नहीं पाएंगे। भरतीय भाषाऐं जितनी सशक्त होगी, राष्ट्र उतना ही सशक्त होगा। भारत को भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। हमारे देश के सभी भाषाएं हमारी है। इस देश की सभी भाषाएं राष्ट्रभाषा जैसा है। आज दुनिया भारतीय ज्ञान परंपरा संस्कृति को जानना चाहती हैं। भारत आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हिंदी भाषा भारत का गौरव है।
          दुनिया के कई देशों ने अपनी अपनी भाषा में ही ज्ञान विज्ञान की पूर्णता प्राप्त की है। अंग्रेजी भाषा जिन पर बुरी तरह हावी हो चुकी है। वही यह तर्क देते हैं कि बिना अंग्रेजी के भारत पिछड़ जाएगा। भारत में केवल 2 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी जानते हैं। यदि जापान और जर्मनी जैसे देश अंग्रेजी के बिना अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम से विज्ञान की नवीनतम जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, तो हम अपनी हिंदी के जरिए ऐसा क्यों नहीं कर सकते? विश्व में करीब 1 अरब से ज्यादा लोग न सिर्फ हिंदी बोल सकते हैं बल्कि इसे लिखते और समझते भी हैं।
        हिंदी भाषा हमारे राष्ट्र का गौरव है- संसार में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में मैंडेरिन चीनी, अंग्रेजी और स्पैनिश के बाद हिन्दी चौथे स्थान पर अपना स्थान सुनिश्चित करती है, परन्तु दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग में लायी जाने वाली भाषा के रूप में देखा जाए तो पूरे विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में अंग्रेजी के बाद हिन्दी का ही नाम आता है। हिंदी दरिद्र नहीं है। उसका अपना वैभव है। हिंदी भाषा हमारे राष्ट्र का गौरव है। यह सिर्फ एक भाषा नहीं बल्कि हमारे जीवन, मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषण का माध्यम और परिचायक भी है। हमारी मातृभाषा हिंदी अनेकता में एकता के मूल्यों को स्थापित करती है। खतरा भाषा को नहीं है। वह तो बहता नीर है। नदी है। उसे रोकेंगे तो वह समाप्त होगी।
     सभी भाषाएं आपस में मां-बहने हैं, सौतन नहीं- सभी भाषाएं आपस में मां-बहने हैं। इन सब में बड़ी बहन हिंदी है। इन सब की मां संस्कृत है। संस्कृत भारतीय भाषाओं की ही नहीं अपितु संसार की अनेक भाषाओं की जननी है। हिन्दी दक्षिण के तेलुगू, कन्नड़, मलयालम की बड़ी बहन है, सौतन नहीं है। हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है। हिंदी के ज्यादातर शब्द संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा से लिए गए हैं। मुख्य रूप से आर्यों और पारसियों की देन है। हिंदी भाषा में, व्याकरण सहित कला, संगीत के सभी माध्यमों में अपनी उपयोगिता, प्रासंगिकता एवं वर्चस्व कायम किया है। यह देश की धड़कन है।
     भारत में रोजगार के लिए अंग्रेजी को पढ़ा जाता है, भाषा के रूप नही- अंग्रेजी भारत में दासी या अतिथि के रूप में तो रह सकती है, बहुरानी के रूप में नही। सामाजिक-शिक्षा का मुख्य द्वार हिंदी ही हो सकती है। यहाँ रोजगार के लिए अंग्रेजी को पढ़ा जाता है, भाषा के रूप नही।
     स्थानीय भाषा के जानकारों को ही रोजगार दिए जाएं- भाषाओं को बचाने के लिए जरूरी है कि स्थानीय भाषा के जानकारों को ही रोजगार दिए जाएं। इससे भारतीय भाषाओं के संरक्षण के साथ अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती मिलेगी और ये लोग अपनी भाषा को गरिमा भी प्रदान करेंगे। इस नजरिये से 52 क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई एक अनूठी और आवश्यक पहल है। पाठ्यक्रमों में भी क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों को जगह दिया जाना चाहिए। दक्षिण भारत के लेखक को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। दक्षिण भारत के लोगों का वार्तालाप एवं लेखन उतरी भारतीय से बेहतर है।
  भाषा हमारे अस्तित्व के संरक्षक है- कोई भी भाषा लादी या थोपी नहीं जा सकती, वह तो स्वाभाविक रूप से मुंह से निकलती है। बच्चा जब पहली बार बोलता है, तब मां कहता है। यह स्वाभाविक भाषा है। यही हिंदी है। यही स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा है। भाषा लोगों को जोड़ने का काम करती है। भाषा अंतर्निहित मनोभाव और विचारों को न सिर्फ प्रकट करने का सशक्त माध्यम होती है बल्कि यह हमारे दैनिक क्रियाकलाप का सबसे महत्वपूर्ण अंग भी है। भाषा हमारे अस्तित्व के संरक्षक है। 
     हिंदी की किसी भाषा से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं- हिंदी की किसी स्थानीय भाषा से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। हिंदी सभी भारतीय भाषाओं की सखी है और वे एक-दूसरे की पूरक है। चाहे वह गुजराती हो, मराठी हो, तेलुगु हो, मलयालम हो, तमिल हो या बांग्ला हो, हर भाषा हिंदी को मजबूत करती है और हिंदी हर भाषा को मजबूत करती है। कोई भाषा, दूसरी भाषा के शब्दों को अपनाकर छोटी नहीं होती बल्कि इसका आयाम बढ़ता है। अतः देश की क्षेत्रीय भाषा तभी समृद्ध हो सकती है, जब हिंदी समृद्ध होंगी और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास से हिंदी में समृद्ध होगी।
     भाषा एक दूसरे से मिलकर बड़ी बनती है- भाषा भी ऐसे ही एक दूसरे से मिल कर बड़ी बनती है। सभी भाषाओँ को आपस में मिलते रहना चाहिए। संस्कृत, अरबी, हिन्दी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, तमिल, तेलगू, कन्नड़, मराठी, बंगाली, रूसी, जापानी आदि-इत्यादि का विवाद बेमानी है। अंग्रेजी ने साइंस की ज्यादातर बातें फ्रेंच से उठा लीं, रोमन में लिख कर उसे अंग्रेजी का बना लिया, तो अंग्रेजी इससे समृद्ध हुई और फ्रेंच भी विपन्न नहीं हुई।
 राष्ट्रवादी होने के लिए मानव विरोधी होना जरूरी नही- सूरीनाम में 1863 से अब तक हिंदी बोली जाती है और वहां के लोग भारतीय सभ्यता-संस्कृति को संरक्षित एवं संवर्धित कर रहे हैं। भाषा, भजन, वेशभूषा, अपने भूतकाल और भारत वर्ष की भावनाओं के साथ आज भी जी रहे। राष्ट्रवादी होने के लिए मानव विरोधी होना जरूरी नहीं है। कोई समाजवादी व्यक्तिवादी नहीं हो सकता है। हिंदी हमें एक साथ जोड़ती है। हमें अपने ज्ञान-विज्ञान, भाषा, आयुर्वेद और संस्कृति पर गर्व है।
    हिंदी जोड़ती है, तोड़ती नहीं है- अंग्रेजी में कई ऐसे शब्द है जिसमें जो लिखा जाता हैं वो बोला नहीं जाता है लेकिन हिन्दी में जो लिखा जाता है, वही बोला जाता है। हिंदी हृदय की भाषा है। हिंदी में मानवीय अनुभूतियों के जो शब्द है, वो विश्व के कई भाषाओं में नहीं है। हिंदी जोड़ती है, तोड़ती नहीं है। जितने स्वर आवाज हिंदी में निकलते हैं, उतने किसी अन्य भाषाओं में नहीं निकलते। जिस प्रकार भावनाएं हिंदी में प्रकट कर सकते हैं, इस प्रकार से दूसरी भाषाओं में नहीं। अतः वैज्ञानिक भाषा हिंदी है। घर में जिस तरह मां की महत्व है, उसी तरह देश में हिंदी का महत्व है।
     भाषा चिड़िया की तरह है, जो सरहद नहीं देखती- कोई भी भाषा तालाब नहीं है। वह चिड़िया की तरह है, जो सरहद नहीं देखती। भाषा नदी है, मोड़ पर मोड़ लेती रहेगी। कभी करवट, कभी बल खा कर, कभी सीधी, उतान बहेगी। बहने दीजिए। रोकिए मत। नदी का अंग कटेगा तो नदी रोएगी। भाषा और नदी कोई भी हो उसे रोने नहीं दीजिए, खिलखिलाने दीजिए। तकनीक बदलेगी, बाजार और मन के भाव बदलेंगे तो भाषा, शब्द और वर्तनी भी ठहर कर नहीं रह सकेंगे। यह सब भी बदलते रहेंगे।
    भाषा और साहित्य मनुष्यता की सेतु- भाषा और साहित्य मनुष्यता की सेतु है। हम तो जानते और मानते थे कि हिन्दी हमारी मां है, भारत की राजभाषा है। लेकिन कुछ साल पहले हिन्दी दिवस पर एक नेता ने नया ज्ञान दिया था कि हिन्दी हिन्दुत्व की भाषा है। उधर दूसरे नता ने कहा है कि भारत हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व से बड़ा है। यह सब तो कुछ वैसे ही है, जैसे अंग्रेजी, अंग्रेजों की भाषा है। भाषा कोई भी हो, मनुष्यता की भाषा होती है। संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू , फारसी, अरबी, रूसी, फ्रेंच या कोई भी भाषा हो, सभी भाषाएं मनुष्यता की भाषाएं है। सभी भाषाएं आपस में बहने हैं, दुश्मन नहीं। पर यह भी है कि जैसे अंगे्रजी दुनिया भर में संपर्क की सबसे बड़ी भाषा है, ठीक वैसे ही, भारत में हिन्दी संपर्क की सबसे बड़ी भाषा है। इसको अब थोपने की जरूरत नहीं है। हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। हिंदी सर्वाग्रही हो चुका है। हिन्दी हमारी अस्मिता है। हमारा गुरुर, हमारा मान है। हिन्दी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी के छात्र, शिक्षक, शोधार्थी को इस पर गर्व करना चाहिए।
     मातृभाषा की जगह नहीं ले सकती कोई भी भाषा- सांस्कृतिक विविधता और विरासत के संरक्षण में मातृभाषा का महत्वपूर्ण योगदान हैं। भाषा हमारा प्रतिनिधित्व करती है और इसे किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश में युवाओं के बीच अकादमिक उत्कृष्टता के अवसर के लिए भाषा बेहद आवष्यक हैं। भाषाएं दो देशों में रिश्तों की मजबूती प्रदान करने में कारगर साबित होती हैं। कोई भी भाषा किसी व्यक्ति की मातृभाषा की जगह नहीं ले सकती। हम अपनी मातृभाषा में सोचते हैं और उस पर हमारा स्वाभाविक अधिकार होता है। मातृभाषा में सोचने और बोलने से अभिव्यक्ति में आसानी होती है और हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ता है। लोग कई भाषाएं सीख सकते हैं, लेकिन उनकी एक ही मातृभाषा हो सकती है, जिसमें वे सोचते हैं, सपने देखते हैं और भावनाओं को महसूस करते हैं। अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का मातृभाषा सबसे शक्तिशाली उपकरण है।
    भाषाई विवाद भाषा को ही नहीं मनुष्यता को भी नष्ट करती है- भाषा वही जीवित रहती है, जो नदी की तरह निरंतर बहती हुई हर किसी से मिलती-जुलती रहती है। जैसे नदियां, नदियों से मिलती हैं तो बड़ी बनती हैं, अब देखिए गंगा हर नदी से मिलती हुई चलती है और विशाल से विशालतर होती जाती है। हिन्दी ने भी इधर उड़ान इसीलिए भरी है कि अब वह सबसे मिलने लगी है। भाषाई विवाद और छुआछूत भाषा को ही नहीं मनुष्यता को भी नष्ट करती है।
 भाषा का भेद और अपमान दुनिया का भूगोल बदल देता है-  आज हमें हर भाषा का सम्मान करना होगा। हर भाषा स्वाभिमानी होती है। आन-बान-शान होती है। याद रखिए कि भाषा का भेद और भाषा का अपमान दुनिया का भूगोल बदल देता है। इससे मनुष्यता चीखती है। अगर भारत के विभाजन का कारण धार्मिक था। इस्लामिक कट्टरपन था और पाकिस्तान बना। तो भाषाई भेदभाव ही था, जो बांग्लादेश बना। बांग्ला भाषियों पर अगर जबरिया उर्दू न थोपी गई होती, फौजी बूटों तले बांग्ला न दबाई गई होती तो दुनिया का भूगोल नहीं बदलता, बांग्लादेश नहीं बनता। मनुष्यता अपमानित न हुई होती। लाखों-करोड़ों लोग अनाथ और बेघर न हुए होते। हिन्दी दिवस पर हिन्दी की जय जरुर कीजिए, खूब जोर-शोर से कीजिए, पर दुनिया भर की भाषाओं का सम्मान करते हुए। किसी का अपमान करते हुए नहीं। भारतीय साहित्य, संस्कृति, व्यंजन आदि को विदेश में खूब पसंद किया जाता है। दुनिया आशा भरी निगाहों से भारत की ओर देख रही है।
    अंग्रेजी का बच्चों पर प्रभाव- अंग्रेजी का प्रभाव इस हद तक बढ़ रहा है कि हमारे बच्चे अब ग्यारह बारह, छियासी नहीं समझते हैं बल्कि अंग्रेजी के अंकों को ही समझते और बोलते हैं। एक सच्चाई यह भी है कि हिंदी के विकास के बावजूद इसकी पूरी वर्णमाला, पूरी गिनती या हिंदी महीनों के नाम बहुत कम लोगों को याद होंगे। आज आप हिन्दी का उच्चारण गलत कर दें तो कोई इसे ध्यान नहीं देता है लेकिन आप गलत अंग्रेजी बोल दे तो लोग तुरंत समझ जाएंगे।
             हिंदी भारत की आत्मा, गौरव और मनुष्यता को जोड़ने वाला सेतु है। यह केवल 2% लोगों द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी पर निर्भरता को नकारती है और जापान-जर्मनी की तरह मातृभाषा में प्रगति का आह्वान करती है। भाषा को थोपना भूगोल बदल देता है, जैसे उर्दू थोपने से बांग्लादेश बना। इसलिए भाषा विवाद मनुष्यता को नष्ट करता है। भाषा नदी की तरह है, उसे बहने देना चाहिए। हिंदी ने जो दौड़ लगाई है, अब वह रुक नहीं सकती, हिंदी भाषा विश्व भाषा बन कर रहेगी। हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान के साथ बढ़ाना होगा, तभी राष्ट्र सशक्त होगा।

डॉ नन्दकिशोर साह

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